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संक्षिप्त समाचार

Lokesh Pal July 16, 2026 05:32 7 0

एरिथ्रुलोज (Erythrulose)

खगोलविदों ने पहली बार अंतरतारकीय अंतरिक्ष (Interstellar Space) में एरिथ्रुलोज नामक एक वास्तविक शर्करा अणु का पता लगाया है, जिससे जीवन की उत्पत्ति के संबंध में नए संकेत प्राप्त हुए हैं।

संबंधित तथ्य 

  • इस अणु की खोज स्पेन स्थित Yebes 40-मीटर तथा IRAM 30-मीटर रेडियो दूरबीनों की सहायता से की गई है।

एरिथ्रुलोज (Erythrulose) के बारे में

  • एरिथ्रुलोज एक चार-कार्बन परमाणुओं से युक्त मोनोसैकराइड अर्थात् सरल शर्करा है, जिसकी खोज पृथ्वी से लगभग 26,700 प्रकाश-वर्ष दूर, आकाशगंगा के केंद्र के निकट स्थित अंतरतारकीय आणविक बादल G+0.693−0.027 में की गई है।
    • यह अंतरतारकीय अंतरिक्ष में खोजा गया पहला वास्तविक शर्करा अणु है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • रासायनिक प्रकृति: एरिथ्रुलोज एक चार-कार्बन परमाणुओं वाला मोनोसैकराइड है, जो पूर्व में उल्कापिंडों एवं क्षुद्रग्रहों में पाए गए जटिल कार्बनिक अणुओं से भिन्न है।
    • अंतरिक्ष में प्रचुरता: वैज्ञानिकों ने पाया कि एरिथ्रुलोज, समान प्रकार की तीन-कार्बन शर्कराओं की तुलना में कम-से-कम आठ गुना अधिक मात्रा में उपस्थित है, जिससे अंतरतारकीय रासायनिक विकास संबंधी वर्तमान सिद्धांतों को चुनौती मिलती है।

जीवन के पूर्वगामी के रूप में शर्करा

  • प्रीबायोटिक महत्त्व: एरिथ्रुलोज, थ्रियोज न्यूक्लिक अम्ल (TNA) का एक रासायनिक पूर्वगामी है, जिसे RNA एवं DNA का संभावित पूर्ववर्ती माना जाता है।
    • यह इस बात का प्रमाण प्रदान करता है कि जीवन के लिए आवश्यक कार्बनिक अणु अंतरतारकीय अंतरिक्ष में स्वाभाविक रूप से निर्मित हो सकते हैं, जिससे जीवन के उद्भव से पूर्व रासायनिक विकास संबंधी सिद्धांतों को समर्थन मिलता है।
  • पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लेट हेवी बॉम्बार्डमेंट (Late Heavy Bombardment) (4.1–3.8 अरब वर्ष पूर्व) के दौरान अंतरिक्ष से आई लाखों टन शर्कराएँ पृथ्वी तक पहुँची होंगी, जिन्होंने प्रारंभिक जीवन के विकास के लिए आवश्यक जैविक अवयव उपलब्ध कराए थे।
  • एस्ट्रोबायोलॉजी के लिए निहितार्थ: यह खोज इस संभावना को और सुदृढ़ करती है कि जीवन के मूलभूत निर्माण खंड संपूर्ण आकाशगंगा में विद्यमान हो सकते हैं, जिससे पृथ्वी से परे जीवन की संभावना बढ़ जाती है।

