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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal June 04, 2026 04:36 10 0

मिशन स्नेहजोरी (Mission Senehjori)

सरकार ने असम के विशिष्ट मूगा रेशम क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी ‘लक्जरी टेक्सटाइल इकोसिस्टम’ में परिवर्तित करने के उद्देश्य से मिशन स्नेहजोरी’ का शुभारंभ किया है।

मिशन स्नेहजोरी (Mission Senehjori) के बारे में

  • मिशन स्नेहजोरी असम के मूगा रेशम क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी, उच्च-मूल्य वाले ‘लक्जरी टेक्सटाइल इकोसिस्टम’ में परिवर्तित करने हेतु एक क्लस्टर-आधारित पहल है।
  • नोडल एजेंसियाँ: इसका नेतृत्व पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) द्वारा किया जा रहा है, जिसमें असम सरकार, केंद्रीय रेशम बोर्ड तथा वस्त्र मंत्रालय सहयोगी संस्थाएँ हैं।
  • अवधि: मिशन स्नेहजोरी का क्रियान्वयन तीन वर्ष (2026–2028) की अवधि में किया जाएगा।
  • मिशन स्नेहजोरी के प्रमुख घटक
    • मूल्य शृंखला विकास: यह संबंधित पौधों की कृषि, रेशमकीट बीज उत्पादन, रीलिंग, बुनाई, ब्रांडिंग, निर्यात तथा पर्यटन तक संपूर्ण मूल्य शृंखला को सुदृढ़ बनाता है।
    • उत्पादक सशक्तीकरण: उत्पादकों की आय बढ़ाने के लिए कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs), सामान्य सुविधा केंद्रों (CFCs) तथा आधुनिक रीलिंग अवसंरचना को बढ़ावा देता है।
    • डिजिटल अनुरेखण एवं GI प्रमाणीकरण: उत्पाद की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने और प्रीमियम बाजारों तक पहुँच बढ़ाने के लिए GI-आधारित प्रमाणीकरण तथा डिजिटल अनुरेखण प्रणाली लागू की जाएगी।
    • पर्यटन संवर्द्धन: असम में रेशम विरासत पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मूगा सिल्क ट्रेल, सिल्क पर्यटन पार्क तथा मूगा उत्सव जैसे आयोजनों का विकास किया जाएगा।
  • निवेश लक्ष्य: इस पहल के अंतर्गत तीन वर्षों में 396–411 करोड़ रुपये के निवेश का प्रावधान किया गया है तथा वर्ष 2028 तक मूगा रेशम आधारित वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त, निर्यातोन्मुख अर्थव्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • महत्त्व: यह लगभग 2.6 लाख रेशम पालक एवं बुनकर परिवारों को समर्थन प्रदान करेगा, ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करेगा तथा असम को प्रीमियम रेशम के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायता करेगा।
  • अष्टलक्ष्मी विजन: पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों को सामूहिक रूप से अष्टलक्ष्मी” कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक राज्य की पहचान उसकी विशिष्ट आर्थिक शक्ति और विकास क्षमता के आधार पर की गई है।
  • राज्यवार विशेषीकरण: असम (मूगा रेशम), नागालैंड (कॉफी), त्रिपुरा (अनानास), सिक्किम (जैविक कृषि), अरुणाचल प्रदेश (कीवी), मिजोरम (जैविक अदरक) और मणिपुर (पोलो) को विकास एवं ब्रांडिंग के लिए प्रमुख क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया गया है।

मूगा रेशम (Muga Silk) के बारे में

  • उत्पादन: एन्थेरिया असामेन्सिस रेशम कीट द्वारा उत्पादित मूगा रेशम विश्व का एकमात्र प्राकृतिक सुनहरे रंग का रेशम है, जिसका उत्पादन मुख्यतः असम में होता है।
  • भौगोलिक संकेतक (GI): यह भारत का पहला GI-टैग प्राप्त रेशम है, जो इसकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति और प्रामाणिकता को दर्शाता है।
  • असम के लिए स्थानिक: वैश्विक मूगा रेशम उत्पादन का लगभग 90% हिस्सा असम में होता है, जिससे यह इसका प्रमुख और लगभग एकमात्र उत्पादक क्षेत्र बन जाता है।
  • विशेष गुण: यह अपनी प्राकृतिक सुनहरी रंग, उच्च स्थायित्त्व तथा समय और धुलाई के साथ अधिक चमकदार होने की विशेषता के लिए प्रसिद्ध है।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: यह असम की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है और पारंपरिक रूप से मेखला चादर, गामोसा तथा औपचारिक/पारंपरिक परिधानों के निर्माण में उपयोग किया जाता है।

बोलाइड (Bolide)

संयुक्त राज्य अमेरिका के कई नगरों के निवासियों ने तीव्र विस्फोट जैसी ध्वनियों और भूमि में कंपन महसूस होने की सूचना दी, जिसका संभावित कारण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने वाला एक बोलाइड (अत्यंत चमकीली उल्का) माना जा रहा है।

बोलाइड क्या है?

