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भारत सरकार WPI को PPI से प्रतिस्थापित करेगी

Lokesh Pal June 04, 2026 04:27 9 0

संदर्भ 

हाल ही में भारत सरकार ने मुद्रास्फीति के माप की सटीकता में सुधार करने के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) को उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) से वर्ष 2031 तक चरणबद्ध तरीके से बदलने की मंजूरी दे दी है, जिसमें नए 2022-23 आधार वर्ष (Base Year) पर आधारित संशोधित सूचकांक शृंखला शामिल होगी।

संबंधित तथ्य 

  • संशोधित थोक मूल्य सूचकांक (Revised WPI) और नए उत्पादक मूल्य सूचकांक (New PPI) 15 जून को जारी होने वाले हैं।

हालिया परिवर्तनों की प्रमुख विशेषताएँ

यह अद्यतन केवल आधार वर्ष बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मूल्य मापन के लिए डेटा संग्रह और गणना की विधियों में मौलिक सुधार करता है, ताकि मूल्य निर्धारण अधिक सटीक हो सके।

  • वस्तुओं की संख्या में वृद्धि: WPI में ट्रैक किए जाने वाले वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है, ताकि भारत के आधुनिक औद्योगिक ढाँचे को बेहतर रूप से दर्शाया जा सके।
  • हरित ऊर्जा का समावेश: भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण के अनुरूप, ‘विद्युत’ समूह के अंतर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु बिजली को शामिल किया गया है।
  • बेहतर ऊर्जा समूह: कच्चा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को ‘प्राथमिक वस्तुओं’ से हटाकर ‘ईंधन एवं ऊर्जा’ समूह में स्थानांतरित किया गया है। इससे कोयला, बिजली और तेल जैसे सभी ऊर्जा उत्पाद एकीकृत समूह में आ गए हैं।

  • भार निर्धारण हेतु सकल उत्पादन मूल्य (GVO): पुरानी शृंखला में वस्तुओं के भारांक की गणना शुद्ध व्यापारिक मूल्य (Net Traded Value) यानी [सकल उत्पादन मूल्य (GVO) + आयात − निर्यात] का उपयोग करके की जाती थी।
    • नई शृंखला शुद्ध सकल उत्पादन मूल्य (Pure GVO) (यानी व्यापार समायोजन से पहले घरेलू स्तर पर उत्पादित वस्तुओं का कुल मूल्य) का उपयोग करती है। यह घरेलू उत्पादन और स्थानीय उत्पादकों के लिए इसके वास्तविक मूल्य को दर्शाता है।
  • शृंखला-आधारित विधि (Chain-Based Method): यह सूचकांक अतीत में उपयोग किए जाने वाले कठोर, दीर्घकालिक फॉर्मूले के बजाय एक अल्पकालिक, शृंखला-आधारित गणना पद्धति (जिसमें चालू महीने की कीमतों की तुलना ठीक पिछले महीने से की जाती है और उन्हें आपस में जोड़ा जाता है) का उपयोग करेगा।
  • लक्षित औसत प्रतिस्थापन: अनुपलब्ध मूल्य डेटा का अनुमान अब समान वस्तुओं की कीमतों के आधार पर लक्षित औसत प्रतिस्थापन विधि से लगाया जाएगा, न कि केवल अंतिम उपलब्ध मूल्य को आगे बढ़ाकर।
  • लिंकिंग फैक्टर (Linking Factor): पुराने और नए डेटा को जोड़ने के लिए एक ‘लिंकिंग फैक्टर’ तैयार किया गया है, जो वित्तीय वर्ष 2024–25 की कीमतों के ज्यामितीय माध्य पर आधारित है।

उत्पादक मूल्य सूचकांक (Producer Price Index – PPI) के बारे में

नया उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) ढाँचा, उन कीमतों में परिवर्तन को मापता है, जो उत्पादकों को वस्तुओं और सेवाओं के लिए प्राप्त होती हैं, इससे पहले कि वे उपभोक्ताओं तक पहुँचें। यह भारत के राष्ट्रीय लेखा की आपूर्ति और उपयोग तालिकाओं’ (Supply and Use Tables) पर आधारित भार का उपयोग करता है। इसमें तीन अलग-अलग सूचकांक शामिल हैं:-

  • आउटपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक (Output Producer Price Index- OPPI)
    • यह क्या ट्रैक करता है: यह घरेलू उत्पादकों द्वारा वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए बाजार में प्रवेश करने से पहले प्राप्त कीमतों में होने वाले औसत परिवर्तन को मापता है।
    • मूल्य निर्धारण नियम: इसे मूल मूल्य (Basic Price) (जिसमें शुद्ध कर और परिवहन/व्यापार लागत शामिल नहीं होती है) पर मापा जाता है।
    • जारी करने की समय-सीमा: यह 15 जून, 2026 से मासिक रूप से जारी किया जाएगा (जिसमें अप्रैल 2023 से 37 महीने की बैक-सीरीज भी शामिल है)। इसकी शुरुआत 125 वस्तुओं के साथ होगी और WPI के बंद होने के बाद इसे बढ़ाकर 1,500 वस्तुओं तक किया जाएगा।
  • इनपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक  (Input Producer Price Index- IPPI)
    • यह क्या ट्रैक करता है: यह उद्योगों द्वारा खरीदे गए कच्चे माल और इनपुट (लागत सामग्री) की लागत को मापता है।
    • मूल्य निर्धारण नियम: इसे क्रेता मूल्य (Purchaser’s Price) (इसमें परिवहन लागत और व्यापार मार्जिन शामिल होते हैं, क्योंकि व्यवसाय खुले बाजार से इनपुट खरीदते हैं) पर मापा जाता है।
    • जारी करने की समय-सीमा: डेटा की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए इसे मार्च 2026 से केवल विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक प्रयोगात्मक परीक्षण आधार (Experimental Trial Basis) पर मासिक रूप से प्रकाशित किया जा रहा है।
  • सेवा क्षेत्र उत्पादक मूल्य सूचकांक (Service PPI)
    • यह क्या ट्रैक करता है: यह सेवा क्षेत्र में कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है, जिससे भारत की मुद्रास्फीति मापन प्रणाली में मौजूद एक महत्त्वपूर्ण कमी को दूर किया जाता है।
    • जारी करने की समय-सीमा: यह त्रैमासिक आधार पर प्रकाशित किया जाएगा, जिसकी शुरुआत जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही से हो चुकी है।
    • प्रारंभिक 7 सेवाएँ: बैंकिंग, प्रतिभूति लेन-देन, बीमा, पेंशन फंड प्रबंधन, रेलवे, हवाई यात्री सेवाएँ और दूरसंचार। अन्य सेवाओं को बाद में जोड़ा जाएगा।

WPI से PPI की ओर परिवर्तन क्यों आवश्यक है:

थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पिछले आठ दशकों से भी अधिक समय से भारत में आपूर्ति-पक्ष की मुद्रास्फीति (supply-side inflation) को मापने का एक पारंपरिक पैमाना रहा है। हालाँकि, इसमें कई ऐसी संरचनात्मक सीमाएँ हैं, जो इसे एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए अनुपयुक्त बनाती हैं:-

  • सेवाओं का बाहर होना: WPI केवल भौतिक वस्तुओं को ट्रैक करता है। ऐसी अर्थव्यवस्था में जहाँ सेवा क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 50% से अधिक का योगदान देता है, WPI आर्थिक गतिविधियों के एक बहुत बड़े हिस्से को मापने में विफल रहता है।
  • दोहरी गणना: चूँकि WPI मध्यवर्ती थोक वितरण बिंदुओं पर कीमतों को मापता है, इसलिए एक ही कच्चे माल की कीमत की गणना आपूर्ति शृंखला में आगे बढ़ने पर कई बार हो सकती है।
  • मूल्य विकृतियाँ: WPI में उत्पादन की शुद्ध लागत के बजाय व्यापार और परिवहन मार्जिन शामिल होते हैं, जो ‘फैक्टरी-गेट’ मुद्रास्फीति (Factory-Gate inflation) अर्थात् ‘कारखाने के स्तर पर महँगाई’ की वास्तविक तस्वीर को विकृत कर देते हैं।

