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अध्यादेश का प्रयोग और संसदीय अनुपस्थिति

Lokesh Pal June 04, 2026 04:15 60 0

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रख्यापित किया गया।

संबंधित तथ्य

  • इस कदम ने अध्यादेशों पर बढ़ती निर्भरता तथा विधायी निर्णय-निर्माण में संसद की घटती भूमिका पर पुनः बहस को जन्म दिया है।

अध्यादेशों का संवैधानिक ढाँचा

अनुच्छेद 123: राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति

  • अनुच्छेद-123 भारत के राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान करता है कि जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और परिस्थितियाँ तात्कालिक विधायी कार्रवाई की माँग करें, तब वे अध्यादेश जारी कर सकते हैं।
  • अध्यादेश को संसद के अधिनियम के समान बल और प्रभाव प्राप्त होता है, जिससे यह कार्यपालिका द्वारा बनाया गया एक अस्थायी कानून बन जाता है।
  • अध्यादेश को संसद के पुनः एकत्र होने पर उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है तथा पुनः एकत्र होने की तिथि से छह सप्ताह के भीतर इसे संसदीय स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
    • यदि निर्धारित अवधि के भीतर संसद द्वारा इसे स्वीकृति नहीं दी जाती है, तो यह स्वतः ही निरस्त हो जाता है।

अध्यादेश का प्रख्यापन

  • अध्यादेश जारी करने का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिया जाता है, क्योंकि संसदीय प्रणाली के अंतर्गत राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है।
  • अध्यादेश जारी करने से पूर्व, प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
  • राष्ट्रपति, यदि उपयुक्त समझें, तो इस सिफारिश को पुनर्विचार के लिए मंत्रिपरिषद को वापस भेज सकते हैं।
  • हालाँकि, यदि मंत्रिपरिषद अपनी सलाह को पुनः दोहराते हुए प्रस्ताव पुनः प्रस्तुत करती है, तो राष्ट्रपति संवैधानिक रूप से बाध्य होते हैं कि वे अध्यादेश जारी करें, चाहे सलाह में कोई परिवर्तन किया गया हो या नहीं।

अध्यादेश की वापसी एवं अवैधता

  • राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर, अध्यादेश की अवधि समाप्त होने से पूर्व किसी भी समय उसे वापस ले सकते हैं।
  • यदि संसद के दोनों सदन निर्धारित छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पूर्व अध्यादेश को अस्वीकृत करने हेतु प्रस्ताव पारित कर दें, तो अध्यादेश प्रभावहीन हो जाता है
  • व्यवहार में, संसद द्वारा अध्यादेश का अस्वीकार किया जाना यह संकेत दे सकता है कि सरकार को विधायिका का विश्वास प्राप्त नहीं रहा, जिसके महत्त्वपूर्ण राजनीतिक निहितार्थ होते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, यदि कोई अध्यादेश ऐसे विषय पर कानून बनाने का प्रयास करता है जो संसद की विधायी क्षमता के बाहर है, तो वह आरंभ से ही शून्य (void ab initio) माना जाता है।
  • संसद के अधिनियम की भांति, अध्यादेश को भी संविधान के अनुरूप होना आवश्यक है तथा यदि उसका कोई प्रावधान संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial review) के माध्यम से उसे निरस्त कर सकते हैं।

संविधान सभा का उद्देश्य

  • संविधान सभा ने अध्यादेश निर्माण की शक्ति को एक असाधारण विधायी तंत्र के रूप में परिकल्पित किया था, जिसका उपयोग उन परिस्थितियों में किया जाना था, जहाँ संसद सत्र में न हो और तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो।
  • इसे संसदीय बहस और परीक्षण को दरकिनार करने या सामान्य विधायी प्रक्रिया के विकल्प के रूप में उपयोग करने का उद्देश्य नहीं था।

