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‘सीवॉल्स’ के स्थान पर मैंग्रोव

Lokesh Pal June 10, 2026 02:50 5 0

संदर्भ 

चक्रवात ‘दाना’ (2025) के दौरान, भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के मैंग्रोव वनों ने तूफानी ज्वार को अवशोषित करने में कंकरीट अवरोधों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया, जिससे भारत के जलवायु-संवेदनशील तटीय क्षेत्रों एवं तटीय समुदायों की सुरक्षा में पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (EbA) का महत्त्व प्रदर्शित हुआ।

मैंग्रोव के बारे में

मैंग्रोव अपने विशिष्ट संरचनात्मक एवं भौतिक अनुकूलन के कारण अत्यंत प्रभावी प्राकृतिक तटीय अवरोध के रूप में कार्य करते हैं, जो उन्हें कठोर तटीय पर्यावरण में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं।

  • परिभाषा: मैंग्रोव विशेष प्रकार के हैलोफाइट (लवण-सहिष्णु काष्ठीय पौधे) होते हैं, जो ज्वार-भाटा क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहाँ उच्च लवणता, तीव्र सौर विकिरण, ऑक्सीजन की कमी (एनॉक्सिक) वाली स्वैंप तथा परिवर्तित ज्वारीय धाराएँ पाई जाती हैं।
  • श्वसन अनुकूलन (निमैटोफोर्स): जल-जमाव वाले तटीय गाद में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण कुछ मैंग्रोव प्रजातियाँ (जैसे-एविसेनिया) अपनी पार्श्व जड़ों को ऊपर की ओर स्वैंप से बाहर निकालती हैं।
    • इन वायवीय जड़ों में लेंटिसेल्स नामक विशेष छिद्र होते हैं, जो निम्न ज्वार के समय वायुमंडल से सीधे ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं।

  • यांत्रिक स्थिरता (स्टिल्ट एवं बट्रेस जड़ें): तीव्र चक्रवाती पवनें एवं दैनिक ज्वारीय तरंगों को बाधित करने हेतु राइजोफोरा (Rhizophora) जैसी प्रजातियाँ तने से नीचे की ओर बढ़ने वाली स्टिल्ट जड़ें विकसित करती हैं, जबकि बड़े वृक्ष आधार पर फैली हुई बट्रेस जड़ों के माध्यम से अपने भार का वितरण करते हैं।
  • लवणता नियंत्रण: मैंग्रोव उच्च परासरणीय दाब को दो प्रमुख तंत्रों के माध्यम से नियंत्रित करते हैं:
    • बहिष्करण: जड़ एवं भूमि संपर्क पर 90% से अधिक लवण को बाहर करना।
    • उत्सर्जन: अवशोषित लवण को पुरानी पत्तियों में संचित कर उन्हें गिराना या पत्तियों की सतह पर स्थित लवण ग्रंथियों के माध्यम से बाहर निकालना।
  • प्रजनन रणनीति (विविपैरिटी): बीजों के सड़ने या बह जाने से बचाने के लिए मैंग्रोव में ‘विविपैरस’ प्रजनन का गुण पाया जाता है।
    • बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए ही अंकुरित हो जाते हैं और एक विकसित पौध (प्रोपैग्यूल) के रूप में जल में गिरकर स्वैंप में ऊर्ध्वाधर रूप से स्थापित हो जाते हैं।

सीवॉल्स (Seawalls)

तटीय क्षेत्रों को प्रबल तरंगों, तूफानी ज्वार एवं तटीय अपरदन से बचाने के लिए सरकारें प्रायः कृत्रिम तटीय संरचनाएँ निर्मित करती हैं, जिन्हें ‘सीवॉल्स’ कहा जाता है।

  • ‘सीवॉल्स’ कठोर कंकरीट या पत्थर की संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें समुद्र तट के समानांतर बनाया जाता है ताकि तटीय क्षेत्रों को तरंगों, तूफानी ज्वार तथा अपरदन से सुरक्षित रखा जा सके।
  • ये समुद्र एवं मानव बस्तियों के बीच भौतिक अवरोध के रूप में कार्य करती हैं।
  • सीमाएँ: ये महँगी होती हैं, इनके नियमित रखरखाव की आवश्यकता होती है, तथा ये तरंग ऊर्जा को परावर्तित करके समीपवर्ती तटीय क्षेत्रों में अपरदन बढ़ा सकते हैं।

