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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal May 02, 2026 03:15 6 0

नेवल एंटी-शिप मिसाइल–शॉर्ट रेंज (NASM-SR) 

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय नौसेना ने ओडिशा के पास बंगाल की खाड़ी के तट पर नेवल एंटी-शिप मिसाइल–शॉर्ट रेंज (NASM-SR) का पहला सामूहिक प्रक्षेपण सफलतापूर्वक किया।

संबंधित तथ्य

  • प्रथम सल्वो प्रक्षेपण क्षमता: एक ही हेलीकॉप्टर से कम समय अंतराल में दो मिसाइलों का प्रक्षेपण किया गया।
    • यह उन्नत वायु-प्रक्षेपित एंटी-शिप मिसाइल प्रणाली का पहला सामूहिक प्रक्षेपण है, जो प्रहार क्षमता और लक्ष्य संतृप्ति क्षमता को बढ़ाता है।
  • परीक्षण परिणाम: सभी उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे किए गए और रडार, विद्युत-प्रकाशिकी प्रणालियों और टेलीमेट्री के साथ एकीकृत परीक्षण रेंज द्वारा ट्रैकिंग का उपयोग करके जलरेखा प्रहार क्षमता (Waterline hit capability) की पुष्टि गई।
    • जलरेखा प्रहार क्षमता (Waterline hit capability): इसका अर्थ है कि मिसाइल जहाज को जलरेखा के स्तर पर सटीक रूप से मार सकती है ताकि अधिकतम संरचनात्मक क्षति और जहाज को डुबोने की संभावना अधिकतम हो सके।
  • नेवल एंटी-शिप मिसाइल–शॉर्ट रेंज (NASM-SR) की प्रमुख विशेषताएँ
    • प्रणोदन प्रणाली: ठोस प्रणोदक बूस्टर के साथ सहायक इंजन का प्रयोग, जो सतत् उड़ान और प्रभावी लक्ष्य साधने में सहायक है।
    • सटीक नेविगेशन: फाइबर-ऑप्टिक जाइरोस्कोप आधारित जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली, जो रेडियो अल्टीमीटर के साथ एकीकृत है, जिससे कम ऊँचाई पर सटीक मार्गदर्शन संभव होता है।
      • फाइबर-ऑप्टिक जाइरोस्कोप आधारित जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली: यह प्रकाश-आधारित सेंसरों की सहायता से मिसाइल को अपनी स्थिति, दिशा और गति का स्वयं आकलन करने में सक्षम बनाती है।
      • रेडियो अल्टीमीटर: यह रेडियो तरंगों का उपयोग कर जमीन या समुद्र सतह से ऊँचाई मापता है, जिससे कम ऊँचाई पर सटीक उड़ान संभव होती है। 
    • स्वदेशी एवियोनिक्स (Indigenous Avionics): पूर्णतः स्वदेशी और एकीकृत एवियोनिक्स मॉड्यूल, जो लक्ष्य की पहचान सुनिश्चित करता है।
    • उन्नत मार्गदर्शन: उच्च बैंडविड्थ वाले द्वि-दिशात्मक डेटा लिंक द्वारा समर्थित, जो मध्य-पथ अद्यतन और सटीक प्रहार सुनिश्चित करता है।
    • उड़ान क्षमता (Manoeuvrability): जेट-वेन, नियंत्रण प्रणाली उड़ान के दौरान स्थिरता और टर्मिनल सटीकता को बढ़ाती है।
  • उत्पादन: विकास-सह-उत्पादन भागीदारों (DcPP) द्वारा भारतीय उद्योगों और स्टार्ट-अप्स के सहयोग से निर्मित।
  • महत्त्व: यह भारत की वायु-प्रक्षेपित एंटी-शिप प्रहार क्षमता को सुदृढ़ करता है और समुद्री प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के बारे में

  • परिचय: DRDO भारत की प्रमुख रक्षा अनुसंधान संस्था है, जो उन्नत रक्षा तकनीकों और हथियार प्रणालियों के विकास के लिए जिम्मेदार है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा सुदृढ़ होती है और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।
  • स्थापना: वर्ष 1958 में तकनीकी विकास प्रतिष्ठान और रक्षा विज्ञान संगठन के विलय से इसकी स्थापना हुई।
  • मंत्रालय: यह भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • मोटो:बलस्य मूलं विज्ञानम्” (शक्ति का आधार विज्ञान है)।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली।

