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“फिलैंथ्रॉपी एज रिस्क कैपिटल इन एशिया: ब्रिजिंग इनोवेशन टू इंपैक्ट” रिपोर्ट

Lokesh Pal May 22, 2026 02:00 3 0

संदर्भ

हाल ही में फिलैंथ्रॉपी एशिया समिट’ के दौरान “फिलैंथ्रॉपी एज रिस्क कैपिटल इन एशिया: ब्रिजिंग इनोवेशन टू इंपैक्ट” रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें पूरे एशिया में उच्च-जोखिम सामाजिक नवाचारों के वित्तपोषण में ‘फिलैंथ्रॉपी’ (परोपकार) की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया गया।

संबंधित तथ्य

  • इस रिपोर्ट कोसेंटर फॉर एशियन फिलैंथ्रॉपी एंड सोसायटी’ (CAPS) द्वारा तैयार किया गया तथा इसे फिलैंथ्रॉपी एशिया एलायंस (PAA) द्वारा प्रायोजित किया गया।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • अध्ययन का आधार: निष्कर्ष 10 केस स्टडी तथा परोपकारियों, सामाजिक उद्यम संस्थापकों, फंड प्रबंधकों और कार्यक्रम नेताओं के साथ 37 साक्षात्कारों पर आधारित थे।
  • सरकारों और बाजारों द्वारा छोड़े गए अंतराल की पूर्ति: अध्ययन में कहा गया कि ‘फिलैंथ्रॉपी’ उन क्षेत्रों का तेजी से समर्थन कर रही है, जहाँ सरकारें जोखिम लेने के लिए अनिच्छुक या असमर्थ हैं और जहाँ वाणिज्यिक निवेशकों को अभी लाभकारी प्रतिफल दिखाई नहीं देता।
  • एशिया में “जोखिम पूँजी” के रूप में ‘फिलैंथ्रॉपी’: एशिया में फिलैंथ्रॉपी को “जोखिम पूँजी” कहा गया है क्योंकि यह नवाचारी और उच्च-जोखिम वाली सामाजिक परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है, जिन्हें सरकारें और निजी निवेशक प्रारंभिक चरण में समर्थन देने से प्रायः संकोच करते हैं।
  • एशिया के जलवायु वित्तपोषण में कमी: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया कि एशिया को प्रतिवर्ष 200 अरब डॉलर की जलवायु अनुकूलन वित्तपोषण कमी का सामना करना पड़ता है।
  • सामाजिक प्रभाव का विस्तार: एशिया भर में परोपकारी पहलों ने कथित रूप से 13 एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में 21 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित किया है, जिनमें निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं:
    • जलवायु अनुकूलन
    • स्वास्थ्य सेवा
    • आवास
    • अपशिष्ट प्रबंधन
    • जल उपलब्धता
    • डिजिटल समावेशन।
  • सरकारी समन्वय का महत्त्व: रिपोर्ट में पाया गया कि जब परोपकारी परियोजनाएँ सरकारी प्राथमिकताओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों के साथ समन्वित होती हैं, तो उन्हें अधिक वैधता और व्यापक विस्तार प्राप्त होता है।
  • नवाचारी वित्तपोषण मॉडलों का उदय: एशियाई परोपकारी, पारंपरिक दान और अनुदानों से आगे बढ़कर निम्नलिखित की ओर अग्रसर हो रहे हैं:
    • रियायती ऋण
    • इक्विटी वित्तपोषण
    • मिश्रित वित्त मॉडल
    • सामाजिक प्रभाव निवेश।
  • रिपोर्ट में उल्लिखित महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
    • इंडोनेशिया: डेंगू नियंत्रण कार्यक्रम
      • ताहिजा फाउंडेशन ने वोल्बाकिया बैक्टीरिया के उपयोग से डेंगू प्रसार को कम करने हेतु अनुसंधान को वित्तपोषित किया।
        • इस कार्यक्रम ने डेंगू संक्रमण को लगभग 77% तक कम किया और इसे इंडोनेशिया की राष्ट्रीय स्वास्थ्य रणनीति में एकीकृत किया गया।
    • भारत: डिजिटल समावेशन पहल
      • टाटा ट्रस्ट्स ने डिजिटल इंडिया पहल के अंतर्गतहकदर्शक’ नामक कार्यक्रम का समर्थन किया।
        • इस पहल का उद्देश्य कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच में सुधार करना और कमजोर वर्गों के लिए डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देना था।
    • चीन: अपशिष्ट प्रबंधन नवाचार
      • वान्के फाउंडेशन ने चीन की शून्य-अपशिष्ट शहर पहल के अंतर्गत सामाजिक उद्यम INSPRO का समर्थन किया।
        • इस पहल ने अपशिष्ट प्रबंधन नवाचार को प्रोत्साहित किया तथा सरकारी साझेदारी के माध्यम से अपने कार्यों का विस्तार किया।

फिलैंथ्रॉपी’ क्या है? 