सुधार का महत्त्व

  • समष्टि-आर्थिक नीति और डेटा की सटीकता
    • सटीक राष्ट्रीय लेखांकन (Accurate National Accounting): वर्तमान में, सरकार नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP) को रियल जीडीपी (Real GDP) में बदलने के लिए WPI और CPI के एक अनुमानित मिश्रण का उपयोग करती है।
      • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने लंबे समय से PPI का उपयोग करने की सलाह दी है क्योंकि आउटपुट PPI एक आदर्श GDP डिफ्लेटर के रूप में कार्य करता है, जो उद्योगों के सकल मूल्य वर्द्धित (GVA) की सटीक गणना करता है।
    • बेहतर नीति निर्माण: इनपुट PPI की तुलना आउटपुट PPI से करके, नीति निर्माता यह सटीक रूप से देख सकते हैं कि कच्चे माल की बढ़ती लागत फैक्टरी-गेट (कारखाने) की कीमतों को कैसे प्रभावित करती है।
      • यह आपूर्ति-पक्ष की मुद्रास्फीति के पास-थ्रू’ प्रभाव (Pass-Through Effect) को ट्रैक करता है, जिससे RBI को खुदरा उपभोक्ताओं (CPI) तक पहुँचने से पहले औद्योगिक तनाव बिंदुओं की पहचान करने में सहायता मिलती है।
    • वैश्विक तुलनात्मकता: अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाएँ (G-20 देश जैसे अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और फ्राँस) पहले से ही PPI प्रणालियों का उपयोग करती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक तुलना आसान हो जाती है।
    • व्यापक डेटा आधुनिकीकरण (Broader Data Modernization): यह परिवर्तन भारत के केंद्रीय सांख्यिकी पारिस्थितिकी तंत्र में चल रहे समानांतर अपडेट के अनुरूप है, जिसमें सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के आधार-वर्ष को हाल ही में संशोधित कर वर्ष 2022-23 करना शामिल है।
  • सूक्ष्म आर्थिक एवं वास्तविक-विश्व अनुबंधीय समायोजन: यद्यपि RBI मौद्रिक नीति निर्णयों के लिए CPI का उपयोग करता है, फिर भी WPI व्यवसायों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना रहता है।
    • यह प्रायः दीर्घकालिक निर्माण, कच्चे माल की आपूर्ति तथा अवसंरचना अनुबंधों में मूल्य-वृद्धि खंड के अंतर्गत एक सूचकांक के रूप में उपयोग किया जाता है, ताकि भविष्य में कीमतों में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार अनुबंध शर्तों को समायोजित किया जा सके।
    • सांख्यिकीय परिवर्तन के दौरान वित्तीय एवं कानूनी व्यवधानों को रोकने हेतु सरकार ने एक सुरक्षा ढाँचा तैयार किया है:
      • 5-वर्षीय समानांतर संचालन: सरकार वर्ष 2031 तक WPI और PPI दोनों को साथ-साथ प्रकाशित करेगी, ताकि मौजूदा वाणिज्यिक अनुबंध सुचारु रूप से पूर्ण हो सकें।
      • वित्त मंत्रालय का निर्देश: व्यय विभाग एक परिपत्र जारी करेगा, जिसमें सभी सार्वजनिक एवं निजी संस्थाओं को सलाह दी जाएगी कि वर्ष 2031 के बाद समाप्त होने वाले नए दीर्घकालिक अनुबंधों को WPI के बजाय PPI से जोड़ा जाए।

