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विद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य, जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग

Lokesh Pal February 02, 2026 02:15 12 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मासिक स्वास्थ्य तथा विद्यालयों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) तक पहुँच, संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन एवं गरिमा के मौलिक अधिकार का अभिन्न भाग है।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • अनुच्छेद-21 और गरिमा: न्यायालय ने कहा कि “गरिमा को केवल एक अमूर्त आदर्श तक सीमित नहीं किया जा सकता”, बल्कि इसका वास्तविक परिस्थितियों में रूपांतरण आवश्यक है, जिससे व्यक्ति अपमान, बहिष्कार या टाले जा सकने वाले कष्ट के बिना जीवन जी सके।
  • ‘मासिक धर्म स्वास्थ्य’ एक मौलिक अधिकार: मासिक धर्म से गुजरने वाली छात्राओं के लिए, MHM सुविधाओं का अभाव उन्हें उपेक्षा, रूढ़िबद्ध धारणाओं और अपमान का सामना करने के लिए विवश करता है, जिससे जीवन की गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रभावित होता है।
  • विद्यालयों में MHM उपायों की कमी का प्रभाव
    • शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन: सुरक्षित एवं स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन की अनुपस्थिति में छात्राओं को या तो विद्यालय से अनुपस्थित रहना पड़ता है अथवा असुरक्षित प्रथाएँ अपनानी पड़ती हैं, जो शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
    • शैक्षिक प्रभाव: मासिक धर्म संबंधी सुविधाओं में कमी छात्राओं को गरिमा के साथ शिक्षा के अधिकार का प्रयोग करने से वंचित करती है, जिससे वे पुरुष छात्रों या स्वच्छता उत्पाद वहन करने में सक्षम छात्रों के समान स्थिति में नहीं रह पातीं हैं।
    • दीर्घकालिक प्रभाव: न्यायालय ने कहा कि प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा में बाधा का व्यक्ति के विकास तथा दीर्घकालिक सामाजिक एवं आर्थिक सहभागिता पर गंभीर व स्थायी प्रभाव पड़ता है।
  • शिक्षा में मूलभूत समानता
    • लैंगिक-विशिष्ट बाधा: सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध न कराना एक लैंगिक-विशिष्ट बाधा उत्पन्न करता है, जो विद्यालय में उपस्थिति और शिक्षा की निरंतरता में अवरोध डालता है।
    • निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा: इस प्रकार का अभाव संविधान के अनुच्छेद-21A तथा निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अंतर्गत प्रदत्त निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की सारभूत गारंटी को निष्फल करता है।
    • समानता का ढाँचा: यह निर्णय अनुच्छेद-14 के अंतर्गत मूलभूत समानता को प्रतिबिंबित करता है तथा अनुच्छेद-15(3) के अनुरूप है, जो महिलाओं और बालिकाओं के लिए विशेष उपबंधों की अनुमति देता है।
  • निजता का अधिकार एवं शारीरिक स्वायत्तता
    • शारीरिक स्वायत्तता: न्यायालय ने माना कि MHM उपायों की कमी छात्रों के निजता के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
    • विकल्प बनाम बाध्यता: सुविधाओं के अभाव में बालिकाएँ परिस्थितियों के अनुसार अपने शारीरिक प्रबंधन करने के लिए बाध्य होती हैं, जिससे वास्तविक स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
  • राज्य का दायित्व एवं शैक्षिक समानता
    • गरिमा बनाम शिक्षा: राज्य किसी बच्चे को गरिमा और शिक्षा के बीच चयन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा विकल्प अन्यायपूर्ण और असमानतापूर्ण है।
    • संवैधानिक कर्तव्य: मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य सुनिश्चित करना राज्य का एक सकारात्मक दायित्व है, जो अनुच्छेद-21 तथा शिक्षा के अधिकार से संबद्ध होता है।
  • मासिक धर्म जागरूकता में पुरुषों की भूमिका
    • संवेदीकरण: न्यायालय ने मासिक धर्म की जैविक वास्तविकता के बारे में शिक्षकों और छात्रों को शिक्षित करने के महत्त्व पर बल दिया।
    • उत्पीड़न की रोकथाम: संवेदीकरण आवश्यक है ताकि विद्यालयों में मासिक धर्म से गुजर रही छात्राओं के साथ उत्पीड़न, उपेक्षा या आक्रामक प्रश्नों को रोका जा सके।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन से तात्पर्य स्वच्छ मासिक धर्म उत्पादों की उपलब्धता, वस्त्र बदलने के लिए निजता, पर्याप्त जल एवं स्वच्छता सुविधाएँ, सुरक्षित निपटान तंत्र तथा जागरूकता से है, जिससे गरिमा के साथ मासिक धर्म का प्रबंधन संभव हो सके।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) का दायरा