  • फिलैंथ्रॉपी’ शब्द का शाब्दिक अर्थ मानवता के प्रति प्रेम’ है।
  • फिलैंथ्रॉपी’ से आशय व्यक्तियों या संगठनों द्वारा धन, संसाधनों, समय या विशेषज्ञता का स्वैच्छिक दान करना है, जिसका उद्देश्य सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना तथा गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा एवं पर्यावरण संरक्षण जैसी सार्वजनिक चुनौतियों का समाधान करना होता है।
  • आधुनिक ‘फिलैंथ्रॉपी’ का बढ़ता हुआ ध्यान निम्नलिखित पर केंद्रित है:
    • दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव
    • नवाचार और प्रयोग
    • क्षमता निर्माण और संस्थागत समर्थन
    • सतत विकास के लिए सार्वजनिक-निजी सहयोग।
  • फिलैंथ्रॉपी’ के उदाहरण
    • टाटा ट्रस्ट्स द्वारा भारत में डिजिटल समावेशन पहलों का समर्थन।
    • बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा और टीकाकरण कार्यक्रमों का वित्तपोषण।
    • अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा भारत में शिक्षा और शिक्षक विकास के क्षेत्र में कार्य।

फिलैंथ्रॉपी संबंधी विचार

दृष्टिकोण 

विचारक/परंपरा 

फिलैंथ्रॉपी’ का मूल विचार

भारतीय परिप्रेक्ष्य अर्थशास्त्र चाणक्य ने सुझाव दिया कि शासकों को राजस्व का छठवाँ हिस्सा जनकल्याण और सामाजिक विकास के लिए आवंटित करना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद – ‘दरिद्र नारायण’  गरीबों की सेवा करना ईश्वर की सेवा के समान है।
महात्मा गांधी – ट्रस्टीशिप सिद्धांत  धनवान व्यक्तियों को सामाजिक संपत्ति के ट्रस्टी के रूप में कार्य करना चाहिए।
हिंदू धर्म  दान और दक्षिणा पर बल देता है।
इस्लाम  जकात (अनिवार्य दान) और सदकात (स्वैच्छिक दान) को प्रोत्साहित करता है।
बौद्ध धर्म  भिक्षा को नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में प्रोत्साहित करता है।
सिख धर्म  लंगर और मानवता की सेवा को बढ़ावा देता है।
पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य सद्गुण नैतिकता (Virtue Ethics) उदारता, करुणा और परोपकारिता को महत्त्वपूर्ण नैतिक गुण माना जाता है।
इमैनुएल कांट – कांटियन नैतिकता  दूसरों की सहायता करना, नैतिक कर्तव्य और दायित्व है।
जॉन रॉल्स – न्याय के रूप में समानता  समाज को सबसे वंचित वर्गों के कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उपयोगितावाद (Utilitarianism) फिलैंथ्रॉपी का उद्देश्य अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख सुनिश्चित करना है।
लिबर्टेरियनवाद (Libertarianism) स्वैच्छिकफिलैंथ्रॉपी’ को राज्य कल्याण की तुलना में नैतिक रूप से श्रेष्ठ माना जाता है।

भारत में ‘फिलैंथ्रॉपी’

  • भारत में फिलैंथ्रॉपी की एक दीर्घकालिक परंपरा रही है, जो दान और सेवा जैसे मूल्यों पर आधारित है।
    • हाल के वर्षों में, फिलैंथ्रॉपी का विस्तार कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पहलों तथा संस्थागत सामाजिक निवेश के माध्यम से भी हुआ है।

प्रमुख विधिक एवं संस्थागत ढाँचे

  • भारतीय न्यास अधिनियम, 1882
    • भारत में निजी न्यासों को नियंत्रित करता है।
    • न्यासियों की भूमिकाओं और दायित्वों को परिभाषित करता है।
    • परोपकारी और परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) गतिविधियों के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
  • समितियाँ पंजीकरण अधिनियम, 1860
    • शिक्षा, संस्कृति, अनुसंधान और कल्याण से संबंधित गैर-लाभकारी समितियों को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है।
    • गैर-सरकारी संगठनों और स्वैच्छिक संगठनों के पंजीकरण को सक्षम बनाता है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013: धारा 8 कंपनियाँ परोपकारी उद्देश्यों के लिए गैर-लाभकारी कंपनियों के गठन की अनुमति देता है।
    • कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (धारा 135 के अंतर्गत)
    • पात्र कंपनियों के लिए औसत शुद्ध लाभ का 2% सामाजिक विकास गतिविधियों पर व्यय करना अनिवार्य करता है।
    • भारत में कॉरपोरेट फिलैंथ्रॉपी को संस्थागत रूप प्रदान करता है।
  • आयकर अधिनियम, 1961
    • परोपकारी संगठनों के लिए कर छूट प्रदान करता है।
    • धारा 12A/12AB: पंजीकृत परोपकारी संस्थाओं के लिए कर छूट।
    • धारा 80G: पात्र ‘चैरिटीज’ को योगदान देने वाले दाताओं के लिए कर कटौती।

