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जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण

Lokesh Pal July 16, 2026 02:08 6 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय में एक लंबित याचिका में जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु 24×7 न्यायिक उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु एक संस्थागत तंत्र स्थापित करने की माँग की गई है, विशेषकर देर रात की गई गिरफ्तारियों, विध्वंस अभियानों, निर्वासन तथा अन्य तात्कालिक कार्यपालिका संबंधी कार्रवाइयों के मामलों में।

संबंधित तथ्य

  • सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यालय समय के अतिरिक्त भी नागरिकों को न्यायालय तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने पर विचार करने की सहमति व्यक्त की है।

पृष्ठभूमि

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता महेराविश रीन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई की, जिसमें 24×7 न्यायिक उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु एक संस्थागत तंत्र स्थापित करने की माँग की गई थी।
  • याचिका में तर्क दिया गया कि विशेषकर देर रात में की गई गिरफ्तारियों, अत्यंत प्रातःकालीन विध्वंस अभियानों, निर्वासन तथा अन्य तात्कालिक कार्यपालिका संबंधी कार्रवाइयों के मामलों में प्रभावी न्यायिक संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय रात्रि, सप्ताहांत एवं अवकाश के दिनों में उपलब्ध रहना आवश्यक है।
  • याचिका में यह भी कहा गया कि निरंतर न्यायिक पहुँच के तंत्र का अभाव मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार, के अपरिवर्तनीय उल्लंघन का कारण बन सकता है।
  • याचिका में इस बात पर बल दिया गया कि संवैधानिक संरक्षण न्यायालय के कार्य समय तक सीमित नहीं हो सकते हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि संविधान रात्रि के समय मौन नहीं हो सकता और न ही स्वतंत्रता की रक्षा, न्यायालय की प्रातःकालीन घंटी की प्रतीक्षा कर सकती है।”

संवैधानिक आधार

अनुच्छेद-32(4)

  • अनुच्छेद-32(4) में प्रावधान है कि अनुच्छेद-32 द्वारा के तहत प्रदत्त संवैधानिक उपचार के अधिकार को संविधान में अन्यथा उपबंधित किए जाने के अतिरिक्त निलंबित नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद-226 – उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति

  • अनुच्छेद-226 प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा किसी अन्य उद्देश्य के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा की रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • इसका क्षेत्राधिकार अनुच्छेद-32 की अपेक्षा व्यापक है, क्योंकि इसका प्रयोग केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी किया जा सकता है।

अनुच्छेद-141 – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि

  • अनुच्छेद-141 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के अंतर्गत स्थित सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होगी।
  • यह पूर्वन्याय सिद्धांत के माध्यम से देशभर में विधि की व्याख्या एवं प्रयोग में एकरूपता, संगति तथा निश्चितता सुनिश्चित करता है।

जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार क्या है?

  • अनुच्छेद-21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।
  • यह अधिकार भारतीय नागरिकों तथा विदेशी नागरिकों, दोनों को प्राप्त है।
  • प्रारंभ में अनुच्छेद-21 की संकीर्ण व्याख्या प्रस्तुत की गई थी, किंतु समय के साथ इसकी व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक अनेक अधिकारों को भी सम्मिलित किया गया है।

कार्यालय के उपरांत” सतत् न्याय तंत्र क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा: यह अवैध गिरफ्तारी, मनमाने निरोध तथा अभिरक्षा संबंधी उल्लंघनों के विरुद्ध तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप सुनिश्चित करता है, जिससे अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकार का समयबद्ध संवैधानिक उपचार के माध्यम से संरक्षण होता है।
  • अपूरणीय क्षति की रोकथाम: यह न्यायालयों को विध्वंस, निर्वासन, बेदखली अथवा अन्य दमनात्मक कार्यपालिका संबंधी कार्रवाइयों पर अपूरणीय क्षति होने से पूर्व रोक लगाने में सक्षम बनाता है, जिससे संवैधानिक उपचार सार्थक बनता है।
  • कार्यपालिका के अतिक्रमण पर नियंत्रण: यह राज्य की तात्कालिक कार्रवाइयों पर निरंतर न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करता है, जिससे कार्यपालिका की शक्तियों के मनमाने प्रयोग पर रोक लगती है तथा नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था सुदृढ़ होती है।
  • विधि के शासन को सुदृढ़ करता है: यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक कार्यपालिका संबंधी कार्रवाई हर समय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन रहे, जिससे संविधान की सर्वोच्चता तथा न्याय तक निरंतर पहुँच सुनिश्चित होती है।
  • जनविश्वास को सुदृढ़ करता है: यह प्रदर्शित करता है कि जब भी मौलिक अधिकारों पर संकट आए, तब संवैधानिक उपचार उपलब्ध रहेगा, जिससे न्यायपालिका के प्रति नागरिकों का विश्वास और अधिक मजबूत होता है।