अंतरतारकीय माध्यम (ISM) के बारे में

  • अंतरतारकीय माध्यम (Interstellar Medium–ISM) वह पदार्थ एवं विकिरण है, जो किसी आकाशगंगा में तारों के मध्य के अंतरिक्ष में विद्यमान रहता है तथा तारकीय विकास के लिए पदार्थ के भंडार के रूप में कार्य करता है।
  • संरचना: अंतरतारकीय माध्यम मुख्यतः गैस (इसके कुल द्रव्यमान का लगभग 99%), विशेष रूप से हाइड्रोजन एवं हीलियम, के साथ-साथ अंतरतारकीय धूल, कॉस्मिक किरणें तथा चुंबकीय क्षेत्र से मिलकर बना होता है।
  • चरण
    • शीत चरण (Cold Phase): सघन आणविक बादल (Dense Molecular Clouds), जहाँ नए तारों एवं ग्रह प्रणालियों का निर्माण होता है।
    • उष्ण चरण (Warm Phase): तारों के चारों ओर स्थित विरल एवं आंशिक रूप से आयनित गैस।
    • उच्च तापीय चरण (Hot Phase): सुपरनोवा विस्फोटों से उत्पन्न अत्यधिक आयनित तथा कम घनत्व वाली गैस।
  • महत्त्व: अंतरतारकीय माध्यम (ISM) आकाशगंगा के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। यह तारों के निर्माण के लिए पदार्थ उपलब्ध कराता है तथा मृतप्राय तारों (Dying Stars) से प्राप्त रासायनिक रूप से समृद्ध पदार्थ को ग्रहण करता है, जिससे आकाशगंगाओं के विकास को आकार मिलता है।

पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर प्रतिबंध 

केंद्र सरकार ने गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों एवं विशिष्ट प्रतिविष (एंटीडोट) के अभाव को देखते हुए पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया प्रारंभ की है।

  • इस निर्णय के साथ भारत, उन 70 से अधिक देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने पैराक्वाट डाइक्लोराइड के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है अथवा इसके उपयोग को कड़े रूप से सीमित किया है।
  • यह अधिसूचना विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के क्रम में जारी की गई है, जिनमें हाल ही में आंध्र प्रदेश तथा इससे पूर्व तेलंगाना, ओडिशा एवं केरल शामिल हैं।

प्रतिबंध का आधार: कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27

  • जन सुरक्षा के लिए जोखिम: यदि वैज्ञानिक साक्ष्यों अथवा विषाक्तता की घटनाओं से यह सिद्ध हो जाए कि कोई कीटनाशक मानव या पशु स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है, तो केंद्र सरकार उसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा सकती है अथवा उसे सीमित कर सकती है।
  • पंजीकरण शर्तों का उल्लंघन: यदि कोई कीटनाशक भ्रामक लेबलयुक्त हो अथवा उसका निर्माण, विक्रय या उपयोग उसके पंजीकरण में निर्दिष्ट शर्तों के उल्लंघन में किया जाए, तो उस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

पैराक्वाट डाइक्लोराइड के बारे में

  • पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक अत्यधिक विषैला, शाकनाशी है, जिसका उपयोग बुवाई से पूर्व अथवा फसल कटाई के बाद खरपतवारों को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
  • संरचना: पैराक्वाट डाइक्लोराइड, बाइपाइरिडिल (Bipyridyl) समूह के शाकनाशियों से संबंधित है।
    • यह उच्च अभिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियों (ROS) का निर्माण करता है, जो संपर्क में आने वाले हरे पौधों के ऊतकों को तीव्र गति से नष्ट कर देता है।

स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय प्रभाव

  • मानव विषाक्तता: पैराक्वाट डाइक्लोराइड अत्यंत विषैला पदार्थ है। इसके सेवन से फेफड़ों, गुर्दों एवं यकृत को अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है, जो प्रायः मृत्यु का कारण भी बन सकती है।
  • विशिष्ट एंटीडोट का अभाव: पैराक्वाट विषाक्तता के लिए कोई प्रमाणित एंटीडोट उपलब्ध नहीं है, जिससे समय पर प्रभावी उपचार करना कठिन हो जाता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: इसका अत्यधिक उपयोग मृदा एवं जल को प्रदूषित करता है, गैर-लक्षित जीवों को हानि पहुँचाता है तथा जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

ट्रायल इन एब्सेंटिया (Trial in Absentia)