ग्रॉइन्स (Groynes)

तट के साथ रेत के प्रवाह के कारण होने वाले अपरदन को नियंत्रित करने के लिए अभियंता ‘ग्रॉइन्स’ नामक संरचनाओं का उपयोग करते हैं।

  • ग्रॉइन्स’ संकीर्ण संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें तटरेखा के लंबवत बनाया जाता है ताकि रेत को रोककर तटवर्ती धाराओं से होने वाले अपरदन को कम किया जा सके।
  • ये समुद्र तट की चौड़ाई बनाए रखने एवं तटरेखा को स्थिर करने में सहायता करते हैं।
  • सीमाएँ: ये निकटवर्ती तटों तक रेत की आपूर्ति को कम कर सकते हैं, जिससे आस-पास के क्षेत्रों में अपरदन बढ़ सकता है।

तटबंध (Embankments)

निम्न-स्थलीय तटीय एवं नदीय क्षेत्रों में बाढ़ एवं समुद्री जल के प्रवेश को रोकने के लिए तटबंधों का व्यापक उपयोग किया जाता है।

  • तटबंध मिट्टी, चट्टान या कंकरीट से निर्मित ऊँचे अवरोध होते हैं, जिन्हें नदियों या तटरेखाओं के किनारे बनाया जाता है ताकि बाढ़ एवं समुद्री जल के प्रवेश को रोका जा सके।
  • इनका उपयोग विशेष रूप से निम्न-स्थलीय तटीय एवं डेल्टा क्षेत्रों में किया जाता है।
  • सीमाएँ: ये समय के साथ कमजोर हो सकते हैं, अत्यधिक बाढ़ या चक्रवात के दौरान टूट सकते हैं तथा निरंतर रखरखाव की आवश्यकता होती है।

भौगोलिक वितरण

  • वैश्विक परिदृश्य: एशिया विश्व में मैंग्रोव का सबसे बड़ा क्षेत्र समाहित करता है। विश्व के कुल मैंग्रोव पारितंत्र का 40% से अधिक हिस्सा केवल चार देशों—इंडोनेशिया (19%), ब्राज़ील (9%), नाइजीरिया (7%) तथा मैक्सिको (6%)—में केंद्रित है।
  • राष्ट्रीय आँकड़े: भारत में मैंग्रोव का कुल क्षेत्रफल 4,992 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 0.15% है।
  • स्थानिक वितरण: भारत में मैंग्रोव का वितरण असमान है, जहाँ पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी) पर पश्चिमी तट की तुलना में अधिक विस्तृत एवं सघन क्षेत्र पाए जाते हैं, जिसका प्रमुख कारण विशाल नदी डेल्टा प्रणालियाँ हैं।
  • सुंदरबन: भारत एवं बांग्लादेश में विस्तृत यह क्षेत्र विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है तथा यह पहला मैंग्रोव पारितंत्र था, जिसे वैज्ञानिक प्रबंधन योजनाओं के अंतर्गत लाया गया।
  • भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान: ब्राह्मणी, बैतरणी एवं धमरा नदियों से पोषित यह क्षेत्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव पारितंत्र है।