अध्यादेश निर्माण शक्ति संबंधी न्यायिक सुरक्षा उपाय 

मामला (वर्ष) स्थापित प्रमुख सिद्धांत
आर.सी. कूपर (1970) अध्यादेश संवैधानिक सीमाओं और न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होते हैं।
ए.के. रॉय (1982) अध्यादेशों का उपयोग केवल वास्तविक आपात स्थितियों में किया जाना चाहिए।
डी.सी. वाधवा (1987) अध्यादेशों का पुनः प्रख्यापन संवैधानिक नहीं है।
कृष्ण कुमार सिंह (2017) अध्यादेश निर्माण की शक्ति न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है और इसे नियमित विधायी प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता है।

अध्यादेशों के बार-बार उपयोग से उत्पन्न चिंताएँ 

  • कार्यपालिका का अतिक्रमण: अध्यादेशों का अत्यधिक उपयोग विधायिका के स्थान पर कार्यपालिका की कानून बनाने की भूमिका को सुदृढ़ करता है।
    • यह कार्यपालिका और संसद के मध्य संवैधानिक संतुलन को बाधित करता है।
    • अध्यादेश निर्माण को विधायी प्रतिरोध या राजनीतिक परीक्षण से बचने के साधन के रूप में देखा जा सकता है।
  • कानून निर्माण में संसदीय सर्वोच्चता का क्षरण: संसद केवल कार्यपालिका द्वारा लिए गए निर्णयों को अनुमोदित करने वाली संस्था बन सकती है।
    • फलस्वरूप, नीति निर्माण एवं कानून निर्माण में विधायिका की भूमिका कम हो जाती है।
    • ऐसी प्रवृत्तियाँ संविधान में निहित उत्तरदायी सरकार की भावना को कमजोर करती हैं।
  • सार्वजनिक उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता में कमी: संसदीय बहस नागरिकों को प्रस्तावित कानूनों के गुण-दोष का आकलन करने का अवसर देती है।
    • अध्यादेश इस सार्वजनिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हैं, जिससे पारदर्शिता, जन परीक्षण, तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के अवसर सीमित हो जाते हैं।
    • नागरिक विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच बहस एवं सामंजस्य की प्रक्रिया को देखने से वंचित रह जाते हैं।
  • कार्यपालिका के आदेश द्वारा शासन की प्रवृत्ति: अध्यादेशों का बार-बार प्रख्यापन कार्यपालिका आधारित कानून निर्माण को सामान्य बना सकता है।
    • असाधारण संवैधानिक शक्तियाँ धीरे-धीरे शासन के नियमित साधन बन सकती हैं।
    • यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सकती है तथा संवैधानिक परंपराओं को क्षीण कर सकती है।
  • विधायी विचार-विमर्श को दरकिनार करना: अध्यादेशों पर निर्भरता संसदीय बहस, चर्चा और परीक्षण की सामान्य प्रक्रिया को दरकिनार करती है।
    • महत्त्वपूर्ण नीतिगत निर्णय निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा पर्याप्त परीक्षण के बिना लागू हो सकते हैं।
    • यह विचारात्मक लोकतंत्र के सिद्धांत को कमजोर करता है, जो संसदीय शासन का मूल आधार है।