महत्त्वपूर्ण शब्दावली

  • कोर मुद्रास्फीति और मूल्य सूचकांक
    • थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index- WPI): थोक मूल्य सूचकांक (WPI) थोक स्तर पर बड़े पैमाने (थोक में) व्यापार की जाने वाली वस्तुओं की कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है, इससे पहले कि वे उपभोक्ताओं तक पहुँचें। यह मुख्यतः ईंधन, विनिर्मित उत्पादों और प्राथमिक वस्तुओं में मुद्रास्फीति को ट्रैक करता है।
    • उत्पादक मूल्य सूचकांक (Producer Price Index – PPI): PPI उन कीमतों में परिवर्तन को मापता है, जो उत्पादकों को वस्तुओं और सेवाओं के लिए प्राप्त होती हैं, इससे पहले कि वे उपभोक्ताओं तक पहुँचें। यह फैक्टरी-गेट मुद्रास्फीति को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है, क्योंकि इसमें खुदरा स्तर के लागत घटक जैसे परिवहन मार्जिन और कर शामिल नहीं होते।
    • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI): CPI उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के लिए चुकाई जाने वाली खुदरा कीमतों में परिवर्तन को मापता है, जैसे भोजन, ईंधन, आवास और परिवहन। यह उपभोक्ता-स्तर की मुद्रास्फीति को दर्शाता है।
    • मुद्रास्फीति (Inflation): मुद्रास्फीति समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में निरंतर वृद्धि को दर्शाती है, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है।
    • फैक्टरी-गेट मुद्रास्फीति (Factory-Gate Inflation): यह उत्पादन या विनिर्माण स्तर पर कीमतों में होने वाले परिवर्तन को दर्शाती है, अर्थात् जब वस्तुएँ थोक या खुदरा बाजार में पहुँचने से पहले फैक्टरी से निकलती हैं।
  • प्रमुख आर्थिक एवं राष्ट्रीय लेखा आधारित शब्दावली
    • आधार वर्ष: आधार वर्ष वह संदर्भ वर्ष होता है, जिसके मुकाबले कीमतों में परिवर्तन और आर्थिक सूचकांकों की तुलना की जाती है। इसे सामान्यतः 100 का मान दिया जाता है ताकि समय के साथ मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि को मापा जा सके।
    • सकल घरेलू उत्पाद (GDP): GDP किसी देश की सीमा के भीतर एक निश्चित अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य है। यह किसी देश के आर्थिक आकार और वृद्धि का प्रमुख संकेतक है।
    • नॉमिनल GDP (Nominal GDP): यह वर्तमान बाजार कीमतों पर वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य मापता है, जिसमें मुद्रास्फीति का समायोजन नहीं किया जाता है।
    • रियल GDP (Real GDP): यह मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापता है, जिससे वास्तविक उत्पादन वृद्धि का पता चलता है।
    • GDP डिफ्लेटर (GDP Deflator): यह एक मुद्रास्फीति सूचकांक है, जो देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है तथा नॉमिनल GDP को रियल GDP में बदलने में सहायता करता है।
    • सकल मूल्य वर्द्धन (GVA): GVA उत्पादन से उत्पन्न मूल्य को दर्शाता है, जिसमें कुल उत्पादन से मध्यवर्ती इनपुट लागत को घटा दिया जाता है। यह विभिन्न क्षेत्रों के आर्थिक योगदान को दर्शाता है।
    • सकल उत्पादन मूल्य (Gross Value of Output- GVO): GVO किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य है, जिसमें निर्यात, आयात, कर या व्यापार मार्जिन के समायोजन से पूर्व का मूल्य शामिल होता है।
    • राष्ट्रीय लेखा: राष्ट्रीय लेखा किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का आधिकारिक रिकॉर्ड होता है, जिसमें उत्पादन, आय, उपभोग, निवेश और बचत शामिल होती हैं।
  • उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) का ढाँचा एवं घटक
    • उत्पादनकर्ता मूल्य सूचकांक (Output Producer Price Index- OPPI): यह सूचकांक घरेलू उत्पादकों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के लिए बाजार में बेचने से पहले प्राप्त कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।