मैंग्रोव संबंधी प्रमुख राष्ट्रीय पहलें

  • मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इन्कम्स (MISHTI) योजना: संघ बजट 2023-24 में प्रारंभ की गई।
    • यह योजना मैंग्रोव रोपण, तटीय पारितंत्र पुनर्स्थापन तथा तटीय समुदायों के लिए आजीविका सृजन पर केंद्रित है, जिसे मनरेगा (MGNREGA) एवं प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) जैसी योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से लागू किया जाता है।
  • राष्ट्रीय तटीय मिशन (NAPCC के अंतर्गत): राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के अंतर्गत यह मिशन मैंग्रोव संरक्षण, तटीय सुदृढ़ता एवं जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देता है, जिससे चक्रवात, समुद्र-स्तर वृद्धि एवं तटीय अपरदन से उत्पन्न जोखिमों का समाधान किया जा सके।
  • एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन (ICZM) कार्यक्रम: विश्व बैंक द्वारा समर्थित यह कार्यक्रम मैंग्रोव पुनर्स्थापन, जैव विविधता संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण तथा सतत् तटीय संसाधन प्रबंधन पर कार्य करता है, विशेषकर संवेदनशील तटीय राज्यों में।
  • राष्ट्रीय मैंग्रोव एवं प्रवाल भित्ति समिति: भारत सरकार द्वारा स्थापित यह समिति मैंग्रोव एवं प्रवाल भित्ति पारितंत्रों के संरक्षण, पुनर्स्थापन तथा वैज्ञानिक प्रबंधन हेतु नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करती है।
  • CAMPA निधि का उपयोग: प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) के अंतर्गत प्राप्त निधियों का उपयोग बढ़ते हुए मैंग्रोव वनीकरण, आवास सुधार तथा तटीय पारितंत्र पुनर्जीवन के लिए किया जा रहा है।
  • राज्य-स्तरीय मैंग्रोव संरक्षण उपाय: पश्चिम बंगाल, ओडिशा, गुजरात एवं महाराष्ट्र जैसे तटीय राज्यों ने विशेष मैंग्रोव संरक्षण प्राधिकरण, पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र निर्धारण तथा समुदाय-आधारित पुनर्स्थापन परियोजनाएँ विकसित की हैं।

पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (Ecosystem-based Adaptation – EbA) के बारे में

  • परिभाषा: EbA एक प्रकृति-केंद्रित जलवायु रणनीति है, जो जैव विविधता एवं पारितंत्र सेवाओं का उपयोग करके समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूल बनने में सहायता करती है।
  • उपयोग किए जाने वाले पारितंत्र: पारंपरिक अभियांत्रिक “ग्रे” अवसंरचना के विपरीत, EbA मैंग्रोव, समुद्री घास क्षेत्र एवं प्रवाल भित्तियों जैसे प्राकृतिक आवासों का उपयोग करता है, जो गतिशील एवं आत्म-निर्भर सुरक्षा अवरोध के रूप में कार्य करते हैं।

जलवायु ढाल के रूप में मैंग्रोव की प्रमुख विशेषताएँ (UPSC CSE Mains 2019)

  • तरंगों से सुरक्षा: मैंग्रोव की सघन एवं उलझी हुई वायवीय जड़ें आने वाली तरंगों की शक्ति का क्षय करती हैं तथा तूफानी ज्वार से होने वाले नुकसान को कम करती हैं।
  • प्राकृतिक भू-निर्माण: मैंग्रोव अपनी जड़ों में अवसाद एवं जैविक पदार्थों को फँसाकर तटरेखा को धीरे-धीरे ऊँचा उठाने में सहायता करते हैं, जिससे समुद्र-स्तर वृद्धि के अनुकूलन में सहायता मिलती है।
  • सुदृढ़ तटीय सुरक्षा: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, भारत एक प्रमुख तटीय EbA क्षेत्र है, जहाँ मैंग्रोव अत्यधिक तटीय जनसंख्या को जलवायु आपदाओं से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • उच्च कार्बन भंडारण: मैंग्रोव अत्यंत प्रभावी ‘ब्लू कार्बन सिंक’ होते हैं, जो अपनी जल-जमाव वाली मृदा में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड संचित करते हैं, जो प्रायः उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से भी अधिक होता है।
  • दीर्घकालिक एवं किफायती: कंकरीट द्वारा निर्मित ‘सीवॉल्स’ के विपरीत, जो समय के साथ कमजोर होते हैं एवं बार-बार मरम्मत की आवश्यकता होती है, मैंग्रोव पारितंत्र उचित संरक्षण प्राप्त होने पर स्वाभाविक रूप से पुनर्जीवित होते हैं और समय के साथ अधिक सुदृढ़ होते हैं।

