100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर द्वारा दल-बदल पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा के सवाल पर विचार किया

Lokesh Pal March 27, 2025 04:49 47 0

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय इस बात की जाँच कर रहा है कि क्या संवैधानिक अदालतें विधानसभा अध्यक्षों को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर एक विशिष्ट समय सीमा के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दे सकती हैं।

दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता

  • परिचय: दल-बदल विरोधी कानून, वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया गया था, जिसमें भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को शामिल किया गया था।
    • इस कानून का उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को रोकना और सरकार में स्थिरता सुनिश्चित करना है।
  • अयोग्यता के आधार: किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य अयोग्य घोषित किया जाता है यदि:
    • स्वैच्छिक त्याग-पत्र: सदस्य स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
    • पार्टी के विरुद्ध मतदान: सदस्य सदन में बिना पूर्व अनुमति के पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से दूर रहता है तथा 15 दिनों के भीतर इस कृत्य को क्षमा नहीं किया जाता है।
  • अयोग्यता के अपवाद
    • पार्टी का विलय: यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई बहुमत से सदस्य किसी अन्य पार्टी के साथ विलय के लिए सहमत हो जाते हैं।
    • पीठासीन अधिकारी की छूट: यदि कोई अध्यक्ष, चेयरमैन या उप-अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पद खाली करने के बाद फिर से पार्टी में शामिल हो जाता है।

पृष्ठभूमि: तेलंगाना विधायक अयोग्यता याचिकाएँ

  • न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ अयोग्यता कार्यवाही से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
  • ये याचिकाएँ तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लंबित अयोग्यता मामलों पर समय पर कार्रवाई की माँग करते हुए दायर की गई थीं।

दल-बदल विरोधी कानून के तहत अध्यक्ष की शक्तियाँ

  • अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार: सदन का पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष) दल-बदल के कारण उत्पन्न अयोग्यता से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेता है।
  • न्यायिक समीक्षा (किहोतो होलोहन मामला, 1992): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम नहीं है और इसे अदालतों में चुनौती दी जा सकती है।
    • यह निर्णय दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य या दुराग्रह जैसे आधारों पर न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

दलबदल के कारण अयोग्यता पर सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान दृष्टिकोण

  • सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय ने पहले स्पीकर से दल-बदल विरोधी मामलों को “उचित समय” के भीतर तय करने का आग्रह किया था।
  • निर्धारित समय-सीमा का अभाव: अदालत ने यह निर्दिष्ट नहीं किया था कि स्पीकर के संवैधानिक पद के संबंध में “उचित” समय क्या होना चाहिए।
  • वर्तमान न्यायिक विचार: सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न पर विचार किया कि “क्या संवैधानिक न्यायालय इतना शक्तिहीन है कि वह अध्यक्ष जैसे संवैधानिक प्राधिकरण को संविधान के तहत अपने अधिदेश का पालन करने का निर्देश नहीं दे सकता”।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का त्रि-परीक्षण सूत्र: सादिक अली बनाम भारत के चुनाव आयोग (1971) में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए तीन मानदंड निर्धारित किए कि किस गुट को चुनाव आयोग द्वारा मूल राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए:
    • पार्टी के उद्देश्य और लक्ष्य: पार्टी की वैचारिक और नीतिगत प्रतिबद्धताएँ।
    • आंतरिक पार्टी लोकतंत्र: पार्टी अपने संविधान का कितना पालन करती है, जिससे लोकतांत्रिक कामकाज सुनिश्चित होता है।
    • बहुमत का समर्थन: विधायी और संगठनात्मक दोनों विंग में एक गुट की संख्यात्मक शक्ति।

याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए तर्क

  • पिछले न्यायिक हस्तक्षेप: सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी विभिन्न विधानसभाओं के अध्यक्षों से आग्रह किया है कि वे दसवीं अनुसूची के तहत उनके समक्ष दायर लंबे समय से लंबित याचिकाओं पर निर्णय लें। यह समय पर निर्णय सुनिश्चित करने में न्यायिक निगरानी के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • अर्द्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण के रूप में अध्यक्ष: चूँकि अध्यक्ष एक अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, इसलिए उनके निर्णयों की न्यायिक समीक्षा की जानी चाहिए।
  • अतिक्रमण के बिना न्यायिक निगरानी: हालाँकि न्यायालय अध्यक्षों को उनके अधिकार का प्रयोग करने से नहीं रोक सकते, वे अध्यक्ष को उनके संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करने का निर्देश दे सकते हैं।
  • राजनीतिक पूर्वाग्रह और विलंबित न्याय: अक्सर राजनीतिक विचार अध्यक्ष के निर्णय लेने को प्रभावित करते हैं, जिससे लंबे समय तक देरी होती है। समयबद्ध दृष्टिकोण दल-बदल विरोधी कानून के पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग की संभावना को कम करेगा।
  • एक निश्चित समय सीमा की आवश्यकता: अयोग्यता याचिकाओं का समय पर समाधान सुनिश्चित करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने चार सप्ताह की समय सीमा का प्रस्ताव दिया है। ऐसी समय सीमा दसवीं अनुसूची की भावना को बनाए रखेगी और रणनीतिक देरी को रोकेगी।
  • देरी की रणनीति के माध्यम से हेर-फेर को रोकना: एक आम राजनीतिक रणनीति यह है कि अयोग्यता याचिकाओं को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने तक लंबित रखा जाए, जिससे वे अप्रभावी हो जाएँ।

