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बायोचार (Biochar)

Lokesh Pal June 23, 2026 03:12 5 0

संदर्भ

भारत में प्रतिवर्ष फसल अवशेषों के बड़े पैमाने पर दहन से वायु प्रदूषण तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है, वहीं मृदा में कार्बनिक कार्बन की मात्रा तथा उर्वरता में निरंतर गिरावट देखी जा रही है।

  • बायोचार एक सतत समाधान प्रदान करता है, जो बायोमास अपशिष्ट को परिवर्तित कर एक मृदा-पुनर्स्थापक मूल्यवान संसाधन में बदल देता है।

बायोचार के बारे में (UPSC CSE Prelims 2020)

  • बायोचार कोयले के समान एक पदार्थ है, जिसे कृषि और वानिकी अपशिष्ट (बायोमास) को नियंत्रित प्रक्रिया में जलाकर बनाया जाता है।
    • बायोचार कार्बन को स्थिर रूप में परिवर्तित करता है और यह अन्य प्रकार के कोयले की तुलना में अधिक स्वच्छ होता है।

  • कच्चा माल: यह लकड़ी के टुकड़ों, पौध अवशेषों, गोबर या अन्य कृषि अपशिष्टों जैसे बायोमास स्रोतों से बनाया जाता है।
  • उप-उत्पाद: सिनगैस (Syngas) और बायो-ऑयल, जिनका उपयोग ऊर्जा और ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
  • प्रक्रिया: बायोचार का उत्पादन पायरोलिसिस (Pyrolysis) के दौरान होता है, जो ऑक्सीजन-सीमित वातावरण में बायोमास का ऊष्मीय अपघटन है।
  • भौतिक गुण: बायोचार काला, अत्यधिक छिद्रयुक्त, हल्का, सूक्ष्म दानेदार होता है और लगभग 70% कार्बन द्वारा निर्मित होता है।
  • विशेषताएँ: यह स्थिर कार्बन से समृद्ध होता है और मृदा में 100–1000 वर्षों तक बना रह सकता है

  • भारत में उत्पादन क्षमता:
    • भारत प्रतिवर्ष 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक कृषि अवशेष और 60 मिलियन मीट्रिक टन नगर ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है।
      • इसका बड़ा हिस्सा खुले में जलाया या फेंका जाता है, जिससे प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है।
    • यदि इस अपशिष्ट का 30–50% उपयोग किया जाए, तो प्रति वर्ष 15–26 मिलियन टन बायोचार का उत्पादन संभव है और लगभग 0.1 गीगाटन CO-समतुल्य उत्सर्जन को हटाया जा सकता है।
  • उप-उत्पाद और ऊर्जा क्षमता
    • सिनगैस: पायरोलिसिस के दौरान उत्पन्न (प्रति वर्ष 20–30 मिलियन टन), यह 8–13 टेरावाट-घंटे (TWh) विद्युत् उत्पादन कर सकता है—जो भारत की वार्षिक विद्युत् क्षमता का लगभग 0.5–0.7% है और 0.4–0.7 मिलियन टन कोयले का स्थान ले सकता है।
    • बायो-ऑयल: प्रतिवर्ष 24–40 मिलियन टन उत्पादन 12–19 मिलियन टन डीजल या केरोसीन (लगभग 8% माँग) का प्रतिस्थापन कर सकता है, जिससे कच्चे तेल के आयात में कमी और 2% से अधिक जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में गिरावट संभव है।

