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न्यायिक अवकाश एवं बढ़ता लंबित वादों का बोझ: एक विश्लेषण

Lokesh Pal July 14, 2026 03:20 4 0

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के वार्षिक ग्रीष्मकालीन अवकाश की पृष्ठभूमि में बढ़ते लंबित वादों तथा समयबद्ध न्याय तक पहुँच को लेकर बढ़ती चिंताओं ने न्यायिक अवकाश की व्यवस्था को पुनः बहस के केंद्र में ला दिया है।

दीर्घ न्यायिक अवकाश के बारे में

  • न्यायिक अवकाश: न्यायिक अवकाश, पूर्व-निर्धारित अवकाश अवधि होती है, जिसके दौरान सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में अवकाशकालीन पीठों (Vacation Benches) के द्वारा केवल अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई होती है, जबकि नियमित न्यायिक कार्यवाही स्थगित रहती है।
  • उद्गम: इस व्यवस्था की शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हुई थी, जब न्यायाधीश भारतीय ग्रीष्म ऋतु में तापमान संबंधी समस्याओं के कारण लंबी अवधि का अवकाश लिया करते थे।
  • न्यायालय अवकाश का निर्धारण: सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1958 के अनुसार, न्यायालयों के अवकाश का निर्धारण सर्वोच्च न्यायालय नियमों के अंतर्गत किया जाता है, जिसके लिए भारत के राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है।
    • वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय नियम, 2013 न्यायालय अवकाश को विनियमित करते हैं तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) प्रतिवर्ष अवकाश कार्यक्रम अधिसूचित करते हैं।
    • सर्वोच्ज न्यायालय के अवकाश की अवधि: उच्चतम न्यायालय में प्रतिवर्ष लगभग न्यायिक कार्य दिवसों की संख्या 193 है।
    • उच्च न्यायालयों के अवकाश की अवधि: उच्च न्यायालय में सामान्यतः प्रतिवर्ष लगभग 210 कार्य दिवस होते हैं।
    • ‘ट्रायल कोर्ट’ के अवकाश की अवधि: विचारण न्यायालय प्रतिवर्ष लगभग 245 कार्य दिवसों तक कार्य करते हैं।
  • अधीनस्थ आपराधिक न्यायालयों में कोई न्यायिक अवकाश नहीं होता, जबकि अधीनस्थ दीवानी न्यायालयों में न्यायालयीन अवकाश प्रदान किया जाता है।
  • वर्तमान व्यवस्था: वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने ग्रीष्मकालीन अवकाश का नाम बदलकर “आंशिक न्यायालय कार्य दिवस (Partial Court Working Days)” कर दिया गया था, किंतु वार्षिक न्यायिक बैठक के कुल दिनों में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन प्रदर्शित नहीं हुआ।
  • उद्देश्य: न्यायिक अवकाश न्यायाधीशों को आरक्षित निर्णयों के लेखन, विधिक अनुसंधान, जटिल मामलों की तैयारी, प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन तथा व्यावसायिक दक्षता एवं मानसिक संतुलन बनाए रखने का अवसर प्रदान करता है।

दीर्घ न्यायिक अवकाश से संबंधित चिंताएँ

  • न्यायिक लंबित मामलों में वृद्धि: 31 दिसंबर, 2025 तक भारत में 5.39 करोड़ से अधिक मामले लंबित थे, जिनमें जिला न्यायालयों में 4.76 करोड़, उच्च न्यायालयों में 63.6 लाख तथा सर्वोच्च न्यायालय में 92,000 से अधिक मामले शामिल थे। अवकाश अवधि के दौरान न्यायालयों के सीमित कार्य संचालन से मामलों के निस्तारण की गति बाधित हो जाती है।
  • विचाराधीन कैदियों को न्याय मिलने में विलंब: भारत की कारागार आबादी का लगभग 75% हिस्सा विचाराधीन कैदियों का है, जिनमें से अनेक बिना दोषसिद्धि के लंबे समय तक कारावास में रहते हैं।
    • उदाहरण: हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) में सर्वोच्च न्यायालय ने हजारों विचाराधीन कैदियों की दयनीय स्थिति का उल्लेख करते हुए त्वरित सुनवाई के अधिकार को अनुच्छेद-21 का अभिन्न अंग माना था।
  • समयबद्ध न्याय तक पहुँच प्रभावित होना: चूँकि अवकाशकालीन पीठें केवल अत्यावश्यक वादों की सुनवाई करती हैं, इसलिए दीवानी, आपराधिक एवं संवैधानिक मामलों के वादकारियों को न्यायिक राहत प्राप्त करने में अतिरिक्त विलंब का सामना करना पड़ता है।
  • न्यायिक रिक्तियों की समस्या में वृद्धि: उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के अनेक पद रिक्त होने से न्यायिक क्षमता पहले से ही प्रभावित है। ऐसे में समानांतर रूप से न्यायिक अवकाश प्रभावी न्यायिक कार्यबल को और सीमित कर देता है।
    • 04 अगस्त 2025 की स्थिति के अनुसार 1,122 स्वीकृत न्यायाधीश पदों के विरुद्ध केवल 788 न्यायाधीश कार्यरत थे, जबकि विभिन्न उच्च न्यायालयों में 334 पद रिक्त थे।
  • आर्थिक एवं सामाजिक लागत में वृद्धि: न्यायिक निर्णयों में विलंब से वाद-व्यय बढ़ता है, वाणिज्यिक विवाद लंबे समय तक लंबित रहते हैं, निवेश हतोत्साहित होता है तथा वादियों पर आर्थिक एवं मानसिक बोझ बढ़ता है।
  • औपनिवेशिक विरासत का प्रतिबिंब: वर्तमान न्यायिक अवकाश व्यवस्था का विकास औपनिवेशिक परिस्थितियों में हुआ था, जो आज अत्यधिक वादभार से जूझ रहे आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं मानी जाती है।