भारत का प्रथम हरित मेथनॉल संयंत्र 

भारत दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण में आक्रामक प्रजाति ‘प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा’ (Prosopis juliflora) का उपयोग करके अपना पहला हरित मेथनॉल उत्पादन संयंत्र स्थापित करेगा।

प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा (Prosopis juliflora) के बारे में

  • परिचय: यह मैक्सिको की मूल प्रजाति है, जिसे 1920 के दशक में वनीकरण के लिए भारत में लाया गया था।
    • व्यापक रोपण: वर्ष 1961 में गुजरात में, विशेषकर कच्छ के बन्नी घासभूमि क्षेत्र में मरुस्थलीकरण रोकने के लिए इसका बड़े पैमाने पर रोपण किया गया।
  • स्थानीय नाम: गंडो बावल (गुजरात), विलायती कीकर/विलायती बबूल (उत्तर भारत), वेलिकाथन (तमिलनाडु)।
  • प्रकृति: यह एक कठोर, सूखा-प्रतिरोधी और तेजी से बढ़ने वाला पौधा है, जिसकी जड़ें गहरी होती हैं और बीजों का प्रसार तेजी से होता है।
  • प्रसार: यह शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैल चुका है और बन्नी घासभूमि में प्रमुख रूप से पाया जाता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: यह देशी घासों को प्रतिस्थापित करता है, सघन वन निर्माण करता है, मिट्टी–जल संतुलन को प्रभावित करता है और जैव विविधता को कम करता है; इसे विश्व की प्रमुख आक्रामक प्रजातियों में गिना जाता है।
    • आक्रामक प्रजाति (Invasive Species): ऐसी गैर-स्थानीय प्रजाति जो तेजी से फैलकर पारिस्थितिकी, आर्थिक या पर्यावरणीय नुकसान पहुँचाती है।
  • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: यह चराई भूमि को कम करता है और पशुपालकों की आजीविका को प्रभावित करता है, वहीं दूसरी ओर यह ईंधन लकड़ी, कोयला और बायोमास प्रदान कर स्थानीय ऊर्जा आवश्यकताओं और आय सृजन में भी योगदान देता है।