संसद की घटती भूमिका: उभरती प्रवृत्तियाँ 

  • निर्णय-निर्माण का केंद्रीकरण: प्रमुख नीतिगत निर्णय अब अधिकतर मंत्रिमंडल, दल नेतृत्व, तथा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में लिए जाते हैं, जबकि संसद की भूमिका अक्सर अंतिम अनुमोदन तक सीमित रह जाती है।
    • इसके परिणामस्वरूप, नीति निर्माण में संसद का प्रभाव घटता है तथा कार्यपालिका में शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ता है।
  • समिति परीक्षण में गिरावट: बढ़ती संख्या में विधेयक बिना विभाग-संबंधित स्थायी समितियों को पारित किए जा रहे हैं, जिससे विस्तृत परीक्षण के अवसर कम हो जाते हैं।
    • सीमित समिति परीक्षण विशेषज्ञ परामर्श, हितधारक भागीदारी तथा साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन को बाधित करता है।
    • फलस्वरूप, कानून की गुणवत्ता, संसदीय निगरानी तथा उत्तरदायित्व तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।
  • संक्षिप्त विधायी बहस: कई विधेयक सीमित चर्चा एवं कम समय में पारित किए जा रहे हैं, जिससे सार्थक संसदीय विमर्श की संभावना कम होती है।
    • सांसदों को विधायी प्रावधानों की समीक्षा, संशोधन प्रस्तावित करने तथा चिंताएँ उठाने के कम अवसर मिलते हैं।
    • यह प्रवृत्ति संसद के विचारात्मक एवं परामर्शात्मक स्वरूप को कमजोर करती है।
  • विघटन एवं राजनीतिक ध्रुवीकरण: बार-बार के व्यवधान संसद के कार्यकाल को प्रभावित करते हैं।
    • विधायी कार्यवाही में रचनात्मक विमर्श के स्थान पर दलीय संघर्ष अधिक परिलक्षित होता है।
    • यह संसद की विधायी एवं निगरानी भूमिकाओं को प्रभावी रूप से निभाने की क्षमता को बाधित करता है।
  • प्रश्नकाल का क्षरण: प्रश्नकाल, जो कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का एक प्रमुख साधन है, कुछ अवधियों में कम प्रभावी रहा है।
    • मंत्रियों से प्रश्न पूछने के सीमित अवसर संसदीय निगरानी को कमजोर करते हैं।
    • इससे शासन में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व घटता है।
  • गैर-विधायी माध्यमों का बढ़ता उपयोग: अध्यादेशों, प्रतिनिधिकारी विधि, कार्यकारी आदेशों तथा विनियामक अधिसूचनाओं पर बढ़ती निर्भरता संसद की प्रत्यक्ष भूमिका को कम करती है।
    • महत्त्वपूर्ण नीतिगत उपाय व्यापक विधायी परीक्षण के बिना लागू हो सकते हैं।
    • यह कार्यपालिका के विवेकाधिकार के विस्तार में योगदान देता है।
  • विचार-विमर्श की गुणवत्ता में गिरावट
    • बहस के समय में कमी तथा बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण से संसदीय चर्चाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
    • जटिल मुद्दों को उनके दीर्घकालिक प्रभावों के बावजूद पर्याप्त परीक्षण नहीं मिल पाता है।
    • फलस्वरूप, राष्ट्र की सर्वोच्च विचारात्मक संस्था के रूप में संसद की भूमिका कमजोर हो सकती है।

अध्यादेश के समर्थन में तर्क

  • तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता: कुछ परिस्थितियों में संसद के सत्र में न होने पर त्वरित विधायी हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है और अगले सत्र की प्रतीक्षा करना लोकहित के प्रतिकूल हो सकता है।
    • अध्यादेश निर्माण की शक्ति सरकार को अप्रत्याशित परिस्थितियों में शीघ्र प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती है।
  • प्रशासनिक दक्षता एवं शासन की निरंतरता: अध्यादेश कार्यपालिका को बिना विधायी विलंब के तात्कालिक मुद्दों का समाधान करने की अनुमति देकर शासन की निरंतरता सुनिश्चित करते हैं।
    • ये विशेषतः आपातकालीन या असाधारण परिस्थितियों में प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने का एक माध्यम प्रदान करते हैं।
  • समय-संवेदनशील चुनौतियों का समाधान: अध्यादेश न्यायिक निर्देशों, आर्थिक परिवर्तनों, सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं तथा अन्य समय-संवेदनशील मुद्दों के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया की सुविधा प्रदान करता है।
    • यह सरकार को आवश्यक विधिक उपाय लागू करने में सक्षम बनाता है, जब विलंब के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
  • संवैधानिक रूप से स्वीकृत विधायी तंत्र: संविधान का अनुच्छेद-123 विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार स्पष्ट रूप से प्रदान करता है।
    • अतः अध्यादेश निर्माण, जब संवैधानिक सिद्धांतों एवं वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप किया जाए, एक वैध संवैधानिक साधन है।
  • विधायी शून्यता से संरक्षण: अध्यादेश उस अवधि में विधायी शून्यता को रोकते हैं, जब संसद सत्र में न हो और तत्काल कानून निर्माण आवश्यक हो।
    • यह सुनिश्चित करते हैं कि असाधारण परिस्थितियों में शासन एवं सार्वजनिक प्रशासन प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण प्रभावित न हों।
  • संसदीय स्वीकृति के अधीन: अध्यादेश अस्थायी उपाय होते हैं और उन्हें निर्धारित संवैधानिक समयसीमा के भीतर संसद के समक्ष प्रस्तुत कर स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
    • यह प्रावधान संसदीय सर्वोच्चता को बनाए रखते हुए आवश्यक परिस्थितियों में त्वरित कार्रवाई की अनुमति देता है।

