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पितृत्व विवादों में त्रि-स्तरीय DNA परीक्षण मानदंड

Lokesh Pal June 10, 2026 03:00 5 0

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पितृत्व विवाद में अनिवार्य DNA परीक्षण करने के पूर्व निर्णय को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चे के अपनी पहचान एवं उत्तराधिकार स्थापित करने के अधिकार तथा व्यक्ति के निजता के मौलिक अधिकार के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए यह निर्णय दिया।

सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • त्रि-स्तरीय मापदंड: न्यायालय आनुवंशिक परीक्षण का आदेश यांत्रिक रूप से नहीं दे सकता है। इसके लिए तीन कठोर शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:-
    • माता-पिता होने (Parentage) का प्रश्न मामले का केंद्रीय एवं प्रत्यक्ष विवाद होना चाहिए।
    • मामले के समाधान के लिए अभिलेख पर कोई वैकल्पिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं होना चाहिए।
    • परीक्षण से संबंधित सभी पक्षों के लिए न्यायिक हितों की स्पष्ट रूप से पूर्ति होनी चाहिए।
  • संपत्ति बनाम निजता: भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत व्यक्ति का निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है। जब कोई पिता दशकों तक पितृत्व से इनकार करता है, तब वैज्ञानिक परीक्षण से इनकार करने पर बच्चे को उसकी वैध संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकार से स्थायी रूप से वंचित किया जा सकता है।
  • वैज्ञानिक परीक्षण के प्रति न्यायिक सावधानी: न्यायपालिका एक विवेकपूर्ण अंतराल’ (निखत परवीन, 2026) बनाए रखती है। आनुवंशिक परीक्षण एक अंतिम उपाय हैं और इनका उपयोग किसी व्यक्ति के जीवन में केवल अटकलों के आधार पर पूछताछ करने के लिए कभी नहीं किया जा सकता है।

न्यायिक दृष्टांतों का ऐतिहासिक विकास

चूँकि भारत में ऐसा कोई विशिष्ट कानून नहीं है, जो यह निर्धारित करता हो कि न्यायालय कब आनुवंशिक परीक्षण का आदेश दे सकता है, इसलिए इस विषय से संबंधित विधि का विकास पूरी तरह से परिवर्तित होते न्यायिक निर्णयों की एक शृंखला के माध्यम से हुआ है।

वर्ष  न्यायिक निर्णय स्थापित मूल विधिक सिद्धांत
वर्ष 1993 गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
  • कठोर निषेध: नियमित रूप से DNA परीक्षण कराने पर रोक लगाई गई।
  • यह माना गया कि न्यायालयों को बच्चों को अवैधता के सामाजिक कलंक से बचाना चाहिए और किसी भी व्यक्ति को अनुमानात्मक जाँच के लिए रक्त नमूना देने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2014 नंदलाल वासुदेव बडवाइक बनाम लता बडवाइक जैविक वास्तविकता (Biological Reality): यह व्यवस्था दी गई कि जब भी किसी पुरानी कानूनी मान्यता और आधुनिक एवं सर्वमान्य वैज्ञानिक प्रगति के मध्य टकराव होता है, तो जैविक सत्य को ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए।
वर्ष 2014 दीपन्विता रॉय बनाम रोनोब्रतो रॉय परिहार सिद्धांत (The Avoidance Rule): यह माना गया कि यदि वैवाहिक या पितृत्व संबंधी विवाद का समाधान सामान्य साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है, तो बच्चे की कानूनी स्थिति की रक्षा के लिए DNA परीक्षण से सक्रिय रूप से बचा जाना चाहिए।
वर्ष 2023 अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य फिरोदिया
  • साक्ष्यगत सीमा (Evidentiary Threshold): पक्षकारों को पहले सामान्य साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
  • फोरेंसिक परीक्षण की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है, जब उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर न्यायाधीश के लिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना पूरी तरह असंभव हो।
वर्ष 2025 इवान रथिनम बनाम मिलन जोसेफ
  • आनुपातिकता परीक्षण: एक संतुलनकारी मानक प्रस्तुत किया गया।
  • न्यायाधीशों को यह आकलन करना होगा कि किसी बच्चे को अवैध घोषित करने से होने वाली सामाजिक हानि, उसकी पहचान और निश्चितता की वैध आवश्यकता से अधिक है या नहीं।
वर्ष 2026 निखत परवीन बनाम रफीक (अप्रैल 2026) इस बात की पुनः पुष्टि की गई है कि भारतीय न्यायालयों का सामान्य रुख आनुवंशिक परीक्षण का आदेश देने को लेकर गहन संदेहास्पद वाला रहा है, जब तक कि आर्थिक भरण-पोषण या कानूनी अधिकारों को तय करने के लिए यह बिल्कुल आवश्यक न हो।
वर्ष 2026 वर्तमान मामला (सीपी निर्णय) (मई 2026) दीवानी दावों की पुष्टि: यह पुष्टि की गई कि यदि कोई पिता 20 वर्षों तक पितृत्व से इनकार करता है, तो बालिग संतान के संपत्ति एवं वंशानुक्रम संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय के पास वैज्ञानिक सत्यापन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।

संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

  • पहचान और जीवन का अधिकार: अपने जैविक माता-पिता की पहचान जानना अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
    • यह राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद-39(e) के अनुरूप है, जो राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि बच्चों का स्वस्थ विकास हो और उनके मूल अधिकारों से उन्हें वंचित न किया जाए।
  • निजता और मानवीय शरीर: पुट्टास्वामी निर्णय (2017) के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर पर स्वायत्तता का अधिकार है।
    •  किसी व्यक्ति को चिकित्सा या आनुवंशिक नमूना देने के लिए बाध्य करना इस निजता में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है।
  • पुराने कानून और विज्ञान के मध्य टकराव: जैविक सत्य और वैधता की कानूनी उपधारणा के बीच एक बड़ा तनाव मौजूद है।
    • साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 116) के अनुसार, विवाह के बाद जन्मा बच्चा कानूनी रूप से वैध माना जाता है।
    • इस उपधारणा को खंडित करने के लिए किसी पुरुष को अनागम्यता’ या ‘अप्राप्यता’ (Non-access) सिद्ध करनी होती है, अर्थात् उसे यह सिद्ध करना होता है कि बच्चे के लिए गर्भाधान के संभावित समय पर उसकी अपनी पत्नी तक पहुँच या संसर्ग का कोई भी अवसर नहीं था। 

भरण-पोषण और अभिरक्षा पर DNA परीक्षण का प्रभाव

इस निर्णय के संपत्ति संबंधी विवादों से परे भी महत्त्वपूर्ण दीवानी प्रभाव है:

  • बाल भरण-पोषण दावे: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) तथा हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम के अंतर्गत, कभी-कभी पुरुष भरण-पोषण भुगतान से बचने के लिए DNA परीक्षण की माँग करते हैं, जबकि बच्चे इसका उपयोग यह सिद्ध करने के लिए करते हैं कि अविवाहित पिता भी उनके भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी है।
  • अभिरक्षा विवाद : द्वेषपूर्ण तलाक संबंधी मामलों में माता-पिता अक्सर बच्चे की अभिरक्षा को लेकर विवाद करते हैं।
    • न्यायालय DNA परीक्षण के इन कड़े नियमों का प्रयोग यह सुनिश्चित करने के लिए करते हैं कि कोई भी पक्षकार (पति या पत्नी) आनुवंशिक परीक्षण को अपने जीवनसाथी की कथित अवैधता सिद्ध करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल न कर सके, ताकि बच्चे के सर्वोत्तम हितों और उसकी भावनात्मक गरिमा की रक्षा की जा सके।

निर्णय का महत्त्व

  • न्यायिक दृष्टिकोण का मानकीकरण: यह निर्णय दशकों से चले आ रहे असंगत और अंतरविरोधी न्यायिक दृष्टांतों के स्थान पर एक स्पष्ट त्रि-स्तरीय ढाँचा स्थापित करता है, जिससे न्यायिक निर्णयों में अधिक एकरूपता सुनिश्चित होगी और निचली अदालतों में न्यायिक आत्मनिष्ठता (Judicial Subjectivity) की संभावना कम होगी।
  • पारिवारिक कानून का आधुनिकीकरण: यह पुराने 19वीं शताब्दी के कानूनी उपधारणाओ को आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान के साथ समन्वित करता है, जिससे विकसित होती प्रौद्योगिकी प्रभावी दीवानी न्याय प्रदान करने में सहायक बन सके।
  • निजता और वैज्ञानिक सत्य के मध्य संतुलन: यह निर्णय आनुवंशिक सत्य की आवश्यकता और निजता, पारिवारिक गरिमा तथा बच्चे के सर्वोत्तम हितों की सुरक्षा के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित करता है।
  • DNA परीक्षण के दुरुपयोग की रोकथाम: न्यायालय द्वारा आदेशित परीक्षणों के लिए कठोर शर्तें निर्धारित करके यह निर्णय वैवाहिक एवं उत्तराधिकार संबंधी विवादों में DNA साक्ष्यों के मनमाने, प्रतिशोधात्मक अथवा मात्र संदेह-आधारित उपयोग को रोकता है।
  • संवैधानिक एवं बाल अधिकारों को सुदृढ़ करना: यह निर्णय गरिमा, विधिसम्मत प्रक्रिया और आनुपातिकता जैसे संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करता है, साथ ही उपयुक्त मामलों में बच्चे के पहचान एवं कानूनी मान्यता के अधिकार का भी समर्थन करता है।

