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मेकेदातु बांध परियोजना

Lokesh Pal June 23, 2026 03:07 7 0

संदर्भ

तमिलनाडु विधानसभा ने कावेरी नदी पर कर्नाटक के प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का विरोध करते हुए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें मौजूदा जल-वितरण व्यवस्थाओं के उल्लंघन का हवाला दिया गया।

मेकेदातु परियोजना के बारे में

  • अवस्थिति: कर्नाटक के रामनगर जिले में कावेरी नदी पर मेकेदातु गॉर्ज में प्रस्तावित।
    • यह अरकावती और कावेरी नदियों के संगम के ‘डाउनस्ट्रीम’ क्षेत्र में स्थित है।

  • उद्देश्य: इसे एक साम्य जलाशय (Balancing Reservoir) के रूप में विकसित करने का उद्देश्य है, ताकि:
    • बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।
  • क्षमता: प्रस्तावित भंडारण क्षमता लगभग 67 TMC (हजार मिलियन घन फीट) जल।
  • कर्नाटक का तर्क: यह परियोजना कावेरी जल में कर्नाटक के आवंटित हिस्से का उपयोग करेगी और तमिलनाडु के हिस्से को प्रभावित किए बिना जल प्रबंधन में सुधार करेगी।
  • तमिलनाडु की आपत्ति: तमिलनाडु का तर्क है कि कावेरी बेसिन में कोई नई परियोजना बिना-
    • सह-बेसिन राज्यों की सहमति,
    • केंद्र सरकार की स्वीकृति,
    • कावेरी प्रबंधन ढाँचे की मंजूरी के आगे नहीं बढ़नी चाहिए।
  • तमिलनाडु के विरोध के कारण: डाउनस्ट्रीम जल प्रवाह में कमी की आशंका।
    • यह तर्क कि कावेरी बेसिन पहले से ही जल-अभाव वाला क्षेत्र है और जल का वितरण पहले ही अधिकरण और न्यायालय के आदेशों द्वारा पूर्ण रूप से निर्धारित किया जा चुका है।

कावेरी जल विवाद

  • अंतर-राज्यीय नदी विवाद: कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर विवाद।
  • विवाद की उत्पत्ति: यह वर्ष 1892 और वर्ष 1924 के समझौतों में निहित है, जो मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच हुए थे।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT): वर्ष 1990 में अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत गठित।
    • 17 वर्षों की विचार-विमर्श प्रक्रिया के बाद अंतिम निर्णय दिया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2018): न्यायाधिकरण के निर्णय में संशोधन किया गया और कर्नाटक का हिस्सा बढ़ाया गया तथा तमिलनाडु का आवंटन कम किया गया
  • कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA): वर्ष 2018 में स्थापित, ताकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को लागू किया जा सके और बेसिन राज्यों के बीच जल निष्कासन की निगरानी की जा सके।
  • संघर्ष का मुख्य कारण:
    • ऊपरी प्रवाह वाला कर्नाटक सिंचाई और पेयजल के लिए जल भंडारण चाहता है।
    • निचले प्रवाह वाला तमिलनाडु डेल्टा कृषि के लिए कावेरी पर अत्यधिक निर्भर है।
  • जल-अभाव वाला बेसिन: न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने कावेरी को जल-संकटग्रस्त/अभावग्रस्त बेसिन माना है, जिससे न्यायसंगत वितरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के लिए संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचा:

  • अनुच्छेद 262: संसद को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों से संबंधित विवादों के निपटारे का अधिकार देता है; साथ ही ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को सीमित करने की अनुमति देता है।
  • प्रविष्टि 17, राज्य सूची (सूची II): जल मुख्यतः राज्य विषय है (जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, निकास आदि)।
  • प्रविष्टि 56, संघ सूची (सूची I): संसद को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास का अधिकार देता है, जब यह जनहित में हो।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956: अधिकरणों की स्थापना का प्रावधान करता है, जो ऐसे विवादों का निपटारा करते हैं।
  • नदी बोर्ड अधिनियम, 1956: केंद्र को अंतर-राज्यीय नदी बेसिन प्रबंधन और विकास के लिए नदी बोर्ड स्थापित करने का अधिकार देता है।

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