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समान नागरिक संहिता (UCC) के अंतर्गत जनजातीय छूट

Lokesh Pal May 26, 2026 02:00 11 0

संदर्भ

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सभी आदिवासी समुदाय, समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे से बाहर रहेंगे और उनके संवैधानिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा की जाएगी।

संबंधित तथ्य

  • नई दिल्ली में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम’ में बोलते हुए, उन्होंने जनजातीय कल्याण पर सरकार के विशेष ध्यान को भी रेखांकित किया और बिरसा मुंडा की विरासत को याद किया।

जनजातीय पारंपरिक अधिकार और समान नागरिक संहिता (UCC)

  • जनजातीय पारंपरिक अधिकार वे पारंपरिक, अलिखित कानूनी और सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं, जो सदियों से देशज समुदायों को नियंत्रित करती आ रही हैं।
    • ये अधिकार विवाह की रस्मों, तलाक की प्रक्रियाओं, बाल दत्तक ग्रहण (गोद लेना), और भूमि उत्तराधिकार के अनूठे तरीकों (जैसे- मातृसत्तात्मक उत्तराधिकार, जहाँ संपत्ति माँ से बेटी के पास स्थानांतरित हो जाती है) जैसे मुख्य नागरिक मामलों को निर्धारित करते हैं।
  • विवाद: संविधान का अनुच्छेद-44 (राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत) राज्य को पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुरक्षित करने का निर्देश देता है।
    • इसका अर्थ है विविध धार्मिक और सामुदायिक व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) के स्थान पर एक एकल, साझा कानून लागू करना।
  • समस्या: पूरे भारत में एक कठोर, समान कानून लागू करने से भारत के देशज जनजातियों की विशिष्ट, संरक्षित परंपराएँ स्वतः ही अमान्य हो जाएँगी, जिससे उनके सांस्कृतिक अस्तित्व के समक्ष खतरा उत्पन्न होने की संभावना उत्पन्न हो जाएगी।

जनजातीय समुदायों के लिए संवैधानिक सुरक्षाएँ

भारतीय संविधान में ऐसे अंतर्निहित सुरक्षा कवच मौजूद हैं, जो जनजातीय आबादी को एकसमान केंद्रीय कानूनों से अलग रखते हैं और उनकी विशिष्ट स्थिति को मान्यता प्रदान करते हैं।

  • पाँचवीं अनुसूची [अनुच्छेद-244(1)]: मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के 10 राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों का शासन करती है।
    • यह राज्यपाल को संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी ऐसे अधिनियम को संशोधित करने, निलंबित करने या रोकने की असाधारण शक्तियाँ प्रदान करती है, जो जनजातीय भूमि या सामाजिक रीति-रिवाजों के लिए खतरा हो।
  • छठी अनुसूची [अनुच्छेद-244(2)]: चार पूर्वोत्तर राज्यों [असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम (‘AMTM’) राज्य] के जनजातीय क्षेत्रों को उच्च स्तर की प्रशासनिक और विधायी स्वायत्तता प्रदान करती है।
    • यह स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) की स्थापना करती है, जिनके पास विवाह, विरासत और सामाजिक रीति-रिवाजों से संबंधित कानून बनाने का विशेष कानूनी अधिकार होता है।
  • अनुच्छेद-371A (नागालैंड) और 371G (मिजोरम): ये विशेष अनुच्छेद यह निर्धारित करते हैं कि जनजातीय प्रथागत कानूनों, धार्मिक/सामाजिक रीति-रिवाजों या भूमि स्वामित्व से संबंधित संसद का कोई भी अधिनियम इन राज्यों पर तब तक लागू नहीं हो सकता, जब तक कि उनकी संबंधित राज्य विधानसभाएँ इसे स्वीकार करने के लिए एक औपचारिक प्रस्ताव पारित न कर दें।

जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council- TAC) के बारे में

  • जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों (STs) के कल्याण और उन्नति पर सलाह देना है।
  • संवैधानिक प्रावधान: यह संविधान के अनुच्छेद-244(1) और पाँचवीं अनुसूची के तहत प्रदान किया गया है।
  • संरचना
    • यह उन राज्यों में गठित की जाती है, जहाँ अनुसूचित क्षेत्र हैं।
    • इसमें अधिकतम 20 सदस्य होते हैं।
    • इसके लगभग तीन-चौथाई सदस्य राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधि होने चाहिए।
  • कार्य: यह निम्नलिखित से संबंधित मामलों पर राज्यपाल को सलाह देती है:
    • अनुसूचित जनजातियों का कल्याण और विकास
    • जनजातीय भूमि और संसाधनों का संरक्षण
    • अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों की उन्नति।
  • राज्यपाल की भूमिका
    • राज्यपाल जनजातीय कल्याण से जुड़े किसी भी मामले को सलाह के लिए जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) के पास भेज सकते हैं।
    • राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्रों के संबंध में भारत के राष्ट्रपति को रिपोर्ट भी सौंपते हैं।
  • महत्त्व
    • यह जनजातीय अधिकारों, रीति-रिवाजों और हितों की रक्षा के लिए एक संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करता है।
    • यह जनजातीय क्षेत्रों में सहभागी शासन को बढ़ावा देता है।

