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Lokesh Pal
April 15, 2026 05:09
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14 अप्रैल 2026 को भारत डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 135वीं जयंती मना रहा है।

डॉ. अंबेडकर एक “सामाजिक लोकतंत्र” के पक्षधर थे, जिसमें राजनीतिक समानता के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक न्याय को भी समान रूप से सुनिश्चित किया जाए। उनके विचार आज भी असमानता, सुशासन एवं समावेशी विकास पर होने वाली समकालीन बहसों के केंद्र बिंदु बने हुए हैं।

डॉ. अंबेडकर की उपलब्धियाँ केवल संस्थानों के निर्माण तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने राज्य के उद्देश्य को ही पुनर्परिभाषित किया—जहाँ राज्य का कार्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि सभी के लिए न्याय, गरिमा एवं समानता सुनिश्चित करना है।

अंबेडकर का बौद्ध धर्म ग्रहण मात्र एक धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि आत्म-सम्मान, गरिमा और पहचान की एक क्रांतिकारी अभिव्यक्ति था, जिसने भारत में सामाजिक लोकतंत्र के लिए नैतिक आधार प्रदान किया।
भारत जब असमानता, संस्थागत अखंडता और सामाजिक एकता की चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब अंबेडकर के विचार अत्यंत प्रासंगिक बने हुए हैं, जो एक न्यायसंगत, समावेशी और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित लोकतंत्र के निर्माण की आवश्यकता को सुदृढ़ करते हैं।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर की विरासत आधुनिक भारत की आधारशिला है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजनीतिक लोकतंत्र, सामाजिक समानता के बिना स्थायी नहीं हो सकता है। उनके दृष्टिकोण का पुनःअधिग्रहण करना संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखना है, जिससे यह सुनिश्चित हो कि “एक व्यक्ति, एक मूल्य” सभी के लिए एक जीवंत वास्तविकता बन सके।
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