समय सीमा लागू करने के विरुद्ध तर्क

  • अध्यक्ष की संवैधानिक स्वायत्तता: विरोधी पक्ष ने तर्क दिया कि संविधान के अनुसार अध्यक्ष को किसी विशिष्ट समय सीमा से बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • निर्णय लेने में विवेकाधिकार: उन्होंने तर्क दिया कि अध्यक्ष, एक संवैधानिक प्राधिकारी होने के नाते, बिना किसी बाहरी दबाव के मामलों पर निर्णय लेने का विवेकाधिकार होना चाहिए।

अध्यक्ष से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • नियुक्ति: अनुच्छेद-93 (लोकसभा) / अनुच्छेद-178 (राज्य विधानसभा) – निर्दिष्ट करता है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव संबंधित सदन के सदस्यों द्वारा किया जाएगा।
  • रिक्ति और निष्कासन: अनुच्छेद-94 (लोकसभा) / अनुच्छेद-179 (राज्य विधानसभा) – ऐसी शर्तें निर्धारित करता है, जिनके तहत अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद छोड़ सकते हैं, त्यागपत्र दे सकते हैं अथवा उन्हें हटाया जा सकता है।
  • उपाध्यक्ष के कर्तव्य: अनुच्छेद-95 (लोकसभा) / अनुच्छेद-180 (राज्य विधानसभा) – अध्यक्ष के अनुपस्थित होने पर उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के कर्तव्यों का वहन करता है।
  • अध्यक्षता पर प्रतिबंध: अनुच्छेद-96 (लोकसभा) / अनुच्छेद-181 (राज्य विधानसभा) – अध्यक्ष या उपाध्यक्ष कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते हैं, जब उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव पर चर्चा चल रही हो।
  • वेतन एवं भत्ते: अनुच्छेद-97 (लोकसभा) / अनुच्छेद-186 (राज्य विधानसभा) – अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते का प्रावधान करता है।

निर्णय के संभावित निहितार्थ

  • राजनीतिक दुरुपयोग को रोकना: यदि सर्वोच्च न्यायालय कोई समय सीमा निर्धारित करता है, तो इससे सत्तारूढ़ दलों के पक्ष में देरी के दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
  • उत्तरदायित्व और पारदर्शिता बढ़ाना: एक विशिष्ट समय सीमा अयोग्यता कार्यवाही में अधिक उत्तरदायित्व और पारदर्शिता ला सकती है।
  • निरंतर देरी का जोखिम: यदि कोई सख्त समय सीमा निर्धारित नहीं की जाती है, तो देरी और राजनीतिक हस्तक्षेप की यथास्थिति जारी रह सकती है।

सुझाए गए सुधार

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष मणिपुर विधानसभा एवं अन्य (2020) में
    • संविधान में संशोधन: न्यायालय ने संसद को संविधान में संशोधन करने का सुझाव दिया ताकि अयोग्यता के मामलों में अध्यक्ष की भूमिका को अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में पुनः परिभाषित किया जा सके।
    • स्वतंत्र न्यायाधिकरण: अध्यक्ष के स्थान पर अयोग्यता के मामलों को सँभालने के लिए एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण की सिफारिश की।
      1. न्यायाधिकरण का नेतृत्व सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाना चाहिए।
      2. त्वरित और निष्पक्ष निर्णयों के लिए अन्य स्वतंत्र तंत्रों की भी खोज की जा सकती है।
  • दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग: दल-बदल के आधार पर सदस्यों की अयोग्यता का निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा चुनाव आयोग की सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए, जिससे अधिक निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।

आगे की राह 

  • स्वतंत्र न्यायाधिकरण: अयोग्यता मामलों के लिए अध्यक्ष के स्थान पर सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायाधिकरण बनाया जाए (जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में सुझाया था)।
  • सर्वोत्तम प्रथाओं के लिए सीख 
    • उदाहरण: यू.के. (यूनाइटेड किंगडम) में सदन के अध्यक्ष से पूरी तरह निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। चुने जाने के बाद, वे अपनी पार्टी से संबद्धता छोड़ देते हैं और सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं होते हैं, जिससे संसदीय कार्यवाही में निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
  • न्यायिक निरीक्षण: अध्यक्ष के पक्षपात या प्रक्रियात्मक त्रुटि की जाँच करने के लिए न्यायिक समीक्षा को मजबूत करना।
  • दल-बदल विरोधी कानून सुधार: स्वैच्छिक त्याग-पत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और असहमति को दल-बदल से अलग करना।

निष्कर्ष 

निष्पक्षता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अखंडता को बनाए रखने के लिए अयोग्यता प्रक्रिया में सुधार करना महत्त्वपूर्ण है। निर्णय लेने में तटस्थता सुनिश्चित करने से संसदीय संस्थाओं में जनता का विश्वास मजबूत होगा।

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.