फिलैंथ्रॉपी’ की आवश्यकता

  • शासन संबंधी अंतराल की पूर्ति: सरकारें प्रायः वित्तीय, प्रशासनिक या राजनीतिक सीमाओं का सामना करती हैं। फिलैंथ्रॉपी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पोषण, आपदा राहत और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में समर्थन प्रदान करती है, जहाँ सार्वजनिक सेवा वितरण अपर्याप्त हो सकता है।
  • उच्च-जोखिम नवाचार का समर्थन: निजी निवेशक सामान्यतः कम या अनिश्चित लाभ संबंधी परियोजनाओं से बचते हैं। परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) वित्तपोषणजोखिम पूँजी” के रूप में कार्य करता है, जो जलवायु कार्रवाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, डिजिटल समावेशन और सामाजिक उद्यमिता में प्रयोगात्मक समाधानों का समर्थन करता है।
  • सामाजिक एवं आर्थिक असमानता में कमी: अनेक समाजों में आय, शिक्षा और अवसरों तक पहुँच में बड़ी असमानताएँ बनी रहती हैं। ‘फिलैंथ्रॉपी’ वंचित समुदायों की सहायता छात्रवृत्ति, आजीविका कार्यक्रम, कौशल विकास और सामाजिक न्याय पहलों के माध्यम से कर सकती है।
  • नागरिक समाज को सुदृढ़ करना: गैर-सरकारी संगठन, सामुदायिक समूह और जमीनी स्तर के आंदोलन प्रायः परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) समर्थन पर निर्भर होते हैं। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिक सहभागिता सुदृढ़ होती है।
  • त्वरित मानवीय प्रतिक्रिया प्रदान करना: आपदाओं, महामारियों, संघर्षों या आपात स्थितियों के दौरान, कल्याणकारी (परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक)) संगठन शीघ्रता से धन और संसाधनों का संकलन कर सकते हैं, जो कभी-कभी औपचारिक सरकारी तंत्र से भी तेज होता है।
  • समावेशी विकास को प्रोत्साहन: फिलैंथ्रॉपी केवल आर्थिक वृद्धि से आगे बढ़कर मानव गरिमा, सांस्कृतिक संरक्षण, लैंगिक समानता, दिव्यांग अधिकार और पर्यावरणीय स्थिरता में निवेश करके कल्याण को बढ़ावा देती है।
  • कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के पूरक के रूप में: भारत जैसे देशों में फिलैंथ्रॉपी, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और कल्याणकारी योजनाओं का पूरक बनकर निजी संपदा को सार्वजनिक हित के लिए संगठित करती है।
  • दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहन: अल्पकालिक राजनीतिक चक्रों के विपरीत, फिलैंथ्रॉपी शिक्षा सुधार, लोक नीति अनुसंधान, वैज्ञानिक अनुसंधान और संस्थान निर्माण जैसे संरचनात्मक सुधारों में धैर्यपूर्वक निवेश कर सकती है।