  • स्वच्छता से परे: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि MHM केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शारीरिक स्वायत्तता और निर्णयात्मक स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।
  • आवश्यक सुविधाएँ: सार्थक स्वायत्तता के लिए कार्यशील शौचालय, पर्याप्त मासिक धर्म उत्पाद, जल की उपलब्धता तथा स्वच्छ निपटान तंत्र आवश्यक हैं।

ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में शीघ्र अपघटित होते हैं, परंतु ये कंपोस्टेबल या पूर्णतः जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक से भिन्न होते हैं। उदाहरण: जन औषधि सुविधा।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश:

  • सार्वभौमिक कवरेज: सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में, चाहे विद्यालय सरकारी हों या निजी, सभी विद्यालयों में MHM मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।
  • स्वच्छता अवसंरचना: विद्यालयों में कार्यशील तथा लैंगिक रूप से पृथक शौचालय उपलब्ध कराए जाने अनिवार्य होंगे।
  • सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता: ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएँगे, अधिमानतः शौचालय परिसरों में, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों के माध्यम से।
  • MHM कॉर्नर: विद्यालयों में ‘MHM कॉर्नर’ स्थापित किए जाएँगे, जिनमें अतिरिक्त अंतर्वस्त्र, अतिरिक्त यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल बैग तथा मासिक धर्म से संबंधित आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए अन्य सामग्री उपलब्ध होगी।
  • RTE अधिनियम के अंतर्गत जवाबदेही
    • सरकारी विद्यालय: यदि सरकारी विद्यालय निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 19 के मानकों (जैसे लड़कों और लड़कियों के लिए पृथक शौचालय) का पालन नहीं करते हैं, तो इसके लिए राज्य उत्तरदायी होंगे।
    • निजी विद्यालय: RTE अधिनियम के अंतर्गत समान मानकों का पालन न करने पर निजी विद्यालयों की मान्यता समाप्त की जा सकती है तथा उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: यह निर्णय सतत् विकास लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है:

  • SDG 3: अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण
  • SDG 4: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • SDG 5: लैंगिक समानता
  • SDG 6: स्वच्छ जल और स्वच्छता।

मासिक धर्म स्वच्छता का समर्थन करने वाली सरकारी पहलें

  • मासिक धर्म स्वच्छता योजना (MHS) 
    • यह योजना 10–19 वर्ष की किशोरियों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू की गई है।
    • इसके अंतर्गत निःशुल्क या रियायती दर पर सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता तथा जागरूकता एवं व्यवहार परिवर्तन संचार माध्यम प्रदान किया जाता है।
  • राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK):
    • यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत एक व्यापक किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम है।
    • इसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य, पोषण, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य सहित छह प्राथमिक क्षेत्रों को सम्मिलित किया गया है।
  • स्वच्छ भारत–स्वच्छ विद्यालय: यह पहल विद्यालयों में शौचालयों के निर्माण और रखरखाव पर केंद्रित है, जिसमें बालिकाओं के लिए पृथक शौचालयों की व्यवस्था भी शामिल है।

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