पहलगाम आतंकवादी हमले के मामले में राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (NIA) द्वारा, हाफिज सईद के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अंतर्गत ट्रायल इन एब्सेंटिया (Trial in Absentia) की माँग किए जाने की संभावना है।

ट्रायल इन एब्सेंटिया (Trial in Absentia) के बारे में

  • ट्रायल इन एब्सेंटिया (Trial in Absentia) वह आपराधिक ट्रायल है, जो अभियुक्त की भौतिक उपस्थिति के बिना संचालित किया जाता है।
  • वैधानिक प्रावधान: इसका प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के अंतर्गत किया गया है।
  • प्रयोज्यता
    • यह केवल ऐसे अभियुक्त पर लागू होता है, जिन्हें BNSS की धारा 84 के अंतर्गत “फरार घोषित अपराधी (Proclaimed Offender)”  माना गया हो।
    • धारा 84(4) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप हो, जिसके लिए दंड निम्नलिखित में से कोई एक हो:
      • 10 वर्ष या उससे अधिक का कारावास, अथवा
      • आजीवन कारावास, अथवा
      • मृत्युदंड
  • उद्देश्य
    • यह फरार अभियुक्तों के कारण आपराधिक कार्यवाहियों में होने वाली अनावश्यक देरी को रोकता है।
    • यह न्याय तथा पीड़ितों के अधिकारों के मध्य संतुलन बनाए रखते हुए न्यायालयों को विचारण जारी रखने में सक्षम बनाता है।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय
    • गिरफ्तारी वारंट एवं सार्वजनिक सूचना: न्यायालय को न्यूनतम 30 दिनों के अंतराल पर लगातार दो गिरफ्तारी वारंट जारी करने होंगे तथा अभियुक्त को उपस्थित होने के लिए 30 दिनों का समय देते हुए सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करनी होगी।
    • उपस्थित होने का अवसर: आरोप तय (Framing of Charges) होने के 90 दिन बाद ही ट्रायल प्रारंभ किया जा सकता है, जिससे अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का पर्याप्त अवसर मिल सके।
    • विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार: यदि अभियुक्त का कोई अधिवक्ता नहीं है, तो निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय राज्य व्यय पर एक अधिवक्ता नियुक्त करेगा।
    • निष्पक्ष ट्रायल का संरक्षण: गवाहों की गवाही ऑडियो-विजुअल इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से दर्ज की जा सकती है तथा यदि अभियुक्त बाद में गिरफ्तार हो जाता है, तो न्याय हित में न्यायालय उसे गवाहों का प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) की अनुमति दे सकता है।

जोधपुरी मोजड़ी को GI टैग प्राप्त

केंद्र सरकार ने जोधपुरी मोजड़ी (Jodhpuri Mojari) को भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया है।

जोधपुरी मोजड़ी के बारे में

  • उत्पत्ति: यह राजस्थान के जोधपुर से उत्पन्न पारंपरिक हस्तनिर्मित चमड़े का फुटवियर है।
  • राजकीय संरक्षण: प्रारंभ में इसे राजपूत राजघरानों का संरक्षण प्राप्त था, बाद में इसे घुमंतू एवं कृषक समुदायों द्वारा भी व्यापक रूप से अपनाया गया।
  • शिल्पकार समुदाय: इसका निर्माण मुख्यतः जिंगर या जीनगर (Jingar) समुदाय द्वारा किया जाता है, जो परंपरागत रूप से काठी (Saddle) तथा चमड़े की म्यान (Leather Sheath) बनाने वाला समुदाय है।
  • विशिष्ट विशेषताएँ: यह हस्तनिर्मित चमड़े, जटिल कढ़ाई तथा अनुकूलित डिज़ाइनों के लिए प्रसिद्ध है।
  • घरेलू फुटवियर बाजार: भारत में जोधपुरी मोजड़ी की बिक्री का मूल्य लगभग ₹100 करोड़ है।
  • निर्यात बाजार: जोधपुरी मोजड़ी का वार्षिक निर्यात लगभग ₹10 करोड़ का है।

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