भारत के लिए बायोचार क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • फसल अवशेष दहन संकट का समाधान: बड़े पैमाने पर फसल अवशेषों का दहन वायु प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और पोषक तत्वों की हानि में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
    • कृषि अपशिष्ट को बायोचार में परिवर्तित करना एक उत्पादक विकल्प प्रदान करता है, जो पर्यावरणीय क्षति को कम करते हुए त्यागे जाने वाले बायोमास से मूल्य सृजन करता है।
  • दुर्बल मृदाओं का पुनर्स्थापन: भारत की अनेक प्रकार की मृदाओं में मृदा कार्बनिक कार्बन का स्तर घट रहा है, जिससे पोषक तत्वों की धारण क्षमता, जल उपलब्धता और उत्पादकता प्रभावित होती है।
    • बायोचार कार्बन की मात्रा बढ़ाकर और मृदा संरचना सुधारकर मृदा की गणवत्ता को बहाल करता है।
  • जलवायु-स्मार्ट कृषि को समर्थन: जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, हीट वेव और अनियमित वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। ऐसे में मृदा की सहनशीलता बढ़ाना आवश्यक है। बायोचार मृदा की नमी और पोषक तत्वों को बनाए रखने की क्षमता बढ़ाता है, जिससे फसलें जलवायु तनाव का बेहतर सामना कर पाती हैं।
  • जल धारण क्षमता में वृद्धि: इसकी अत्यधिक छिद्रयुक्त संरचना मृदा में अधिक जल संधारण को सक्षम बनाती है, जिससे आर्द्रता संबंधी समस्या कम होती है और शुष्क अवधि में फसल प्रदर्शन बेहतर होता है।
  • पोषक तत्व धारण में सुधार: बायोचार पोषक तत्वों के लीचिंग को कम करता है और पोषक उपयोग दक्षता बढ़ाता है, जिससे उर्वरकों की प्रभावशीलता बढ़ती है और लागत घटती है
  • लाभकारी सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा: बायोचार की छिद्रयुक्त सतह लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है, जो पोषक चक्रण और मृदा जैविक गतिविधि को समर्थन देते हैं।
  • मृदा संरचना में सुधार: बायोचार मृदा एकत्रीकरण (Aggregation) को बढ़ाता है, संपीड़न कम करता है और वातन (Aeration) में सुधार करता है, जिससे जड़ विकास और उत्पादकता बढ़ती है।
  • फसल उत्पादकता में वृद्धि: कई अध्ययनों में पाया गया है कि बायोचार के उपयोग से फसल उत्पादन में 10–30% तक वृद्धि हो सकती है, विशेषकर पोषक तत्वों की कमी वाली और दुर्बल मृदाओं में।

भारत के उदाहरण

  • महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के अकोला जिले में किए गए फील्ड ट्रायल्स से पता चला है कि मक्का के डंठलों द्वारा निर्मित बायोचार ने काली कपास मृदा में कार्बनिक कार्बन स्तर और समग्र मृदा उर्वरता में सुधार किया।
  • केरल: केरल में किए गए शोध से यह पाया गया कि नारियल पत्तियों के डंठलों से निर्मित बायोचार विभिन्न फसल प्रणालियों में मृदा गुणवत्ता में सुधार करता है, जिससे स्थानीय रूप से उपलब्ध बायोमास संसाधनों की क्षमता उजागर होती है।

जलवायु परिवर्तन शमन में योगदान

  • कार्बन अवशोषण: बायोचार को कार्बन-निगेटिव प्रौद्योगिकी माना जाता है, क्योंकि यह पौध बायोमास के माध्यम से वायुमंडलीय कार्बन को अवशोषित कर उसे मृदा में स्थिर रूप में संग्रहीत करता है।
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी: कृषि अवशेषों को बायोचार में परिवर्तित करने से खुले में जलाने से होने वाले उत्सर्जन को रोका जा सकता है तथा बायोमास अपघटन से उत्पन्न मीथेन में भी कमी आती है।
  • जलवायु सहनशीलता में वृद्धि: जल धारण क्षमता और पोषक तत्व उपलब्धता में सुधार करके बायोचार कृषि प्रणालियों को परिवर्तित जलवायु परिस्थितियों और चरम मौसम घटनाओं के प्रति अधिक अनुकूल बनने में सहायता करता है।