हरित मेथेनॉल संयंत्र के बारे में प्रमुख बिंदु

  • हरित मेथेनॉल: यह एक निम्न-कार्बन ईंधन है, जो नवीकरणीय जैव-आधारित स्रोतों से गैसीकरण और उत्प्रेरक रूपांतरण के माध्यम से तैयार किया जाता है। इसमें कार्बन जीव-चक्र से प्राप्त होता है, न कि जीवाश्म ईंधनों से।
  • जैव-आधारित स्रोतों से मेथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया
    • जैव-आधारित पदार्थ को गैसीकरण द्वारा संश्लेषण गैस (Syngas) में बदला जाता है, जिसमें मुख्यतः हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड होती हैं।
    • इसके बाद इस गैस को रासायनिक प्रक्रिया (उत्प्रेरक रूपांतरण) के माध्यम से मेथेनॉल में परिवर्तित किया जाता है।
    • गैसीकरण: यह आंशिक ऑक्सीकरण की प्रक्रिया है, जो पूर्ण दहन (पूरी तरह जलना) और पायरोलिसिस (ऑक्सीजन के बिना गर्म करना) के मध्य की अवस्था होती है।
    • प्रारंभिक प्रज्वलन के बाद यह प्रक्रिया स्वयं-संचालित हो जाती है, क्योंकि उत्पन्न ऊष्मा आगे की अभिक्रियाओं को न्यूनतम बाहरी ईंधन के साथ बनाए रखती है।
  • उत्पादन और अनुप्रयोग: यह संयंत्र प्रारंभ में प्रतिदिन लगभग 5 टन मेथेनॉल का उत्पादन एक प्रदर्शन परियोजना के रूप में करेगा।
    • उत्पादित ईंधन का उपयोग समुद्री ईंधन के रूप में पारंपरिक बंकर ईंधन के स्थान पर महासागरीय जहाजों में किया जाएगा।
  • ऊर्जा आवश्यकता की सीमा: वर्तमान में यह संयंत्र संचालन के लिए ग्रिड बिजली पर निर्भर है।
  • कच्चा माल (Feedstock): इसमें प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा का उपयोग किया जाता है, साथ ही गन्ने का अवशेष (बैगास) और कपास के डंठल जैसे कृषि अवशेषों का भी उपयोग किया जा सकता है।
  • पर्यावरणीय लाभ: हरित मेथेनॉल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में 95% तक और नाइट्रोजन ऑक्साइड में 80% तक कमी लाई जा सकती है, साथ ही सल्फर ऑक्साइड और कणीय पदार्थों का उत्सर्जन लगभग समाप्त हो जाता है।
  • वैश्विक ढाँचा: यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की ग्रीनहाउस गैस रणनीति के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2050 के आसपास शिपिंग से शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना है।
  • वैश्विक बाजार प्रोत्साहन: यूरोपीय संघ द्वारा हरित ईंधन मानकों का पालन न करने वाले जहाजों पर लगाए गए दंड के कारण हरित ईंधन को अपनाने की गति बढ़ रही है।
  • आर्थिक चुनौती: जीवाश्म ईंधनों से निर्मित पारंपरिक मेथेनॉल अभी भी सस्ता है, जबकि हरित मेथनॉल और ई-मेथेनॉल उच्च उत्पादन लागत के कारण महंगे हैं।
    • ई-मेथेनॉल: यह हरित मेथेनॉल का एक प्रकार है, जो CO₂ और हरित हाइड्रोजन (नवीकरणीय ऊर्जा से) द्वारा निर्मित किया जाता है।
  • भारत में नीतिगत समर्थन: भारत ने अपने जहाज निर्माण वित्तीय सहायता नीति में संशोधन कर हरित ईंधनों (मेथनॉल, अमोनिया, हाइड्रोजन) से चलने वाले जहाजों के लिए 30% सब्सिडी का प्रावधान किया है।

दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण के बारे में

  • स्थान: गुजरात के कच्छ जिले के कांडला में, कच्छ की खाड़ी के किनारे अरब सागर तट पर स्थित।
  • उत्पत्ति: 1950 के दशक में विभाजन के बाद कराची बंदरगाह के नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए स्थापित किया गया।
  • वर्गीकरण: यह एक प्रमुख बंदरगाह है, जिसे प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 के तहत केंद्र सरकार द्वारा संचालित किया जाता है।
  • कार्गो प्रबंधन: यह भारत के सबसे बड़े प्रमुख बंदरगाहों में से एक है, जिसने 2023–24 में लगभग 132 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कार्गो प्रबंधन किया।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए SEBI ने PaRRVA को लागू किया

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बाजार मध्यस्थों के सत्यापित प्रदर्शन आँकड़ों को सुनिश्चित करने के लिए PaRRVA की शुरुआत की है।

PaRRVA के बारे में

  • पूर्ण रूप: Past Risk and Return Verification Agency (PaRRVA)
  • उद्देश्य: बाजार मध्यस्थों के प्रदर्शन से जुड़े आँकड़ों का सत्यापन कर पारदर्शिता बढ़ाना और निवेशकों का विश्वास मजबूत करना।
  • संचालन समयरेखा: पायलट चरण दिसंबर 2025 में शुरू हुआ; पूर्ण संचालन 4 मई, 2026 से आरंभ होगा।
  • कार्यान्वयन संस्थाएँ: केयर (CARE) रेटिंग्स लिमिटेड (एजेंसी) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (डेटा केंद्र)।
  • कार्य: निवेश सलाहकार, अनुसंधान विश्लेषक और एल्गो ट्रेडर्स जैसी विनियमित संस्थाओं के पिछले जोखिम और प्रतिफल के प्रदर्शन का सत्यापन करना।
  • मुख्य लाभ: निवेशकों को प्रामाणिक जोखिम-प्रतिफल आँकड़ों तक पहुँच मिलती है, जिससे भ्रामक प्रदर्शन दावों में कमी आती है।