24×7 न्यायिक संरक्षण सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ

  • संस्थागत बाधाएँ: न्यायाधीशों, न्यायालयी कर्मचारियों एवं आधारभूत संरचना की कमी तथा लंबित मामलों का भारी बोझ न्यायालयों के सतत् संचालन को प्रशासनिक एवं वित्तीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बनाता है।
  • एकसमान तंत्र का अभाव: विभिन्न उच्च न्यायालय अलग-अलग आपातकालीन प्रक्रियाओं का पालन करते हैं, जिसके कारण देशभर में त्वरित संवैधानिक उपचार तक पहुँच में असमानता बनी रहती है।
  • दुरुपयोग की आशंका: सामान्य विवादों को भी तात्कालिक संवैधानिक मामला बताकर प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे आपातकालीन पीठों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है तथा वास्तव में असाधारण मामलों में राहत मिलने में विलंब हो सकता है।
  • प्रशासनिक भार: सतत् संचालन के लिए 24×7 रजिस्ट्री, तकनीकी सहायता, सुरक्षा व्यवस्था एवं न्यायालयी कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, जिससे संचालन की जटिलता एवं संसाधनों की आवश्यकता बढ़ जाती है।
  • न्यायिक स्वतंत्रता के साथ संतुलन: आपातकालीन सुनवाई के दौरान जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करते हुए न्यायिक दक्षता, संस्थागत स्वायत्तता तथा तर्कसंगत निर्णयों की गुणवत्ता को भी बनाए रखना आवश्यक है।

आगे की राह

  • राष्ट्रव्यापी मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करना: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में सभी संवैधानिक न्यायालयों में एकसमान आपातकालीन न्यायिक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया तैयार की जाए, साथ ही स्थानीय प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार आवश्यक लचीलापन भी रखा जाए।
  • 24×7 आपातकालीन न्यायिक पीठों की स्थापना करना: नियमित न्यायालयी समय के अतिरिक्त रात्रि, सप्ताहांत एवं सार्वजनिक अवकाश के दौरान तात्कालिक संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए ड्यूटी न्यायाधीशों (आपातकालीन मामलों की सुनवाई के लिए नामित न्यायाधीशों) अथवा आपातकालीन पीठों को चक्रीय आधार पर नामित किया जाए।
  • डिजिटल आपातकालीन ई-फाइलिंग पोर्टल विकसित करना: वास्तविक समय की सूचना, ई-फाइलिंग तथा स्वचालित वाद आवंटन की सुविधा वाले एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल की स्थापना की जाए, ताकि वादी एवं अधिवक्ता किसी भी स्थान से तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप प्राप्त कर सकें।
  • तात्कालिक मामलों की स्पष्ट श्रेणियाँ निर्धारित की जाएँ: अवैध निरोध, बंदी प्रत्यक्षीकरण, आसन्न विध्वंस, निर्वासन, अभिरक्षा में हिंसा तथा अन्य अपूरणीय कार्यपालिका संबंधी कार्रवाइयों जैसे मामलों को स्पष्ट रूप से तात्कालिक श्रेणी में परिभाषित किया जाए, ताकि दुरुपयोग रोका जा सके तथा समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित हो।
  • समयबद्ध प्रतिक्रिया मानक निर्धारित करना: आपातकालीन याचिकाओं की प्राप्ति की पुष्टि एक घंटे के भीतर तथा यथाशीघ्र सुनवाई जैसे स्पष्ट समय-मानक निर्धारित किए जाएँ, जिससे अपूरणीय क्षति को रोका जा सके।
  • आभासी सुनवाई की आधारभूत संरचना सुदृढ़ करना: सभी उच्च न्यायालयों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में सुरक्षित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ई-अभिलेख तथा डिजिटल संचार प्रणाली का विस्तार किया जाए, ताकि चौबीसों घंटे निर्बाध आपातकालीन सुनवाई संभव हो सके।
  • उच्च न्यायालयों की संघीय स्वायत्तता का सम्मान करना: एक समान राष्ट्रीय ढाँचा अपनाते हुए उच्च न्यायालयों को क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रक्रियाएँ निर्धारित करने की अनुमति दी जाए, जिससे न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित हो तथा न्यायपालिका की संघीय संरचना भी अक्षुण्ण रह सके।

अनुच्छेद-21 का क्रमागत विकास: सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय 

वर्ष वाद परिणाम / योगदान
1978 मेनका गांधी बनाम भारत संघ ऐतिहासिक निर्णय, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद-21 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष एवं युक्तिसंगत होनी चाहिए; अनुच्छेद-14, 19 एवं 21 के मध्य संबंध स्थापित किया।
1985 ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम जीविका के अधिकार को जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग माना।
1996 पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य आपातकालीन चिकित्सा सुविधा के अधिकार को अनुच्छेद-21 का ही भाग माना।
1997 डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य अभिरक्षा में यातना एवं मनमानी गिरफ्तारी के विरुद्ध सुरक्षा उपाय निर्धारित किए तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण को सुदृढ़ किया।
2017 न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ निजता के अधिकार को अनुच्छेद-21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार घोषित किया।
2018 कॉमन कॉज बनाम भारत संघ निष्क्रिय इच्छामृत्यु एवं अग्रिम निर्देश की अनुमति देकर गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी।
2018 नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया तथा अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमा, निजता एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता को संरक्षण प्रदान किया।
2026 मनियार इलियाज @ शेख रियाज बनाम पी. अय्यप्पन एवं अन्य निर्णय दिया कि सार्वजनिक फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार, अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।

निष्कर्ष

अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला है तथा इसे न्यायालयों के कार्य समय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। एक एकसमान, प्रौद्योगिकी-सक्षम एवं 24×7 आपातकालीन न्यायिक तंत्र की स्थापना विधि के शासन को सुदृढ़ करेगी, संविधान की सर्वोच्चता को और मजबूत बनाएगी तथा यह सुनिश्चित करेगी कि जब भी जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता संकट में हों, तब न्याय सभी के लिए 24×7 उपलब्ध रहे।

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