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Lokesh Pal
March 14, 2026 02:34
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हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केवल माता-पिता की आय के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का कोई उम्मीदवार “क्रीमी लेयर” में आता है और इसलिए आरक्षण लाभ के लिए अयोग्य है।


सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया है कि भारत में सामाजिक न्याय केवल आर्थिक गणना का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति और गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। वर्ष 2004 की भेदभावपूर्ण व्याख्या को निरस्त करके न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि ओबीसी आरक्षण व्यवस्था सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए एक निष्पक्ष और तर्कसंगत साधन बनी रहे, जैसा कि मंडल आयोग और भारतीय संविधान की मूल भावना में परिकल्पित किया गया था।
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