कठोर (ग्रे) बनाम पारिस्थितिकी (ग्रीन) अवसंरचना

  • तटीय क्षति का स्थानांतरण: कठोर कंकरीट संरचनाएँ तरंग ऊर्जा को अवशोषित करने के बजाय उसे परावर्तित करती हैं, जिससे निकटवर्ती असुरक्षित तटीय क्षेत्रों में अपरदन एवं क्षति बढ़ जाती है, जैसा कि केरल तट के कुछ भागों में देखा गया है।
  • सफल सामुदायिक पुनर्स्थापन: सुंदरबन में 18,000 से अधिक महिलाओं ने लगभग 4,600 हेक्टेयर मैंग्रोव का पुनर्स्थापन किया, जिससे चक्रवात अम्फान एवं यास के प्रभाव में कमी आई तथा शहद संग्रहण एवं केकड़ा पालन के माध्यम से आजीविका में भी सुधार हुआ।

भारत की तटीय अनुकूलन नीति से संबंधित चुनौतियाँ

  • प्रछन्न जलवायु लाभ: अनेक जलवायु अनुकूलन परियोजनाएँ सामान्य वानिकी या विकास योजनाओं के अंतर्गत सम्मिलित होती हैं, जिससे उनके विशिष्ट जलवायु लाभों का पृथक आकलन प्रायः नहीं किया जाता है।
  • कमजोर संस्थागत समन्वय: तटीय प्रबंधन में विभाजित उत्तरदायित्व एवं कमजोर निगरानी के कारण प्राकृतिक समाधानों के स्थान पर अधिक ध्यान कंकरीट अवसंरचना पर केंद्रित रहता है।
  • कमजोर जलवायु प्राथमिकता: MISHTI योजना जैसी प्रमुख पहलों को प्रायः संरक्षण कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है, न कि महत्त्वपूर्ण जलवायु अनुकूलन रणनीति के रूप में।
  • ग्रे’ अवसंरचना पर अधिक व्यय: पिछले दशक में तटीय राज्यों ने कठोर तटीय संरचनाओं पर लगभग ₹2,641 करोड़ व्यय किए, जबकि राष्ट्रीय तटीय मिशन का बजट ₹195 करोड़ (2022–23) से घटकर ₹50 करोड़ (2024–25) हो गया।

आगे की राह

  • स्पष्ट राष्ट्रीय EbA ढाँचा: पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (EbA) के लिए स्पष्ट कानूनी परिभाषाएँ एवं वर्गीकरण प्रणाली विकसित की जाए, ताकि पहचान, निगरानी एवं वित्तपोषण को सुदृढ़ किया जा सके।
  • तटीय नियोजन में प्रकृति का समावेशन: भिन्न पुनर्स्थापन प्रयासों के स्थान पर एक राष्ट्रीय तटीय रणनीति विकसित की जाए, जिसमें मैंग्रोव एवं समुद्री घास पुनर्स्थापन को आपदा प्रबंधन एवं तटीय कानूनों में शामिल किया जाए।
  • ग्रीन अवसंरचना हेतु वित्त में वृद्धि: उच्च रखरखाव वाली सीवॉल्स पर व्यय को कम कर राष्ट्रीय तटीय मिशन एवं अन्य प्रकृति-आधारित उपायों को सुदृढ़ करने हेतु संसाधनों का पुनर्निर्देशन किया जाए।
  • सामुदायिक नेतृत्व वाले पुनर्स्थापन को बढ़ावा: सुंदरबन मॉडल का विस्तार करते हुए स्वयं सहायता समूहों एवं महिला सहकारी समितियों को मैंग्रोव पुनर्स्थापन में वित्तीय समर्थन प्रदान किया जाए।
  • जलवायु निगरानी में सुधार: डेटा-आधारित निगरानी प्रणालियों को विकसित कर पारितंत्र संरक्षण के लाभों का आकलन किया जाए तथा वैश्विक जलवायु वित्त तंत्रों में भारत की भूमिका को सुदृढ़ किया जाए।

निष्कर्ष

भारत द्वारा कठोर एवं कंकरीट आधारित सीवॉल्स पर अत्यधिक निर्भरता अल्पकालिक राहत तो प्रदान करती है, किंतु दीर्घकाल में तटीय अपरदन के जोखिम को स्थानांतरित एवं अधिक गंभीर बना देती है। तीव्र चक्रवातों के दौरान मैंग्रोव पारितंत्रों की सफलता यह दर्शाती है कि प्राकृतिक पूँजी में निवेश न केवल आर्थिक रूप से व्यवहार्य है, बल्कि सामाजिक रूप से न्यायसंगत भी है।

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