उत्पन्न होने वाली चुनौतियाँ 

  • मूल कानूनी दुविधा–बच्चे के अधिकार बनाम पिता के अधिकार
    • निजता का अधिकार (अनुच्छेद-21): के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ के निर्णय के अनुसार, किसी व्यक्ति की आनुवंशिक जानकारी अत्यंत निजी मानी जाती है। DNA परीक्षण के लिए बाध्य करना इस संरक्षित निजता क्षेत्र का उल्लंघन कर सकता है।
    • शारीरिक स्वायत्तता की सुरक्षा: न्यायालय यह मानते हैं कि किसी व्यक्ति को बिना ठोस कानूनी आवश्यकता के रक्त या आनुवंशिक नमूना देने के लिए नियमित रूप से बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह शारीरिक अखंडता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
    • निराधार दावों से संरक्षण: कानून व्यक्तियों को केवल संदेह, व्यक्तिगत विवाद या उत्पीड़न के आधार पर अनावश्यक या दुर्भावनापूर्ण DNA परीक्षण की माँग से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • बच्चे के अधिकार (पहचान, गरिमा और सहायता) 
    • जैविक माता-पिता को जानने का अधिकार: संयुक्त रूप से मान्यता प्राप्त वैश्विक सिद्धांतों, जिसमें संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) के अनुच्छेद-7 शामिल है, के अनुसार, बच्चे का यह महत्त्वपूर्ण हित है कि वह अपनी जैविक पहचान और पारिवारिक मूल को जान सके।
    • भरण-पोषण और उत्तराधिकार का अधिकार: पितृत्व का निर्धारण अक्सर बच्चे के लिए वित्तीय सहायता, भरण-पोषण तथा पैतृक संपत्ति में अधिकार प्राप्त करने हेतु आवश्यक होता है।
    • वैधता की सुरक्षा: भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 116 के अनुसार, वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को तब तक वैध  माना जाता है, जब तक इसके विपरीत मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएँ।
      • यह प्रावधान बच्चों को अवैधता से जुड़े सामाजिक कलंक और भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • वैवाहिक स्थिरता पर खतरा: न्यायालय द्वारा आदेशित DNA परीक्षण की सीमा को कम करने से संदेह-आधारित वैवाहिक विवाद बढ़ सकते हैं, जिससे आपसी विश्वास कमजोर होगा और विवाह की पवित्रता प्रभावित हो सकती है।
  • भावनात्मक एवं सामाजिक आघात: यदि किसी लैब रिपोर्ट में पितृत्व अस्वीकृत होता है, तो इससे बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उसे सामाजिक कलंक, शर्मिंदगी और समुदाय में बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।
  • उत्पीड़न और ब्लैकमेल (अवैध वसूली) का जोखिम: दुर्भावनापूर्ण तत्त्व किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने, ब्लैकमेल करने या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से सार्वजनिक रूप से पितृत्व परीक्षण (Paternity Testing) कराने की धमकी का दुरुपयोग कर सकते हैं, जो कि उस व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • गोपनीयता और डेटा सुरक्षा के जोखिम: सस्ते व्यावसायिक डीएनए (DNA) किट और सार्वजनिक आनुवंशिक डेटाबेस के बढ़ते चलन के कारण, न्यायिक हस्तक्षेप से पहले ही निजी विवाद सतह पर आने लगे हैं। इसके साथ ही, कानूनी कार्यवाहियों के दौरान संवेदनशील आनुवंशिक डेटा (Genetic Data) के लीक होने से इसका दुरुपयोग हो सकता है, जिससे स्वास्थ्य प्रोफाइलिंग (Health Profiling), बीमा भेदभाव (Insurance Discrimination) या अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
  • परिवारिक विघटन और कठोर मुकदमेबाजी: DNA परीक्षण तक आसान पहुँच से प्रतिद्वंद्वी कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं, पारिवारिक विवाद गहरे हो सकते हैं और पारिवारिक संबंधों के टूटने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