    • इनपुट उत्पादनकर्ता मूल्य सूचकांक (Input Producer Price Index- IPPI): यह सूचकांक व्यवसायों द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे माल, ईंधन और औद्योगिक इनपुट की कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।
    • सेवा उत्पादनकर्ता मूल्य सूचकांक (Services PPI): यह बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार और परिवहन जैसी सेवाओं की कीमतों में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।
    • मूल्य आधार (Basic Price): यह वह राशि है, जो उत्पादकों को प्राप्त होती है, जिसमें उत्पाद कर, परिवहन लागत और व्यापार मार्जिन शामिल नहीं होते हैं।
    • क्रेता मूल्य (Purchaser’s Price): यह वह अनंतिम कीमत है, जो खरीदार द्वारा चुकाई जाती है, जिसमें परिवहन शुल्क, कर तथा व्यापार मार्जिन शामिल होते हैं।
  • सांख्यिकीय एवं तकनीकी शब्द
    • श्रृंखला-आधारित विधि (Chain-Based Method): यह विधि वर्तमान कीमतों की तुलना तुरंत पिछली समयावधि की कीमतों से करती है और उन्हें आपस में जोड़कर मुद्रास्फीति मापन को अधिक लचीला और अद्यतन बनाती है।
    • लक्षित औसत प्रतिस्थापन (Targeted Mean Imputation): यह एक सांख्यिकीय विधि है, जिसमें अनुपलब्ध मूल्य डेटा का अनुमान समान उत्पादों की कीमतों के आधार पर लगाया जाता है, न कि केवल पिछले मान को दोहराकर।
    • लिंकिंग फैक्टर: यह एक परिवर्तन गुणांक है, जिसका उपयोग अलग-अलग आधार वर्ष (Base Years) वाली पुरानी और नई सूचकांक शृंखलाओं को जोड़कर डेटा की तुलना को सुगम बनाने के लिए किया जाता है।
    • ज्यामितीय माध्य (Geometric Mean): यह एक गणितीय औसत है, जिसका उपयोग मूल्य सूचकांकों में इसलिए किया जाता है क्योंकि यह चरम मानों के प्रभाव को कम करता है और आनुपातिक परिवर्तनों को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है।
    • द्वि-गणना (Double Counting): जब किसी उत्पाद या कच्चे माल के मूल्य को उत्पादन या वितरण के विभिन्न चरणों में एक से अधिक बार गिना जाता है, तो उसे द्वि-गणना कहा जाता है।
  • व्यापक आर्थिक अवधारणाएँ
    • सेवा क्षेत्र: सेवा क्षेत्र में वे गतिविधियाँ शामिल होती हैं, जो अमूर्त सेवाएँ प्रदान करती हैं, जैसे बैंकिंग, परिवहन, बीमा, दूरसंचार, स्वास्थ्य सेवा और पर्यटन। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में आधे से अधिक योगदान देता है।
    • विनिर्माण क्षेत्र: विनिर्माण क्षेत्र उन उद्योगों को शामिल करता है, जो श्रम और मशीनरी की सहायता से कच्चे माल को निर्मित या अर्द्ध-निर्मित उत्पादों में परिवर्तित करते हैं।
    • पास-थ्रू’ (Pass Through) प्रभाव: ‘पास-थ्रू’ प्रभाव वह प्रक्रिया है, जिसमें उत्पादकों द्वारा वहन की गई उच्च इनपुट लागत को उपभोक्ताओं तक उच्च कीमतों के रूप में स्थानांतरित किया जाता है।
    • मौद्रिक नीति: मौद्रिक नीति उन उपायों को संदर्भित करती है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मुद्रास्फीति, मुद्रा आपूर्ति, ब्याज दरों और ऋण स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए अपनाए जाते हैं।
    • मूल्य-वृद्धि खंड (Price-Escalation Clause): यह एक अनुबंध प्रावधान है, जिसके तहत दीर्घकालिक समझौतों में मुद्रास्फीति या इनपुट लागत में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होने पर कीमतों को संशोधित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

WPI से PPI की ओर यह परिवतन सटीक फैक्टरी-गेट और सेवा-क्षेत्र की कीमतों को सुनिश्चित करता है, जीडीपी डिफ्लेशन (GDP Deflation) में सुधार करता है, नीतिगत सटीकता को मजबूत करता है, वैश्विक तुलनात्मकता को बढ़ाता है, और अनुबंधों के लिए एक पूर्वानुमानित ढाँचा प्रदान करता है, जो भारत के आर्थिक डेटा आधुनिकीकरण में एक बड़ा कदम है।

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