  • बोलाइड (Bolide) एक असाधारण रूप से चमकीली उल्का होता है, जो अत्यधिक वेग से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है और प्रायः स्थल तक पहुँचने से पहले ही इसमें विस्फोट हो जाता है।
  • यह मूलतः एक बड़ा फायरबाल (Fireball) उल्का होता है, जो तीव्र प्रकाश, ऊष्मा तथा कभी-कभी शक्तिशाली आघात तरंगें (Shockwave) उत्पन्न करता है।
  • विस्फोट का कारण: जब यह पिंड अत्यधिक गति से वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो घर्षण के कारण इसमें अत्यधिक ऊष्मा और दाब उत्पन्न होता है।
    • इसके परिणामस्वरूप यह पिंड विखंडित होकर वायुमंडलीय विस्फोट (Airburst) कर सकता है, जिससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।
  • बोलाइड के प्रभाव
    • विशाल क्षेत्र में दिखाई देने वाली अत्यंत चमकीली प्रकाश चमक  उत्पन्न करता है।
    • ध्वनि विस्फोट और आघात तरंगें उत्पन्न करता है, जिनसे इमारतें हिल सकती हैं।
    • भूमि तक पहुँचने से पहले इसके टुकड़े होकर उल्कापिंड बन सकते हैं।
    • अधिकांश बोलाइड वायुमंडल में ही पूरी तरह विघटित होकर बिना किसी नुकसान के नष्ट हो जाते हैं।
  • पूर्व उदाहरण: वर्ष 2013 में रूस के ऊपर चेल्याबिंस्क उल्का का वायुमंडल में विस्फोट हुआ था। इस विस्फोट से लगभग 500 किलोटन टीएनटी के बराबर ऊर्जा मुक्त हुई, जिसके कारण अनेक इमारतों को क्षति पहुँची और एक हजार से अधिक लोग घायल हो गए थे।

बोलाइड (Bolide) और उल्का (Meteor) में अंतर

  • उल्का कोई भी अंतरिक्षीय शैल होती है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय जलने लगती है, जबकि बोलाइड एक असाधारण रूप से चमकीला उल्का होता है, जो वायुमंडल में विस्फोट कर जाता है।
  • बोलाइड तीव्र प्रकाश चमक (Flash), आघात तरंगें और ध्वनि विस्फोट  उत्पन्न करता है, जबकि अधिकांश सामान्य उल्काएँ बिना किसी विस्फोट के शांतिपूर्वक जलकर नष्ट हो जाते हैं।
  • बोलाइड को प्रायः फायरबाल की श्रेणी में रखा जाता है और इसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरकर उल्कापिंड बन सकते हैं; जबकि अधिकांश सामान्य उल्काएँ आकार में छोटी और ऊर्जा की दृष्टि से कम शक्तिशाली होते हैं।

प्राइम मिनिस्टर रिसर्च चेयर (PMRC) योजना 2026

शिक्षा मंत्रालय ने भारत के अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में प्रतिष्ठित वैश्विक भारतीय शोधकर्ताओं और नवोन्मेषकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से प्राइम मिनिस्टर रिसर्च चेयर (PMRC) योजना 2026 का शुभारंभ किया है।