लोकतंत्र में संसद का महत्त्व

  • विचारात्मक लोकतंत्र की संस्था: संसद एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहस, चर्चा, वार्ता और सहमति निर्माण का प्रमुख मंच है।
    • यह सामूहिक विचार-विमर्श और युक्तिसंगत निर्णय-निर्माण के माध्यम से जन-प्राथमिकताओं और प्रतिस्पर्द्धी हितों को वैध कानूनों एवं सार्वजनिक नीतियों में परिवर्तित करती है।
    • संसदीय विचार-विमर्श यह सुनिश्चित करता है कि कानून एकतरफा कार्यपालिका कार्रवाई के बजाय सूचित निर्णय पर आधारित हों।
  • कार्यपालिका का उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का तंत्र: संसद कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा संवैधानिक ढाँचे में नियंत्रण एवं संतुलन बनाए रखने की प्रमुख संस्था है।
  • यह सरकार के कार्यों की समीक्षा निम्न माध्यमों से करती है:
    • प्रश्नकाल
    • शून्यकाल
    • संसदीय समितियाँ
    • स्थगन प्रस्ताव
    • अविश्वास प्रस्ताव
    • संसदीय बहस एवं चर्चा।
  • लोकतंत्र का प्रतिनिधिक स्वरूप: संसद विविध सामाजिक, क्षेत्रीय, भाषायी, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक हितों की अभिव्यक्ति के लिए मंच प्रदान करती है।
    • यह समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित कर समावेशी शासन को सुदृढ़ करती है।
    • संसदीय कार्यप्रणाली में बहुमत का शासन और अल्पसंख्यक अधिकारों दोनों का समावेश होता है, जो संवैधानिक लोकतंत्र की आवश्यक विशेषताएँ हैं।
  • कानून निर्माण में वैधता का स्रोत: कानूनों की वैधता केवल संख्यात्मक बहुमत से नहीं, बल्कि सार्वजनिक तर्क, बहस, परीक्षण और परामर्श की प्रक्रिया से उत्पन्न होती है।
    • संसदीय परीक्षण कानूनों की गुणवत्ता, पारदर्शिता और स्वीकार्यता को बढ़ाता है।
    • सुदृढ़ संसदीय प्रक्रिया से बनाए गए कानून अधिक लोकतांत्रिक वैधता और जन विश्वास प्राप्त करते हैं।
  • संवैधानिक लोकतंत्र का संरक्षक: संसद संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक मानकों और विधि के शासन की रक्षा करने वाली महत्त्वपूर्ण संस्था है।
    • प्रभावी संसदीय कार्यप्रणाली कार्यपालिका में शक्ति के केंद्रीकरण को रोकती है तथा संविधान में निहित उत्तरदायी सरकार की भावना को संरक्षित करती है।
  • राष्ट्रीय सहमति एवं विवाद समाधान का मंच: संसद राजनीतिक असहमति और सामाजिक संघर्षों को संवाद के माध्यम से सुलझाने का संवैधानिक मंच प्रदान करती है।
    • यह राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर सहमति निर्माण को बढ़ावा देती है, जिससे लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकीकरण सुदृढ़ होता है।
    • संसदीय बहस विविध समाज में प्रतिस्पर्द्धी हितों के मध्य संतुलन स्थापित करने में सहायक होती है।
  • वित्तीय नियंत्रण एवं सार्वजनिक व्यय पर निगरानी: संसद सार्वजनिक धन पर नियंत्रण स्थापित करती है, जो संसदीय लोकतंत्र का एक मूल सिद्धांत है।
    • संसदीय स्वीकृति के बिना न तो कोई कर लगाया जा सकता है और न ही कोई व्यय किया जा सकता है।
    • बजट, अनुदान की माँग, लोक लेखा समिति (PAC) तथा अन्य वित्तीय समितियों के माध्यम से संसद पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करती है।
  • नागरिकों और राज्य के बीच सेतु: संसद नागरिकों और सरकार के बीच एक संस्थागत सेतु के रूप में कार्य करती है।
    • सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों की आकांक्षाओं, शिकायतों और चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्त करते हैं।
    • यह प्रतिनिधिक भूमिका भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र को सुदृढ़ करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि शासन जन-आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी बना रहे।

