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नई कृत्रिम कोशिका

Lokesh Pal July 07, 2026 02:54 6 0

संदर्भ

हाल ही में मिनेसोटा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक कृत्रिम कोशिका (Synthetic Cell) विकसित की हैं, जो वृद्धि करने, अपने डीएनए की प्रतिकृति बनाने (DNA Replication), कोशिका विभाजन तथा प्राकृतिक चयन करने में सक्षम है। यह उपलब्धि सिंथेटिक बायोलॉजी (Synthetic Biology) तथा कोशिकीय जीवन की उत्पत्ति को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति है।

 कृत्रिम कोशिका  के बारे में

  • कृत्रिम कोशिका एक कृत्रिम रूप से अभिकल्पित, कोशिका-सदृश प्रणाली है, जिसे निर्जीव जैविक घटकों से इस प्रकार निर्मित किया जाता है कि वह प्राकृतिक जीवित कोशिकाओं के एक या अधिक आवश्यक कार्यों की अनुकृति करने में सक्षम हो।
  • संघटन: इसका निर्माण सामान्यतः लिपिड झिल्ली, DNA/RNA, प्रोटीन, एंजाइम तथा अन्य जैव-अणुओं से किया जाता है, न कि किसी उपस्थित जीवित जीव से प्राप्त कोशिका के आधार पर।
  • उद्देश्य:  कृत्रिम कोशिका वैज्ञानिकों को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को समझने, कोशिकीय प्रक्रियाओं का अध्ययन करने तथा चिकित्सा, जैव-प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान एवं औद्योगिक जीवविज्ञान में विभिन्न अनुप्रयोग विकसित करने में सहायता करती हैं।
  • प्रकार:  कृत्रिम कोशिका, उन न्यूनतम कोशिकाओं (जिनमें केवल आवश्यक घटक होते हैं) से लेकर आरंभिक कोशिकाओं/प्रोटोसेल्स (Protocells) तक होती हैं, जो जीवन के प्रारंभिक स्वरूपों की अनुकृति करने में सक्षम हैं।
  • सिंथेटिक सेल्स से कैसे अलग है: पारंपरिक सिंथिटिक सेल्स के विपरीत, जो मुख्य रूप से औषधि वितरण करने जैसे अलग-अलग कार्यों की अनुकृति करती हैं, सिंथेटिक सेल्स चयापचय, वृद्धि, प्रतिकृति तथा विभाजन सहित जीवन-सदृश अनेक एकीकृत प्रक्रियाएँ संपन्न करती हैं।

 कृत्रिम कोशिका का विनियमन 

  • जैव विविधता अभिसमय (CBD): यह जैव विविधता के संरक्षण, जैव संसाधनों के सतत् उपयोग तथा आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी, जिसमें सिंथेटिक बायोलॉजी के नवीन अनुप्रयोग भी शामिल हैं के जोखिम आकलन करता है।
  • जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल (वर्ष 2003): यह जैव विविधता अभिसमय (CBD) के अंतर्गत एक प्रोटोकॉल है, जो जीवित संशोधित जीवों (LMOs) के सीमापार सुरक्षित आवागमन, प्रबंधन एवं उपयोग को विनियमित करता है, ताकि जैव विविधता एवं मानव स्वास्थ्य को किसी भी संकट से सुरक्षित रखा जा सके।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के जैव सुरक्षा दिशा-निर्देश: ये आनुवंशिक रूप से संशोधित एवं कृत्रिम जैविक प्रणालियों से संबंधित अनुसंधान के लिए जैव सुरक्षा, जैव संरक्षा, प्रयोगशाला परिरोधन तथा जोखिम प्रबंधन संबंधी अंतरराष्ट्रीय मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
    • सिंथिटिक सेल्स के लिए वर्तमान में कोई समर्पित अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा उपलब्ध नहीं है। इनका नियमन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं के अंतर्गत जैव सुरक्षा, जैव संरक्षा तथा सिंथेटिक बायोलॉजी से संबंधित व्यापक प्रावधानों के माध्यम से किया जाता है।