रु-सोआम केन ब्रिज (Ru-Soam Cane Bridge)

यूनेस्को (UNESCO) ने कंचनजंघा बायोस्फीयर रिजर्व में ‘रु-सोआम केन ब्रिज’ (Ru-Soam Cane Bridges) के दस्तावेजीकरण के लिए सिक्किम सरकार के साथ साझेदारी की है।

रु-सोआम केन ब्रिज (Ru-Soam Cane Bridges) के बारे में

  • स्वदेशी इंजीनियरिंग: रु-सोआम पारंपरिक बेंत के पुल हैं, जिन्हें सिक्किम के लेप्चा समुदाय द्वारा बाँस, बेंत और लकड़ी का उपयोग करके बनाया जाता है।
  • पर्यावरण के अनुकूल डिजाइन: इनका निर्माण पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों से किया जाता है, जो स्थिरता और न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव सुनिश्चित करता है।
  • संरचनात्मक लचीलापन: इन्हें दुर्गम भू-भाग, बाढ़ और जलवायु तनाव का सामना करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो उच्च स्थायित्व प्रदर्शित करते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: ये पुल लेप्चा लोगों और प्रकृति के बीच गहरे आध्यात्मिक और पारिस्थितिकी संबंध को दर्शाते हैं।
  • जलवायु अनुकूलन मूल्य: ये संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में आपदा-लचीले और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
  • वैश्विक मान्यता: आधुनिक विज्ञान के साथ स्वदेशी ज्ञान को एकीकृत करने के लिए यूनेस्को द्वारा इनका दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।

विक्रम VT-21 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल

भारत आधुनिक, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के लिए क्षमता बढ़ाने हेतु उन्नत ‘विक्रम VT-21 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल’ विकसित कर रहा है।

‘विक्रम VT-21 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल’ के बारे में

  • विक्रम VT-21: भारत की थलसेना को आधुनिक क्षमता से युक्त करने के लिए एक उन्नत बख्तरबंद प्लेटफॉर्म है।
  • विकसित किया गया: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा।
  • प्रतिस्थापन की आवश्यकता: पुराने हो चुके BMP-2 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल बेड़े (जो 1980 के दशक से सेवा में है) को बदलने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • दोहरे संस्करण: यह पहिए युक्त (तीव्र, गतिशील) तथा ट्रैकिंग क्षमता से युक्त दोनों संस्करणों में उपलब्ध है।
  • उन्नत सुरक्षा: स्टैनैग (STANAG) स्तर 4-5 से संबद्ध, जो भारी गोलीबारी, विस्फोटों के विरुद्ध प्रतिरोध प्रदान करता है।
  • उन्नत मारक क्षमता: इसमें 30 मिमी. का ‘क्रूलेस बुर्ज’ (चालक दल रहित बुर्ज), 7.62 मिमी मशीन गन और नाग एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) दागने की क्षमता है।
  • उच्च गतिशीलता: मजबूत शक्ति-वजन अनुपात (Power-to-weight ratio), ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन और उभयचर क्षमता (हाइड्रो जेट का उपयोग करके नदियों को पार करना)।
  • मॉड्यूलर डिजाइन: इसे कई भूमिकाओं, जैसे- सैन्य परिवहन, टोही और युद्ध सहायता के लिए अनुकूलित किया जा सकता है।
  • नेटवर्क-केंद्रित क्षमता: वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र की जानकारी के लिए एकीकृत सेंसर, निगरानी और संचार प्रणाली।
  • स्वदेशीकरण पर जोर: लगभग 65% स्वदेशी सामग्री, जिसे बढ़ाकर 90% करने का लक्ष्य है, जिससे रक्षा में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
  • रणनीतिक महत्त्व: उच्च-खतरे वाले क्षेत्रों (चीन और पाकिस्तान सीमाओं) और भविष्य के नेटवर्क-केंद्रित युद्ध परिदृश्यों में संचालन के लिए महत्त्वपूर्ण है।

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