आगे की राह

  • संसदीय समिति प्रणाली को सुदृढ़ करना: महत्त्वपूर्ण एवं जटिल विधेयकों के लिए समिति परीक्षण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि विस्तृत विधायी परीक्षण सुनिश्चित हो सके।
    • विधेयकों की गुणवत्ता सुधारने हेतु दलीय सहमति, विशेषज्ञ परामर्श तथा हितधारक भागीदारी पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।
    • एक सुदृढ़ समिति प्रणाली पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को बढ़ावा दे सकती है।
  • अध्यादेशों के उपयोग का विनियमन: अध्यादेशों के नियमित उपयोग को रोकने हेतु स्पष्ट संवैधानिक परंपराएँ एवं संस्थागत सुरक्षा उपाय विकसित किए जाने चाहिए।
    • कार्यपालिका को अनुच्छेद-123 के प्रयोग की तात्कालिकता एवं आवश्यकता का विस्तृत औचित्य प्रस्तुत करना अनिवार्य होना चाहिए।
    • यह अध्यादेश निर्माण शक्ति के असाधारण स्वरूप को बनाए रखने में सहायक होगा।
  • विचारात्मक विधायी प्रक्रिया को सुदृढ़ करना: प्रमुख विधेयकों के साथ न्यूनतम निश्चित बहस अवधि निर्धारित की जानी चाहिए ताकि सार्थक संसदीय चर्चा संभव हो सके।
    • विपक्षी दलों एवं छोटे राजनीतिक समूहों को विधायी विमर्श में भागीदारी के पर्याप्त अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
    • यह संसद की विचारात्मक लोकतंत्र की प्रमुख संस्था के रूप में भूमिका को सुदृढ़ करेगा।
  • प्रश्नकाल को पुनर्जीवित करना: प्रश्नकाल, जो कार्यपालिका की उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है, उसे बार-बार निलंबन या कमजोर किए जाने से संरक्षित किया जाना चाहिए।
    • प्रश्नकाल को सुदृढ़ करने से सरकारी पारदर्शिता, मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व तथा संसदीय निगरानी में सुधार होगा।
    • यह कार्यपालिका की कार्रवाई की समीक्षा में संसद की भूमिका को मजबूत करेगा।
  • विधायी अनुसंधान सहयोग को सुदृढ़ करना: सांसदों के लिए पेशेवर अनुसंधान एवं विश्लेषणात्मक सहयोग सेवाओं का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण किया जाना चाहिए।
    • उच्च गुणवत्ता वाले शोध तक पहुँच सांसदों को विधायी परीक्षण एवं नीति मूल्यांकन में अधिक प्रभावी भागीदारी में सक्षम बनाएगी।
    • यह साक्ष्य-आधारित कानून निर्माण तथा सूचित संसदीय बहस को प्रोत्साहित करेगा।
  • दल-बदल विरोधी प्रावधानों की समीक्षा: दल-बदल विरोधी कानून में सुधार पर विचार किया जा सकता है ताकि विधायकों को नीति चर्चाओं एवं विधायी विमर्श में अधिक स्वतंत्रता मिल सके।
    • ऐसे सुधारों में स्वतंत्र विधायी निर्णय और राजनीतिक स्थिरता एवं दल अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
  • संसदीय आचार एवं शिष्टाचार को बढ़ावा देना: रचनात्मक बहस, पारस्परिक सम्मान, तथा उत्तरदायी संसदीय आचरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
    • व्यवधानों को कम करना एवं सूचित चर्चा की संस्कृति को बढ़ावा देना संसद की प्रभावशीलता में सुधार कर सकता है।
    • मजबूत संसदीय आचार लोकतांत्रिक संस्थाओं में जन विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए आवश्यक है।
  • कानून निर्माण में जन भागीदारी बढ़ाना: पूर्व-विधायी परामर्श तंत्र को संस्थागत बनाया जाना चाहिए, ताकि व्यापक जन सहभागिता सुनिश्चित हो सके।
    • हितधारकों, नागरिक समाज संगठनों, विशेषज्ञों एवं नागरिकों को प्रस्तावित कानूनों पर प्रतिक्रिया देने के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
    • अधिक जन भागीदारी से कानूनों की वैधता, समावेशिता एवं उत्तरदायित्व में वृद्धि होगी।

