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थोरियम और भारत का वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा मिशन

Lokesh Pal March 09, 2026 03:02 123 0

संदर्भ

भारत दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने और वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट की परमाणु क्षमता के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की खोज कर रहा है।

  • भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडार हैं, जिससे यह देश के ऊर्जा भविष्य के लिए एक रणनीतिक संसाधन बन जाता है।

परमाणु ऊर्जा लक्ष्य

  • भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को लगभग 100 गीगावाट तक बढ़ाना है।
  • वर्तमान में वैश्विक परमाणु उत्पादन क्षमता लगभग 380 गीगावाट है, जिसके आने वाले दशकों में 1,400 गीगावाट तक बढ़ने की अपेक्षा है।
  • भारत का नियोजित परमाणु विस्तार मुख्यतः तापीय रिएक्टरों पर आधारित होगा, जिनके लिए बड़ी मात्रा में यूरेनियम ईंधन की आवश्यकता होती है।
  • मुख्य चिंता: 100 गीगावाट लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष 18,000–20,000 टन यूरेनियम की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान वैश्विक यूरेनियम उत्पादन का लगभग एक-तिहाई है।

यूरेनियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की सीमाएँ

  • सीमित घरेलू उपलब्धता: भारत में निम्न-गुणवत्ता और सीमित यूरेनियम भंडार हैं, जिससे इसका निष्कर्षण महँगा हो जाता है और बड़े पैमाने पर परमाणु विस्तार के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • आयात पर निर्भरता: परमाणु रिएक्टरों का निरंतर संचालन बनाए रखने के लिए भारत आयातित यूरेनियम पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • अस्थिर ईंधन चक्र: पारंपरिक ‘यूरेनियम ईंधन चक्र’ ईंधन की ऊर्जा क्षमता के केवल एक छोटे हिस्से का उपयोग करता है, जिससे संसाधनों का उपयोग अल्प-कुशल हो जाता है।
  • रेडियोधर्मी अपशिष्ट और प्रसार संबंधी चिंताएँ: यूरेनियम–प्लूटोनियम चक्र दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट और ऐसे पदार्थ उत्पन्न करते हैं, जो परमाणु प्रसार संबंधी जोखिम बढ़ा सकते हैं।

भारत के लिए एक रणनीतिक विकल्प के रूप में थोरियम

  • प्रचुर घरेलू भंडार: भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो मुख्यतः तटीय क्षेत्रों की मोनाजाइट रेत में पाए जाते हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: थोरियम भारत की आयातित यूरेनियम पर निर्भरता को कम करता है, जिससे ऊर्जा स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वायत्तता सुदृढ़ होती है।
  • सतत् परमाणु ईंधन चक्र: थोरियम (Th-232) को यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है, जो एक विखंडनीय पदार्थ है और परमाणु अभिक्रियाओं को बनाए रख सकता है।
  • कम परमाणु प्रसार जोखिम: थोरियम-आधारित ईंधन चक्र कम हथियार-उपयोग योग्य पदार्थ उत्पन्न करते हैं, जिससे वे पारंपरिक यूरेनियम–प्लूटोनियम चक्रों की तुलना में प्रसार-प्रतिरोधी बनते हैं।
  • भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का केंद्रीय भाग: थोरियम का उपयोग भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण का निर्माण करता है, जो सदियों तक स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करता है।

थोरियम के उपयोग में चुनौतियाँ

  • प्रौद्योगिकीय जटिलता: थोरियम सीधे परमाणु शृंखला अभिक्रिया को बनाए नहीं रख सकता और इसे पहले यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना पड़ता है, जिसके लिए उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों और ईंधन चक्रों की आवश्यकता होती है।
  • वाणिज्यिक स्तर के रिएक्टरों का अभाव: थोरियम-आधारित रिएक्टर अभी भी मुख्यतः अनुसंधान और विकास के चरण में हैं तथा वैश्विक स्तर पर इनका वाणिज्यिक उपयोग सीमित है।
  • उच्च अनुसंधान और अवसंरचना लागत: थोरियम ईंधन चक्र के विकास के लिए उन्नत रिएक्टरों, ईंधन निर्माण और पुनर्संसाधन प्रौद्योगिकियों में महत्त्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सीमित परीक्षण और अवसंरचना: भारत में वर्तमान में त्वरित विकिरण परीक्षण और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं, जिससे थोरियम के उपयोग की गति धीमी पड़ती है।

भारत का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

  • भारत का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम 1950 के दशक में होमी जहाँगीर भाभा द्वारा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परिकल्पित किया गया था।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य रिएक्टर प्रौद्योगिकियों के क्रमिक विकास के माध्यम से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम संसाधनों को परमाणु ईंधन में परिवर्तित करना है।
  • प्रथम चरण – दाबित भारी जल रिएक्टर:
    • ईंधन: प्राकृतिक यूरेनियम
    • मंदक और शीतलक: भारी जल
    • मुख्य विशेषताएँ: ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम (यूरेनियम-238 और यूरेनियम-235) का उपयोग करता है।
      • रिएक्टर के संचालन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 उत्पन्न करता है।
      • उत्पन्न प्लूटोनियम दूसरे चरण के लिए ईंधन बनता है।
  • द्वितीय चरण – तीव्र प्रजनक रिएक्टर
    • ईंधन: प्लूटोनियम-239 के साथ यूरेनियम या थोरियम
    • उद्देश्य: उपभोग से अधिक ईंधन उत्पन्न करना
    • मुख्य विशेषताएँ: प्रथम चरण के रिएक्टरों से प्राप्त प्लूटोनियम का ईंधन के रूप में उपयोग करता है।
      • यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम या थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित करता है।
      • जितना उपभोग करता है उससे अधिक विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न करता है (ब्रीडर प्रक्रिया)।
  • तृतीय चरण – थोरियम-आधारित रिएक्टर
    • ईंधन: थोरियम से प्राप्त यूरेनियम-233
    • मुख्य विशेषताएँ: यूरेनियम-233 नामक विखंडनीय ईंधन उत्पन्न करने के लिए थोरियम-232 का उपयोग करता है।
      • भारत के विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने के लिए अभिकल्पित।
      • सदियों तक सतत परमाणु ऊर्जा प्रदान करने की अपेक्षा।

भारत के परमाणु ऊर्जा विकास के लिए सतत दोहन एवं उन्नति अधिनियम (शांति अधिनियम, 2025)

  • शांति अधिनियम, 2025 भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के आधुनिकीकरण तथा परमाणु प्रौद्योगिकी विकास में व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाने के उद्देश्य से एक प्रमुख सुधार है।
  • परमाणु क्षेत्र को खोलना: यह अधिनियम परमाणु अनुसंधान, विकास और प्रौद्योगिकी के उपयोग में निजी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों तथा उद्योग की भागीदारी की अनुमति देता है।
    • पूर्व में परमाणु ऊर्जा से संबंधित गतिविधियाँ मुख्यतः वर्ष 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के अंतर्गत सरकार के नियंत्रण में थीं।
  • अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा: अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • परमाणु पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक और निजी हितधारकों को सम्मिलित करते हुए एक व्यापक परमाणु नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण का उद्देश्य रखता है।

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