वैश्विक कार्यवाही एवं पहल

  • संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC): अनुच्छेद-7 के अनुसार, प्रत्येक बच्चे को अपने माता-पिता को जानने और अपनी पहचान बनाए रखने का अधिकार है। पितृत्व एवं उत्तराधिकार संबंधी विवादों का निपटारा करते समय भारतीय न्यायालय इस वैश्विक सिद्धांत के साथ बढ़ते हुए सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं।
  • यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय (ECHR): ECHR प्रायः बच्चे के स्थिर पारिवारिक वातावरण और समग्र कल्याण को विघटनकारी जैविक सत्य को उजागर करने की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता देता है। इस प्रकार वह वैज्ञानिक साक्ष्यों और सामाजिक स्थिरता के मध्य संतुलन स्थापित करता है।
  • अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम की विधिक व्यवस्थाएँ: संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के कोर्ट्स (न्यायालय) सामान्यतः वैज्ञानिक सत्य को महत्त्व देती हैं तथा बाल भरण-पोषण, अभिरक्षा और उत्तराधिकार अधिकारों से संबंधित विवादों के त्वरित समाधान हेतु प्रारंभिक चरण में ही आनुवंशिक परीक्षण का उपयोग करती हैं।
  • वैश्विक विधिक दृष्टिकोण: जहाँ अनेक पश्चिमी विधिक व्यवस्थाएँ जैविक सटीकता को प्राथमिकता देती हैं, वहीं कई पारंपरिक विधिक व्यवस्थाएँ पारिवारिक एकता, सामाजिक वैधता और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए आनुवंशिक साक्ष्यों के उपयोग को सीमित करती हैं।

आगे की राह 

  • व्यापक विधायी ढाँचा: संसद को आधुनिक पारिवारिक कानूनों में संशोधन करना चाहिए तथा सर्वोच्च न्यायालय की त्रि-स्तरीय कसौटी को पारिवारिक न्यायालय अधिनियम या भारतीय साक्ष्य अधिनियम में स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहिए, ताकि उन परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सके, जिनमें DNA परीक्षण की अनुमति दी जा सकती है।
  • दीवानी और आपराधिक मामलों के मध्य स्पष्ट अंतर: कानून को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्तराधिकार या संपत्ति जैसे दीवानी मामलों में DNA परीक्षण के जो उदार (सहनशील) मानक अपनाए जाते हैं, उन्हें आपराधिक कार्यवाहियों में लागू न किया जाए, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर होती है।
  • निजता सुरक्षा के कठोर उपाय: न्यायालयों को आनुवंशिक परीक्षण का आदेश देने से पूर्व स्वैच्छिक सहमति प्राप्त करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। कानूनी सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करें कि एकत्रित आनुवंशिक डेटा मामले के निष्पादन के बाद नष्ट कर दिया जाए और उसका असंबंधित चिकित्सीय निगरानी, प्रोफाइलिंग या आपराधिक ट्रैकिंग के लिए कभी दुरुपयोग न हो।
  • बंद कमरे में या निजी तौर पर अनिवार्य कार्यवाही: लोगों को सार्वजनिक अपमान, सामाजिक बदनामी और प्रतिष्ठा को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए पितृत्व और आनुवंशिक विवादों से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई बंद कमरे में या निजी तौर पर होनी चाहिए।
  • मान्यता प्राप्त एवं सुरक्षित परीक्षण तंत्र: न्यायालय द्वारा आदेशित DNA नमूना संग्रह को केवल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं तक सीमित किया जाना चाहिए तथा साक्ष्यों की सुरक्षित एवं अपरिवर्तनीय अभिरक्षा शृंखला सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि साक्ष्य से छेड़छाड़, धोखाधड़ी या जैविक नमूनों के दुरुपयोग को रोका जा सके।
  • सत्य और सामाजिक स्थिरता के मध्य संतुलन: विधिक व्यवस्था को वैज्ञानिक सत्य की खोज और पारिवारिक सौहार्द बनाए रखने, बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करने तथा निजता और गरिमा के अधिकार को बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।

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