प्राइम मिनिस्टर रिसर्च चेयर (PMRC) योजना के बारे में

  • प्राइम मिनिस्टर रिसर्च चेयर (PMRC), शिक्षा मंत्रालय की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य विदेशों में कार्यरत भारतीय मूल के शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों और पेशेवरों को भारतीय संस्थानों के साथ सहयोग हेतु जोड़ना है।
  • उद्देश्य: वैश्विक भारतीय प्रतिभा को भारतीय विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं एवं अनुसंधान संस्थानों से जोड़कर आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्यों को समर्थन प्रदान करना।
  • प्रमुख फोकस क्षेत्र: यह योजना 13 रणनीतिक क्षेत्रों को शामिल करती है, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, अंतरिक्ष, रक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • संस्थागत ढाँचा: यह योजना प्रमुख संस्थानों, मेजबान संस्थानों तथा PMRC अध्येताओं (PMRC Fellows) पर आधारित है, ताकि मिशन-उन्मुख अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा सके और मापनीय परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें।
    • प्रमुख संस्थान: योजना के कार्यान्वयन तथा विषयगत अनुसंधान कार्यक्रमों का समन्वय करते हैं।
    • मेजबान संस्थान: अनुसंधान सुविधाएँ, प्रयोगशालाएँ तथा संस्थागत सहयोग प्रदान करते हैं।
    • PMRC अध्येताओं (PMRC Fellows): वैश्विक भारतीय विशेषज्ञ, जो भारत में अनुसंधान परियोजनाओं का संचालन एवं क्रियान्वयन करते हैं।
  • अध्येताओं (Fellows) की श्रेणियाँ
    • युवा अनुसंधान अध्येता (Young Research Fellows): प्रारंभिक कॅरियर के शोधकर्ताओं के लिए।
    • वरिष्ठ अनुसंधान अध्येता (Senior Research Fellows): अनुभवी वैज्ञानिकों एवं पेशेवरों के लिए।
    • रिसर्च चेयर (Research Chairs): वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित एवं मान्यता प्राप्त अनुसंधान नेताओं के लिए।
  • पात्रता: विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिक, भारतीय प्रवासी नागरिक (OCI) तथा भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO), जिन्होंने अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त की हों।
  • लाभ: फेलोशिप और अनुसंधान अनुदान, उन्नत प्रयोगशालाओं तथा अनुसंधान अवसंरचना तक पहुँच एवं भारत के अग्रणी संस्थानों के साथ सहयोग के अवसर।
  • चयन प्रक्रिया: संस्थानों एवं अध्येताओं का चयन प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) की अध्यक्षता वाली सशक्त समिति  द्वारा किया जाएगा।
  • प्रमुख संस्थान: सात संस्थानों को प्रमुख संस्थान के रूप में नामित किया गया है- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) हैदराबाद, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) धनबाद, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बंगलूरू।
  • पात्र मेजबान संस्थान 
    • वे सरकारी उच्च शिक्षण संस्थान जो राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग रूपरेखा (NIRF) की समग्र या अभियांत्रिकी श्रेणी में शीर्ष 100 में अथवा अनुसंधान श्रेणी में शीर्ष 50 में स्थान रखते हों।
    • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रयोगशालाएँ।

मिशन फॉर एडवांसमेंट इन हाई-इंपैक्ट एरियाज’ (MAHA) जल मिशन

अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) और जल शक्ति मंत्रालय ने जल क्षेत्र में नवाचार एवं स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के लिए मिशन फॉर एडवांसमेंट इन हाई-इंपैक्ट एरियाज (MAHA) जल मिशन’ का शुभारंभ किया है।

मिशन के बारे में 

  • यह भारत के जल क्षेत्र में नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास को गति देने हेतु एक राष्ट्रीय मंच है, जो जल संबंधी चुनौतियों के समाधान के लिए विज्ञान, शिक्षाजगत, उद्योग, स्टार्ट-अप तथा जमीनी स्तर के हितधारकों को एक साथ जोड़ता है।
  • उद्देश्य: जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनुसंधान-आधारित समाधानों को बढ़ावा देना।
    • नवाचारों को प्रयोगशाला अनुसंधान से क्षेत्रीय स्तर पर व्यावहारिक क्रियान्वयन तक पहुँचाने में सहायता प्रदान करना।
    • विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, स्टार्ट-अप, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा उद्योगों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना।
    • सतत् जल प्रबंधन के लिए विस्तार योग्य एवं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित करना।
  • वित्तीय सहायता 
    • कुल परिव्यय: 5 वर्षों की अवधि में 200 करोड़ रुपये।
    • चयनित बहु-विषयक संघों को प्रति परियोजना 20 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकती है।
    • वित्तपोषण के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास, परीक्षण, सत्यापन, प्रदर्शन तथा क्षेत्रीय क्रियान्वयन जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
  • 5 प्राथमिक विषय-वस्तुएँ: जल संसाधनों का आकलन एवं सतत् प्रबंधन।
    • पेयजल प्रौद्योगिकियाँ।
    • जल गुणवत्ता एवं पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य।
    • जल उपयोग दक्षता एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था।
    • जल क्षेत्र में जलवायु लचीलापन एवं अनुकूलन।

अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के बारे में  (Anusandhan National Research Foundation-ANRF)

  • वैधानिक निकाय: इसकी स्थापना अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) अधिनियम, 2023 के अंतर्गत की गई है, जो 5 फरवरी, 2024 से प्रभावी हुआ।
  • प्रशासनिक मंत्रालय: यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन कार्य करता है।
  • नेतृत्व: भारत के प्रधानमंत्री इसके शासी निकाय के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
  • शीर्ष अनुसंधान वित्तपोषण एजेंसी: यह प्राकृतिक विज्ञान, अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण विज्ञान और अंतःविषयक क्षेत्रों में अनुसंधान, नवाचार तथा उद्यमिता के लिए रणनीतिक दिशा एवं वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

