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Lokesh Pal
June 10, 2026 03:00
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हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पितृत्व विवाद में अनिवार्य DNA परीक्षण करने के पूर्व निर्णय को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चे के अपनी पहचान एवं उत्तराधिकार स्थापित करने के अधिकार तथा व्यक्ति के निजता के मौलिक अधिकार के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए यह निर्णय दिया।
चूँकि भारत में ऐसा कोई विशिष्ट कानून नहीं है, जो यह निर्धारित करता हो कि न्यायालय कब आनुवंशिक परीक्षण का आदेश दे सकता है, इसलिए इस विषय से संबंधित विधि का विकास पूरी तरह से परिवर्तित होते न्यायिक निर्णयों की एक शृंखला के माध्यम से हुआ है।
इस निर्णय के संपत्ति संबंधी विवादों से परे भी महत्त्वपूर्ण दीवानी प्रभाव है:
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