नई सिंथेटिक सेल को किस प्रकार विकसित किया गया

  • लिपोसोम-आधारित कोशिका निर्माण: शोधकर्ताओं ने इसके निर्माण के आरंभिक चरण में  लिपोसोम का उपयोग किया। यह लिपिड (वसा) युक्त एक सूक्ष्म बुलबुलेनुमा संरचना होती है, जो एक कृत्रिम कोशिका झिल्ली के रूप में कार्य करता है।
  • प्रोटीन संश्लेषण तंत्र: लिपोसोम में प्रोटीन सिंथेसिस यूजिंग रिकॉम्बिनेंट एलिमेंट्स (PURE)  तंत्र उपस्थित होता है, जिसकी सहायता से जीवित कोशिकाओं की अनुपस्थिति में  DNA को प्रोटीन में परिवर्तित किया जा सकता है।
  • कृत्रिम जीनोम: कृत्रिम कोशिका में लगभग 90,000 बेस युग्मों वाला DNA जीनोम था, जिसमें वृद्धि एवं प्रजनन के लिए आवश्यक आनुवंशिक निर्देश निहित थे।
  • पोषण ग्रहण करने की प्रणाली: जीनोम में एक अल्फा-हीमोलाइसिन कूटबद्ध उपस्थित था, जिसके द्वारा आणविक हुक को विकसित कर  तथा फीडर लिपोसोमों को एकत्र कर लिपिड एवं पोषक तत्त्वों को अवशोषित किया गया।
  • जीनोम की प्रतिकृति: कोशिका विभाजन से पूर्व जीनोम की सटीक प्रतिकृति बनाने हेतु फाई29 DNA पॉलीमरेज का उपयोग किया गया।
  • जैविक कोशिका विभाजन: शोधकर्ताओं ने कोशिका झिल्ली पर उपस्थित प्रोटीन की सांद्रता में वृद्धि कर एक जैविक विभाजन तंत्र विकसित किया, जिससे झिल्ली संकुचित होकर संतति कोशिकाओं (Daughter Cells) में विभाजित हो गई।
  • क्रमिक विकास का प्रमाण: एक आनुवंशिक उत्परिवर्तन के कारण कुछ कोशिकाएँ पोषक तत्त्वों का अधिक दक्षता से उपयोग करने में सक्षम रही, जिससे पूर्णतः कृत्रिम प्रणाली में ‘डार्विन के प्राकृतिक चयन’ (Darwinian Natural Selection) के बारे में ज्ञात हुआ।

इस उपलब्धि का महत्त्व:

  • कृत्रिम जीवन के अधिक निकट: यह पूर्णतः कृत्रिम जैविक घटकों का उपयोग करते हुए जीवित प्रणालियों की प्रमुख विशेषताओं जिनमे वृद्धि, जीनोम की प्रतिकृति, कोशिका विभाजन तथा विकासवाद शामिल है, को दर्शाती है।
  • कृत्रिम जीवविज्ञान को प्रगति: यह प्रोग्राम योग्य जैविक प्रणालियों के विकास को सक्षम बनाकर तथा जीवन की आणविक प्रक्रियाओं की समझ को बेहतर बनाकर सिंथेटिक बायोलॉजी  को सुदृढ़ करती है।
  • जीवन के उद्भव को समझना: यह अध्ययन करने के लिए एक मंच प्रदान करती है कि आदिम कोशिकाएँ एवं जटिल जीवित जीव किस प्रकार विकसित हुए होंगे।
  • जैव-चिकित्सीय अनुप्रयोग: इसके संभावित अनुप्रयोगों में लक्षित औषधि वितरण, सटीक कैंसर चिकित्सा, जीन चिकित्सा, ऊतक पुनर्जनन (Tissue Regeneration), वैक्सीन विकास तथा व्यक्तिकृत चिकित्सा शामिल हैं।
  • औद्योगिक एवं पर्यावरणीय अनुप्रयोग: इसका उपयोग जैव-औषधियों के उत्पादन, एंजाइम संश्लेषण, जैव-ईंधन उत्पादन तथा पर्यावरणीय उपचार में किया जा सकता है।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान का उपकरण: यह कोशिकीय चयापचय, जीन विनियमन, प्रोटीन संश्लेषण तथा रोगों की कार्यप्रणाली के अध्ययन के लिए सरल मॉडल उपलब्ध कराती है।