भारत–वियतनाम ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र समझौता 

भारत ने वियतनाम को ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्रों की आपूर्ति के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर होने की आधिकारिक पुष्टि की है।

प्रमुख बिंदु

  • इंडोनेशिया समझौता: इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र सौदे को लेकर वार्ताएँ अंतिम चरण में हैं।
  • पहला विदेशी खरीदार: फिलीपींस वर्ष 2022 में 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुबंध के माध्यम से ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र का पहला विदेशी खरीदार बना था।

समझौते का महत्त्व

  • आसियान संपर्क का विस्तार: यह समझौता आसियान (ASEAN) देशों के साथ भारत की रणनीतिक भागीदारी और जुड़ाव को सुदृढ़ करता है।
  • रक्षा निर्यात को बढ़ावा: इससे उन्नत रक्षा प्रणालियों के एक उभरते हुए निर्यातक के रूप में भारत की स्थिति और मजबूत होती है।
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा: यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा सहयोग तथा रणनीतिक साझेदारियों को सशक्त बनाता है।

ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र के बारे में 

  • भारत–रूस संयुक्त उपक्रम: ब्रह्मोस एक भारत–रूस संयुक्त उपक्रम सुपरसोनिक क्रूज प्रक्षेपास्त्र है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) तथा NPO मशीनोस्ट्रोयेनिया (NPO Mashinostroyenia) द्वारा विकसित किया गया है। इसे भूमि, समुद्र, वायु तथा पनडुब्बी प्लेटफॉर्मों से प्रक्षेपित किया जा सकता है।
  • नाम की उत्पत्ति: इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा (Moskva) नदी के नामों से लिया गया है।
  • प्रकार एवं गति: यह एक सुपरसोनिक क्रूज प्रक्षेपास्त्र है, जिसकी गति लगभग मैक 2.8–3.0 है, जो इसे विश्व के सबसे तीव्र परिचालनात्मक क्रूज प्रक्षेपास्त्रों में से एक बनाती है।
  • मारक क्षमता: वर्तमान परिचालन संस्करणों की मारक क्षमता 450–500 किलोमीटर है, जबकि निर्यात संस्करण की मारक क्षमता 290 किलोमीटर है। आगामी विस्तारित-मारक क्षमता वाले संस्करणों की सीमा 800 किलोमीटर तक होगी।
  • प्रणोदन प्रणाली: इसमें दो-चरणीय प्रणोदन प्रणाली का उपयोग किया गया है, जिसमें ठोस-ईंधन बूस्टर तथा द्रव-ईंधन रैमजेट इंजन शामिल हैं। 

व्योमा इनोवेशन  चैलेंज (VYOMA Innovation Challenge)

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत डिजिटल इंडिया भाषिणी प्रभाग (DIBD) ने, करंट AI (Current AI) और कल्पा इंपैक्ट (Kalpa Impact) के सहयोग से, व्योमा इनोवेशन चैलेंज का शुभारंभ किया है।

व्योमा इनोवेशन चैलेंज (VYOMA Innovation Challenge) के बारे में

  • उद्देश्य: वंचित एवं कम सहायता प्राप्त क्षेत्रों के लिए ओपन-सोर्स, बहुभाषी और वॉइस-फर्स्ट AI समाधानों के विकास को बढ़ावा देना।
  • प्लेटफॉर्म: यह ‘सुन्नो सूत्र’ (Sunno Sutra) पर आधारित है, जिसका अनावरण इंडियाएआई इंपैक्ट समिट, 2026 में किया गया था।
  • सुन्नो सूत्र: यह भाषिणी (BHASHINI) और करेंट एआई (Current AI) द्वारा विकसित एक बहुभाषी, वॉइस-फर्स्ट, ओपन-सोर्स, हैंडहेल्ड AI संदर्भ उपकरण है।
  • प्रमुख फोकस क्षेत्र: भाषा सुलभता, डिजिटल साक्षरता, AI मॉडल अनुकूलन, हार्डवेयर नवाचार तथा तैनाती-योग्य (Deployment-ready) अनुप्रयोग।
  • प्रतिभागी: स्टार्ट-अप, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), शोधकर्ता, विद्यार्थी, शैक्षणिक संस्थान, उद्योग साझेदार तथा स्वतंत्र नवोन्मेषक।
  • सहायता: चयनित 20 टीमों को डेवलपर किट, प्लेटफॉर्म तक पहुँच तथा तकनीकी मार्गदर्शन (मेंटरशिप) प्रदान किया जाएगा।
  • प्रोत्साहन: 80 लाख रुपये तक के पुरस्कार तथा सरकारी विभागों के साथ समाधान लागू करने के अवसर प्रदान किए जाएँगे।
  • अनुप्रयोग क्षेत्र: शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, सुशासन तथा सार्वजनिक सेवा वितरण।