फिलैंथ्रॉपी से संबंधित चुनौतियाँ

  • नियामक बाधाएँ: जटिल विनियम और अनुपालन ढाँचे अक्सर नवाचारी वित्तपोषण मॉडलों को सीमित करते हैं।
    • भारत में, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के अंतर्गत नियमों ने कई गैर-सरकारी संगठनों के संचालन और विदेशी वित्तपोषण तक पहुँच को प्रभावित किया है।
  • कॉरपोरेट दुविधा: व्यवसायों से मुख्यतः शेयरधारकों के लिए लाभ अधिकतम करने की अपेक्षा की जाती है और अत्यधिक परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) व्यय को शेयरधारक हितों तथा परिसंपत्ति उपयोग के विपरीत माना जा सकता है।
  • सीमित जागरूकता: मिश्रित वित्त और प्रभाव निवेश तंत्रों के प्रति पर्याप्त समझ का अभाव है।
    • दक्षिण-पूर्व एशिया के कई छोटे सामाजिक उद्यम सीमित वित्तीय साक्षरता और निवेशक जागरूकता के कारण मिश्रित वित्त तक पहुँचने में कठिनाई का सामना करते हैं, जैसा कि क्षेत्रीय विकास अध्ययनों में उजागर किया गया है।
  • पारदर्शिता का अभाव: कुछ परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) पहलें पारदर्शी शासन और प्रकटीकरण प्रणालियों से वंचित होती हैं।
    • वैश्विक स्तर पर, बड़े निजी फाउंडेशनों द्वारा प्रबंधित महत्त्वपूर्ण परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) पूँजी के सीमित प्रकटीकरण पर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।
  • कमजोर सार्वजनिक जवाबदेही: सीमित सार्वजनिक निगरानी से धन के उपयोग और कार्यक्रम क्रियान्वयन में जवाबदेही कम हो सकती है।
    • एशियाई देशों में कई चैरिटी संगठनों को परियोजना परिणामों और व्यय पर अपर्याप्त सार्वजनिक रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।
  • स्वतंत्र मूल्यांकन का अभाव: अनेक परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) परियोजनाओं में सुदृढ़ निगरानी और स्वतंत्र मूल्यांकन तंत्र का अभाव होता है।
    • विकासशील क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन परियोजनाएँ, जो परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) अनुदानों से वित्तपोषित होती हैं, अक्सर प्रभाव आकलन और दीर्घकालिक मूल्यांकन में चुनौतियों का सामना करती हैं।
  • नीतिगत प्रभाव का जोखिम: बड़े परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) संस्थान बिना लोकतांत्रिक जवाबदेही के नीतिगत प्राथमिकताओं को असंतुलित रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
    • शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को आकार देने में बड़े परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) फाउंडेशनों के प्रभाव पर वैश्विक बहस इस चिंता को दर्शाती है।
  • असमान क्षेत्रीय पहुँच: परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) वित्तपोषण अक्सर शहरी या उच्च-दृश्यता वाले क्षेत्रों में केंद्रित होता है, जिससे दूरस्थ क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं।
    • दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में, ग्रामीण समुदायों को महानगरीय क्षेत्रों की तुलना में काफी कम परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) निवेश प्राप्त होता है।
  • दाता प्राथमिकताओं पर निर्भरता: विकास कार्यक्रम अत्यधिक दाता हितों और वित्तपोषण पैटर्न पर निर्भर हो सकते हैं।
    • कुछ गैर-सरकारी संगठन स्थानीय समुदाय की आवश्यकताओं के बजाय दाता प्राथमिकताओं के अनुरूप अपने कार्यक्रमों को परिवर्तित कर लेते हैं।

आगे की राह 

  • नियामक स्पष्टता को सुदृढ़ करना: प्रभावी निवेश और मिश्रित वित्त के लिए पारदर्शी एवं सक्षम विनियम विकसित किए जाएँ।
  • सार्वजनिक–फिलैंथ्रॉपी साझेदारी को बढ़ावा देना: सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, फिलान्थ्रॉपिस्ट्स और सामाजिक उद्यमों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
  • जवाबदेही को सुदृढ़ करना: परोपकारी (फिलान्थ्रॉपिक) पहलों में पारदर्शिता, नैतिक शासन और परिणाम-आधारित मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए।
  • नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन: जलवायु, स्वास्थ्य और समावेशन से संबंधित चुनौतियों के समाधान हेतु प्रारंभिक चरण के सामाजिक नवाचारों को संस्थागत समर्थन प्रदान किया जाए।
  • प्रौद्योगिकी और डेटा का उपयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्लेटफॉर्म और साक्ष्य-आधारित निगरानी का उपयोग कर दक्षता और सामाजिक प्रभाव को बढ़ाया जाए।
  • जमीनी स्तर की भागीदारी को प्रोत्साहन: समुदाय-आधारित फिलैंथ्रॉपी और विकास पहलों में स्थानीय सहभागिता को बढ़ावा दिया जाए।
  • सामाजिक उद्यमों की क्षमता निर्माण: सामाजिक उद्यमों और गैर-लाभकारी संगठनों को सुदृढ़ करने के लिए प्रशिक्षण, मार्गदर्शन तथा वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
  • प्रभावी निवेश के प्रति जागरूकता बढ़ाना: प्रभावी निवेश और मिश्रित वित्त मॉडलों की समझ बढ़ाने हेतु जागरूकता कार्यक्रम और वित्तीय साक्षरता पहलें संचालित की जाएँ।

निष्कर्ष 

  • जोखिम पूँजी के रूप में फिलैंथ्रॉपी एशिया की विकासात्मक और जलवायु चुनौतियों के समाधान में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रही है।
  • उच्च-जोखिम सामाजिक नवाचारों का समर्थन करते हुए और राज्य के प्रयासों के पूरक के रूप में कार्य करते हुए, यह समावेशी और सतत् विकास को गति दे सकती है।
  • हालाँकि, दीर्घकालिक प्रभाव के लिए पारदर्शी शासन, नियामक समर्थन और सार्वजनिक कल्याण उद्देश्यों के साथ मजबूत समन्वय आवश्यक है।

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