निष्कर्ष 

  • सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 के संदर्भ में चल रही बहस केवल न्यायिक नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य से जुड़े मूलभूत प्रश्न उठाती है।
  • यद्यपि अध्यादेश असाधारण परिस्थितियों में एक आवश्यक संवैधानिक साधन बने रहते हैं, परंतु उनका नियमित उपयोग संसद की उस भूमिका को कमजोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है, जो लोकतांत्रिक विमर्श की केंद्रीय संस्था है।
  • संसदीय सुधारों, सुदृढ़ समिति परीक्षण तथा उन्नत उत्तरदायित्व तंत्रों के माध्यम से संसद को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि संविधान की भावना संरक्षित रह सके और शासन प्रक्रिया कार्यपालिका के एकतरफा निर्णय के बजाय विचार-विमर्श, सहमति और लोकतांत्रिक वैधता पर आधारित बनी रहे।

राज्यों में अध्यादेशों का संवैधानिक ढाँचा

अनुच्छेद-213: राज्यपाल की अध्यादेश निर्माण शक्ति

  • अनुच्छेद-213 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि जब राज्य विधानमंडल सत्र में न हो और परिस्थितियाँ तात्कालिक विधायी कार्रवाई की माँग करें, तब वह अध्यादेश जारी कर सकता है।
  • राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश का वही प्रभाव होता है, जो राज्य विधानमंडल के अधिनियम का होता है।
  • राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग संसदीय शासन के सिद्धांतों के अनुरूप मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर करता है।

जारी करने की शर्तें

  • राज्यपाल केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में अध्यादेश जारी कर सकता है:
    • विधानसभा सत्र में न हो; या
    • द्विसदनीय राज्यों में, दोनों सदन सत्र में न हों।
  • राज्यपाल का यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, जो तात्कालिक कार्रवाई को आवश्यक बनाती हैं।

अवधि एवं स्वीकृति

  • अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनः एकत्र होने पर उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है।
  • यदि विधानमंडल द्वारा स्वीकृत नहीं किया जाता है, तो यह पुनः एकत्र होने की तिथि से छह सप्ताह की अवधि पूर्ण होने पर स्वतः प्रभावहीन हो जाता है।
  • राज्यपाल इसके समाप्त होने से पूर्व किसी भी समय अध्यादेश को वापस भी ले सकता है।

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