भाषिणी (BHASHINI – Bhasha Interface for India) के बारे में 

  • राष्ट्रीय पहल: यह इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित बहुभाषी डिजिटल समावेशन एवं भाषा प्रौद्योगिकी के लिए भारत का राष्ट्रीय मंच है।
  • कार्यान्वयन: इसका संचालन राष्ट्रीय भाषा प्रौद्योगिकी केंद्र (National Hub for Language Technology – NHLT) के माध्यम से किया जाता है।
  • मुख्य सेवाएँ: यह भारतीय भाषाओं में शासन एवं सार्वजनिक मंचों के लिए स्पीच (Speech) और टेक्स्ट (Text) आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता सेवाएँ प्रदान करता है।
  • विस्तार एवं कवरेज: यह 800 से अधिक सरकारी वेबसाइटों को शक्ति प्रदान करता है तथा 36 इंडियन टेक्स्ट भाषाओं, 23 इंडियन वॉइस भाषाओं और 35 अंतरराष्ट्रीय भाषाओं का समर्थन करता है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: यह बहुभाषी AI अनुसंधान, ओपन-सोर्स नवाचार, स्टार्ट-अप संवर्द्धन तथा शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

रुद्रम-II एयर-टू-सर्फेस मिसाइल (RudraM-II Air-to-Surface Missile)

हाल ही में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय वायु सेना (IAF) ने स्वदेशी रुद्रम-II एयर-टू-सरफेस मिसाइल का सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान से सफल परीक्षण किया। यह परीक्षण भारत की बढ़ती सटीक प्रहार (प्रिसिजन स्ट्राइक) क्षमता तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्रदर्शित करता है।

रुद्रम-II प्रक्षेपास्त्र की प्रमुख विशेषताएँ

  • स्वदेशी एंटी-रेडिएशन प्रक्षेपास्त्र: रुद्रम-II एक स्वदेशी एयर-टू-सरफेस एंटी-रेडिएशन प्रक्षेपास्त्र (ARM) है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा भारतीय वायु सेना के सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंस (Suppression of Enemy Air Defence- SEAD) अभियानों के लिए विकसित किया गया है।
  • शत्रु वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाने में सक्षम: यह प्रक्षेपास्त्र शत्रु के रडार, संचार तथा रेडियो-आवृत्ति प्रणालियों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे हवाई अभियानों के दौरान विरोधी की वायु रक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।
  • सफल उड़ान परीक्षण: इस प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमान से चुनौतीपूर्ण उड़ान परिस्थितियों में किया गया, जिसने लक्ष्य पर सटीक प्रहार की क्षमता का प्रदर्शन किया।
  • प्रदर्शन का सत्यापन: एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR), चाँदीपुर में स्थापित ट्रैकिंग प्रणालियों ने उड़ान की निगरानी की और मिशन के सभी निर्धारित मानकों की सफल प्राप्ति की पुष्टि की।
  • रुद्रम प्रक्षेपास्त्र परिवार का हिस्सा: रुद्रम शृंखला में रुद्रम-I, रुद्रम-II और रुद्रम-III शामिल हैं, जिनका उद्देश्य स्वदेशी स्तर पर सटीक प्रहार क्षमता का विकास करना है।
  • लंबी दूरी एवं हाइपरसोनिक क्षमता: इस प्रक्षेपास्त्र की अनुमानित मारक क्षमता लगभग 300 किलोमीटर है तथा यह मैक 5.5 तक की गति प्राप्त कर सकता है, जिससे दूरस्थ दूरी से सटीक प्रहार (स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक) संभव होता है।
    • मैक गति किसी वस्तु की गति का वायु में ध्वनि की गति के सापेक्ष माप है।
    • उदाहरण के लिए, मैक 1 ध्वनि की गति के बराबर होता है, जबकि मैक 5 ध्वनि की गति का पाँच गुना होता है।
  • आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: रिसर्च सेंटर इमारत (RCI), हैदराबाद और DRDO की अन्य प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित यह प्रक्षेपास्त्र भारत की स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी तथा सामरिक प्रहार क्षमता को और अधिक सशक्त बनाता है।

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