न्यायिक अवकाश के समर्थन में तर्क

  • न्यायिक कार्यों के निष्पादन में सहायक: न्यायिक अवकाश न्यायाधीशों को आरक्षित निर्णयों के लेखन, विधिक अनुसंधान, जटिल संवैधानिक मामलों की सुनवाई की तैयारी तथा प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन हेतु समर्पित समय प्रदान करता है।
    • उदाहरण: पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ सहित अनेक वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अवकाश अवधि के दौरान भी मामलों की सुनवाई एवं निर्णयों का उच्चारण जारी रखा।
  • न्यायिक थकान की रोकथाम: भारतीय न्यायाधीश विश्व के सर्वाधिक न्यायिक कार्यभार एवं भारी दैनिक वाद-सूचियों का निर्वहन करते हैं। ऐसे में समय-समय पर मिलने वाला अवकाश न्यायिक दक्षता, मानसिक स्वास्थ्य तथा न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक होता है।
  • अत्यावश्यक मामलों की निरंतर सुनवाई: अवकाश अवधि में न्यायालय पूर्णतः बंद नहीं होते, क्योंकि अवकाशकालीन पीठें (Vacation Benches) व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जमानत, बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), मृत्युदंड, निर्वाचन तथा अन्य अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई निरंतर करती रहती हैं।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता का संरक्षण: अपने कार्य-कलापों की समय-सारिणी निर्धारित करने का अधिकार न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है, जिससे वह बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपने आंतरिक प्रशासन का संचालन कर सकती है।

वर्तमान न्यायिक अवकाश व्यवस्था की आलोचनाएँ

  • न्यायालयों के नियमित कार्य में कमी: बढ़ते लंबित मामलों के बावजूद समानांतर न्यायिक अवकाश से संवैधानिक न्यायालयों का नियमित कार्य प्रभावित होता है।
  • सीमित कार्य दिवस: लंबित वादों की विशाल संख्या की तुलना में न्यायालयों के वार्षिक न्यायिक दिवस अपेक्षाकृत कम हैं।
  • संरचनात्मक सुधार का अभाव: ग्रीष्मकालीन अवकाश का नाम बदलकर आंशिक न्यायालय कार्य दिवस (Partial Court Working Days) कर देने से न तो प्रभावी कार्य दिवसों में वृद्धि हुई है और न ही मामलों के निस्तारण में कोई उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
  • न्याय प्राप्ति में विलंब: न्यायालयों के सीमित कार्य संचालन का प्रतिकूल प्रभाव विशेष रूप से विचाराधीन कैदियों, वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं, दैनिक वेतनभोगियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें समय पर न्यायिक राहत नहीं  प्राप्त हो पाती है।
  • अप्रासंगिक अवकाश मॉडल: औपनिवेशिक काल से चली आ रही वर्तमान न्यायिक अवकाश व्यवस्था भारत की निरंतर विस्तृत होती न्याय वितरण प्रणाली की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं प्रतीत होती है।

न्यायालयों के कार्य दिवसों की अंतरराष्ट्रीय तुलना

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट प्रतिवर्ष केवल लगभग 100–150 मामलों की सुनवाई करता है तथा प्रत्येक माह लगभग पाँच दिनों तक मौखिक बहस आयोजित करता है।
  • ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया का हाई कोर्ट प्रतिवर्ष लगभग 97 दिनों तक कार्य करता है।
  • सिंगापुर: सिंगापुर का सुप्रीम कोर्ट प्रतिवर्ष लगभग 145 दिवसों तक कार्य करता है।
  • यूनाइटेड किंगडम: हाई कोर्ट तथा कोर्ट ऑफ अपील सामान्यतः प्रतिवर्ष 185–190 दिवसों तक कार्य करते हैं, जबकि यूनाइटेड किंगडम का उच्चतम न्यायालय वर्षभर में चार सत्रों में लगभग 250 दिवसों तक कार्य करता है।

संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की न्यायिक व्याख्या के अंतर्गत त्वरित सुनवाई तथा त्वरित न्याय के अधिकार को भी सम्मिलित किया गया है। [हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979)]
  • अनुच्छेद-39A: राज्य को समान न्याय सुनिश्चित करने तथा निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश देता है, ताकि आर्थिक अथवा अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी व्यक्ति को न्याय तक पहुँच से वंचित न होना पड़े।
  • अनुच्छेद-50: राज्य को न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक रखने का निर्देश देता है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुदृढ़ होती है।
  • अनुच्छेद-124 एवं 214: क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान करते हैं, जिन्हें न्याय प्रशासन हेतु संवैधानिक न्यायालय के रूप में स्थापित किया गया है।
  • मध्यस्थता अधिनियम, 2023: संस्थागत तथा वाद-पूर्व मध्यस्थता (Pre-litigation Mediation) के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है तथा न्यायालयी वाद से पूर्व विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करता है।

न्यायिक सुधारों हेतु प्रमुख अनुशंसाएँ

  • क्रमिक (Staggered) न्यायिक अवकाश लागू किए जाएँ: सामूहिक अवकाश के स्थान पर बार-बारी (Rotational) से अवकाश प्रणाली अपनाई जाए, जिससे न्यायालय वर्षभर कार्यरत रहें तथा न्यायाधीशों को पर्याप्त विश्राम भी प्राप्त हो सके।
    • अनुशंसा: संसदीय स्थायी समिति (2023), विधि आयोग तथा न्यायमूर्ति वी.एस. मलिमथ समिति।
      • संसदीय स्थायी समिति (2023): वर्षभर न्यायालयों के संचालन तथा लंबित मामलों में कमी लाने हेतु क्रमिक/घूर्णन अवकाश प्रणाली की अनुशंसा की।
      • विधि आयोग: न्यायालयों के अवकाश का युक्तिकरण तथा प्रभावी कार्य दिवसों में वृद्धि कर न्याय तक पहुँच को सुदृढ़ करने का समर्थन किया।
      • न्यायमूर्ति वी.एस. मलिमथ समिति: न्यायालयों के अवकाश में कमी, शिफ्ट प्रणाली लागू करने तथा न्यायालयों की उत्पादकता में वृद्धि कर, वादों के शीघ्र निस्तारण की अनुशंसा की।
  • न्यायिक रिक्तियों की शीघ्र पूर्ति: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा अधीनस्थ न्यायपालिका में नियुक्तियों को पारदर्शी एवं समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से शीघ्र पूरा किया जाए।
  • वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) को सुदृढ़ बनाया जाए: लोक अदालतों, मध्यस्थता, सुलह को प्रोत्साहित कर नियमित न्यायालयों पर भार कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण: पिछले वर्षों में राष्ट्रीय लोक अदालतों ने एक ही राष्ट्रव्यापी बैठक में 2.59 करोड़ से अधिक मामलों का निस्तारण कर सहमति-आधारित विवाद समाधान की प्रभावशीलता सिद्ध की थी।
  • प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना, डिजिटल सुनवाई, इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित वाद-प्रबंधन तथा डिजिटल वाद ट्रैकिंग का विस्तार कर न्यायिक दक्षता में वृद्धि की जाए।
  • सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की विशेषज्ञता का उपयोग: आवश्यकता अनुसार सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को लंबित मामलों के निस्तारण, वाद-प्रबंधन, वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR), न्यायिक प्रशिक्षण तथा न्यायालय प्रशासन में सम्मिलित किया जाए।

आगे की राह

  • न्यायालयों का निरंतर संचालन सुनिश्चित किया जाए: क्रमिक (Staggered) न्यायिक अवकाश प्रणाली अपनाई जाए, जिससे न्यायालयों का कार्य निर्बाध रूप से संचालित रहे तथा न्यायाधीशों के अवकाश के अधिकार का भी संरक्षण हो।
  • संरचनात्मक बाधाओं का समाधान किया जाए: न्यायिक रिक्तियों, अपर्याप्त न्यायालयीन अवसंरचना, न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात की कमी तथा प्रक्रियात्मक विलंब जैसी चुनौतियों का समानांतर समाधान कर न्यायिक दक्षता में सुधार किया जाए।
  • बहु-स्तरीय विवाद निवारण प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाए: वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR), ऑनलाइन विवाद निवारण (ODR), ग्राम न्यायालयों तथा विशेषीकृत अधिकरणों का विस्तार कर नियमित न्यायालयों में आने वाले मामलों की संख्या कम की जाए।
  • न्यायिक प्रशासन को सुदृढ़ बनाया जाए: वैज्ञानिक वाद-प्रबंधन, समयबद्ध वाद निस्तारण, डिजिटल निगरानी तथा आवधिक प्रदर्शन समीक्षा को संस्थागत रूप दिया जाए, साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण बनाए रखी जाए।

निष्कर्ष

क्रमिक न्यायिक अवकाश, समयबद्ध न्यायिक नियुक्तियाँ, प्रौद्योगिकी-संचालित न्यायालय प्रशासन तथा वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) को सुदृढ़ करने वाला संतुलित दृष्टिकोण न्यायिक दक्षता में वृद्धि कर सकता है, साथ ही त्वरित न्याय, न्याय तक निर्बाध पहुँच तथा विधि के शासन (Rule of Law) को अत्यधिक सुदृढ़ बना सकता है।

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