सतत कृषि और चक्रीय अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका

  • अपशिष्ट को संपदा में बदलना: बायोचार कृषि अवशेषों को एक निपटान समस्या से बदलकर एक उत्पादक संसाधन में परिवर्तित करता है, जो मृदा स्वास्थ्य और कृषि स्थिरता को बढ़ाता है।
  • शहरी जैविक अपशिष्ट का उपयोग: बायोचार के लिए फीडस्टॉक केवल कृषि अवशेषों तक सीमित नहीं है। नगर जैव-विघटनीय अपशिष्ट, सीवेज स्लज और अन्य जैविक अपशिष्ट धाराओं को भी बायोचार में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • ‘लैंडफिल’ में कमी: भारत प्रतिवर्ष लगभग 62 मिलियन टन नगर ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, जिसमें से आधे से अधिक जैव-विघटनीय होता है। ऐसे अपशिष्ट को बायोचार में परिवर्तित करना चक्रीय अर्थव्यवस्था सिद्धांतों का समर्थन करता है और लैंडफिल से मीथेन उत्सर्जन को कम करता है।

बायोचार और कार्बन बाजार

  • कार्बन क्रेडिट की संभावना: बायोचार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कार्बन लेखांकन ढाँचों के अंतर्गत एक स्थायी ‘कार्बन डाइऑक्साइड रिमूवल’ (CDR) प्रौद्योगिकी के रूप में माना जाता है।
  • किसानों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन: VM0042 कृषि भूमि प्रबंधन जैसी पद्धतियों के अंतर्गत, बायोचार परियोजनाएँ फसल अवशेष दहन से बचाए गए उत्सर्जन और दीर्घकालिक कार्बन अवशोषण दोनों को ध्यान में रखकर कार्बन क्रेडिट उत्पन्न कर सकती हैं।
  • अतिरिक्त ग्रामीण आय: प्रत्येक प्रमाणित बायोचार के एक टन से लगभग 2–2.8 टन CO-समतुल्य क्रेडिट उत्पन्न किए जा सकते हैं, जिससे किसानों, सहकारी समितियों और ग्रामीण उद्यमों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर बनते हैं।
  • भारतीय नवाचार: आईआईटी खड़गपुर द्वारा विकसित ‘किसान किल्न’ (KISAN Kiln) जैसी प्रौद्योगिकियाँ छोटे किसानों को कृषि अपशिष्ट को बायोचार में परिवर्तित करने और उभरते कार्बन बाजारों में भाग लेने में सक्षम बना रही हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग

  • कृषि: मृदा नमी और उर्वरता को बढ़ाता है, विशेषकर शुष्क और अनुर्वरक मृदाओं में।
    • नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन में 30–50% कमी करता है (जो कार्बन डाइऑक्साइड से 273 गुना अधिक प्रभावशाली है)।
    • उर्वरक की आवश्यकता को 10–20% तक घटाता है और फसल उत्पादन में 10–25% वृद्धि करता है।
  • कार्बन कैप्चर: संशोधित बायोचार औद्योगिक गैसों से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सकता है, हालाँकि वर्तमान दक्षता पारंपरिक विधियों से कम है।
  • निर्माण: कंक्रीट में 2–5% बायोचार मिलाने से इसकी मजबूती और ऊष्मा प्रतिरोध में सुधार होता है (लगभग 20% वृद्धि) और प्रति घन मीटर कंक्रीट ~115 किलोग्राम CO का अवशोषण संभव होता है।
  • अपशिष्ट जल उपचार: एक किलोग्राम बायोचार 200–500 लीटर जल का उपचार कर सकता है।
    • भारत में प्रतिदिन 70 अरब लीटर अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, जिससे प्रति वर्ष लगभग 2.5–6.3 मिलियन टन बायोचार की मांग का संकेत मिलता है।
  • अन्य प्रमुख लाभ
    • दीर्घकालिक कार्बन सिंक: 100–1000 वर्षों तक कार्बन का भंडारण।
    • प्रदूषण में कमी: खुले में जलाने, लैंडफिल उत्सर्जन और शहरी प्रदूषण को कम करता है।
    • ऊर्जा सुरक्षा में योगदान: इसके उप-उत्पाद ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाते हैं।
    • ग्रामीण रोजगार सृजन: विकेंद्रीकृत उत्पादन इकाइयों के माध्यम से लगभग 5.2 लाख रोजगार की संभावनाएँ।
    • मृदा पुनर्जीवन: मृदा पुनर्जीवन, जल धारण क्षमता और जलवायु सहनशीलता को समर्थन देता है।