चुनौतियाँ एवं नैतिक चिंताएँ

  • अपूर्ण जीवित प्रणाली: सिंथेटिक सेल्स अभी भी प्राकृतिक कोशिकाओं की तुलना में कहीं अधिक सरल हैं तथा उनमें जटिलता, अनुकूलन क्षमता एवं स्व-निर्वहनीय चयापचय का अभाव है।
  • तकनीकी चुनौतियाँ: दीर्घकाल तक जीवित रहने तथा स्थिर आनुवंशिक वंशानुक्रम वाली पूर्णतः स्वायत्त कृत्रिम कोशिकाओं का निर्माण अभी भी कठिन है।
  • जैव सुरक्षा संबंधी जोखिम: आकस्मिक उत्सर्जन, पारिस्थितिकी प्रभाव तथा संभावित दुरुपयोग जैसी आशंकाओं के कारण सुदृढ़ जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल आवश्यक हैं।
  • नैतिक एवं प्रशासनिक मुद्दे: यह कृत्रिम जीवन, स्वामित्व, जैव संरक्षा तथा विनियामक निगरानी से संबंधित अनेक चिंताएँ उत्पन्न करती है।

भारत एवं सिंथेटिक बायोलॉजी

  • राष्ट्रीय BioE3 नीति (वर्ष 2024): यह सिंथेटिक बायोलॉजी, जैव-विनिर्माण तथा उन्नत जैव-प्रौद्योगिकी को अर्थव्यवस्था, पर्यावरण एवं रोजगार सृजन के लिए बढ़ावा देती है।
  • अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (IISc), इंडियन इंस्टिट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी (IITs), काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR), डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी (DBT) तथा बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC)  जैसे संस्थान आनुवंशिक अभियांत्रिकी, सिंथेटिक बायोलॉजी एवं जीनोम प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान का विस्तार कर रहे हैं।
  • जैव-प्रौद्योगिकी दृष्टि: सिंथेटिक बायोलॉजी भारत में स्वास्थ्य सेवा नवाचार, जैव-अर्थव्यवस्था, परिशुद्ध चिकित्सा, जलवायु-सहिष्णु कृषि तथा औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी के प्रमुख स्तंभ के रूप में उभर रहा है।

आगे की राह

  • मौलिक अनुसंधान को सुदृढ़ बनाना: कृत्रिम जीवविज्ञान, प्रणाली जीवविज्ञान तथा कृत्रिम कोशिका अभियांत्रिकी में निवेश को बढ़ावा देना।
  • सुदृढ़ विनियामक ढाँचे का विकास: जैव सुरक्षा, जैव संरक्षा तथा नैतिक प्रशासन के लिए व्यापक नियामक तंत्र स्थापित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना: मानकों, उत्तरदायी नवाचार, ज्ञान-साझाकरण तथा जोखिम प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना।
  • कुशल मानव संसाधन का विकास: जीवविज्ञान, अभियांत्रिकी, कंप्यूटर विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा जैव-सूचना विज्ञान में अंतःविषय प्रशिक्षण का विस्तार करना।
  • अनुसंधान को अनुप्रयोगों में परिवर्तित करना: स्वास्थ्य सेवा, कृषि, पर्यावरण तथा औद्योगिक विनिर्माण के लिए समाधान विकसित करने हेतु शैक्षणिक संस्थानों एवं उद्योगों के मध्य साझेदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

यह उपलब्धि जैव-प्रौद्योगिकी, चिकित्सा तथा जीवन की उत्पत्ति संबंधी अनुसंधान के लिए सिंथेटिक बायोलॉजी  की परिवर्तनकारी क्षमता को रेखांकित करती है। साथ ही सिंथेटिक बायोलॉजी, प्रौद्योगिकियों के विकास के साथ सुदृढ़ जैव सुरक्षा, जैव संरक्षा तथा नैतिक प्रशासन की आवश्यकता के महत्त्व को भी उजागर करती है।

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