मुख्य चुनौतियाँ

  • किसानों में सीमित जागरूकता: बायोचार अभी भी मुख्यतः अनुसंधान संस्थानों और पायलट परियोजनाओं तक सीमित है, तथा किसानों के बीच इसकी जागरूकता कम है।
  • उच्च प्रारंभिक निवेश: पायरोलिसिस इकाइयों और बायोचार उत्पादन अवसंरचना की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रारंभिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।
  • मानकीकरण का अभाव: फीडस्टॉक और उत्पादन विधियों में भिन्नता के कारण बायोचार की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे वृहद स्तर पर अपनाने में कठिनाई आती है।
  • कमजोर बाजार संपर्क: मूल्य शृंखलाओं के अभाव और कार्बन बाजार तक सीमित पहुंच के कारण इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
  • निगरानी और प्रमाणीकरण की चुनौतियाँ: कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करने के लिए मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) की मजबूत प्रणालियों की आवश्यकता होती है।

सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाएँ

  • केन्या: चावल की भूसी को बायोचार में परिवर्तित कर प्रमाणित कार्बन क्रेडिट उत्पन्न किए गए हैं, साथ ही मृदा pH और पोषक तत्व उपलब्धता में सुधार हुआ है।
  • थाईलैंड: बायोचार को राष्ट्रीय मृदा पुनर्वास और कार्बन प्रबंधन कार्यक्रमों में एकीकृत किया गया है तथा प्रमाणीकरण तंत्र को कार्बन रजिस्ट्री प्रणालियों से जोड़ा गया है।
  • ब्राजील: एम्ब्रापा (Embrapa) द्वारा किए गए शोध में गन्ने के बगास से निर्मित बायोचार के उपयोग से फसल उत्पादकता में महत्त्वपूर्ण सुधार प्रदर्शित हुआ है।

आगे की राह

  • विकेंद्रीकृत बायोचार उत्पादन को बढ़ावा: ग्राम स्तर और किसान उत्पादक संगठन (FPO) आधारित बायोचार इकाइयों की स्थापना की जानी चाहिए, ताकि स्थानीय रूप से उपलब्ध बायोमास को मूल्यवान मृदा-संशोधक में परिवर्तित किया जा सके।
  • कृषि कार्यक्रमों में एकीकरण: बायोचार को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, कार्बन खेती और सतत् कृषि से संबंधित पहलों में शामिल किया जाना चाहिए।
  • कार्बन बाजार पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: एक समर्पित ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए, जिससे किसान और सहकारी संस्थाएँ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट बाजारों से लाभ प्राप्त कर सकें।
  • अनुसंधान और मानकीकरण को सुदृढ़ करना: अनुसंधान संस्थानों को स्थानीय फीडस्टॉक उपलब्धता के आधार पर क्षेत्र-विशिष्ट बायोचार प्रौद्योगिकियाँ और गुणवत्ता मानक विकसित करने चाहिए।
  • बायोमास मूल्य शृंखलाओं का निर्माण: बायोमास संग्रहण, एकत्रीकरण, परिवहन और प्रसंस्करण के लिए कुशल प्रणालियाँ विकसित की जानी चाहिए, ताकि विश्वसनीय फीडस्टॉक आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
  • क्षमता निर्माण को समर्थन: विस्तार सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को बायोचार के लाभ और उपयोग के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहन: सरकार, अनुसंधान संस्थानों, निजी उद्यमों और किसान संगठनों के बीच सहयोग से प्रौद्योगिकी के प्रसार और बाजार विकास को गति मिल सकती है।

निष्कर्ष

बायोचार भारत की फसल अवशेष दहन और घटती मृदा स्वास्थ्य की दोहरी चुनौतियों का एक सतत समाधान प्रस्तुत करता है। इसके वृहद स्तर पर अपनाने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि, जलवायु सहनशीलता को सुदृढ़ करना, परिपत्र अर्थव्यवस्था प्रथाओं को बढ़ावा देना तथा दीर्घकालिक खाद्य और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

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