रणनीतिक संरेखण

  • उत्तराखंड मॉडल (2024): जब उत्तराखंड भारत का पहला ऐसा राज्य बना, जिसने ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) बिल पास किया, तो इसमें एक सख्त कानूनी प्रावधान शामिल किया गया, जिसके तहत अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से पूरी तरह छूट दी गई।
    • केंद्र सरकार, प्रस्तावित राष्ट्रीय स्तर पर UCC के लिए एक ढाँचे के तौर पर, इसी राज्य-स्तरीय मॉडल का उपयोग कर रही है।
  • PESA एक्ट, 1996: ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम’ (PESA) के प्रावधान, पाँचवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रों तक स्थानीय स्व-शासन का विस्तार करते हैं।
    • यह अधिनियम ग्राम सभा’ ​​(गाँव की परिषद) को, जनजातीय परंपराओं और सामुदायिक संसाधनों का पूर्ण कानूनी संरक्षक घोषित करता है।
  • जनजातीय जमीनों पर से उनका अधिकार छिनने से रोकने के लिए, सरकार ने एक विशेष ‘PESA सेल’ का गठन किया है। इस सेल का कार्य इन नियमों का संथाली, गोंडी, भीली और मुंडारी जैसी स्थानीय भाषाओं में अनुवाद करना है।

ऐतिहासिक विरासत और वित्तीय आवंटन

  • उलगुलान’ की विरासत: यह घोषणा भगवान बिरसा मुंडा (जन्म 1875) की 150वीं जयंती वर्ष के राष्ट्रीय समारोह के अवसर पर की गई है।
    • उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों और बाहरी लोगों (दिकुओं) के विरुद्ध ऐतिहासिक मुंडा विद्रोह (1899-1900) का नेतृत्व किया, जो आदिवासियों की ‘खुंटकट्टी’ व्यवस्था (सामूहिक भूमि स्वामित्व) को नष्ट कर रहे थे।
    • उनके आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को वर्ष 1908 का ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ पारित करने के लिए विवश कर दिया, जिसने आदिवासियों की जमीन का गैर-आदिवासियों को हस्तांतरण कानूनी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया।
  • वित्तीय आवंटन में बढोतरी: केंद्र सरकार ने आदिवासी युवाओं के जनसांख्यिकीय लाभांश को एक आर्थिक संपत्ति में बदलने के लिए, आदिवासी कल्याण के लिए फंडिंग को पूरी तरह से नए सिरे से प्राथमिकता दी है:-
    • बजट में वृद्धि: केंद्रीय आदिवासी कल्याण बजट 2026-27 के लिए ₹15,421.97 करोड़ है।
      • यह फंडिंग में एक बड़ी बढोतरी को दिखाता है, वर्ष 2025-26 में आवंटित ₹14,925.81 करोड़ की तुलना में 45% से अधिक की बढोतरी और वर्ष 2014-15 के बाद से 230% से अधिक की ऐतिहासिक बढोतरी।
  • लक्षित कल्याण: यह फंडिंग सीधे तौर पर 722 ‘एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों’ के निर्माण और ‘प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान’ (PM-JANMAN) पहल के तहत बुनियादी ढाँचे के लिए फंडिंग करता है।
    • इस पहल का पूरा फोकस ‘विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों’ (PVTGs) को स्वच्छ जल, आवास और स्वास्थ्य सेवाएँ देने पर है।
  • आंतरिक सुरक्षा में एक अहम पड़ाव: जंगल के प्रमुख इलाकों में वामपंथी उग्रवाद (LWE/नक्सलवाद) के कम होने से जमीनी स्तर पर शासन-प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधार आया है।
    • नक्सली हिंसा के कारण अब तक 40,000 से अधिक लोग अपनी जान गँवा चुके हैं, जिसके चलते बुनियादी विकास के कार्य रुक गए थे, लेकिन सुरक्षा बलों द्वारा इन इलाकों को पूरी तरह सुरक्षित किए जाने के बाद, राज्य सरकार पुराने सुरक्षा कैंपों को शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ केंद्रों में बदलकर उन्हें सामुदायिक उपयोग में ला रही है।

चुनौतियाँ

  • एकरूपता का विखंडन: जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को पूरी तरह छूट देने के कारण, यह संहिता पूर्णतः ‘समान’ नहीं रह जाती है।
    • न्यायपालिका को इस बात का मूल्यांकन करना होगा कि क्या ऐसा मिश्रित कानून अनुच्छेद-44 की वास्तविक विधायी उद्देश्य के अनुरूप है।
  • लैंगिक न्याय की दुविधा: समान नागरिक संहिता (UCC) का एक प्राथमिक लक्ष्य विवाह, तलाक और संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में महिलाओं के लिए समान अधिकार तथा लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना है।
    • जनजातीय पारंपरिक कानूनों को पूरी तरह से अछूता छोड़ने का अर्थ यह होगा कि कुछ पारंपरिक, पुरुष-प्रधान प्रथाएँ वैधानिक सुधार के दायरे से बाहर रहेंगी।
  • संहिताकरण का अभाव: चूँकि अधिकांश जनजातीय पारंपरिक कानून अलिखित हैं और मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हैं, इसलिए नागरिक विवादों के दौरान निचले न्यायालय को उनकी सटीक व्याख्या करने में अक्सर कठिनाई होती है।

आगे की राह

  • पारंपरिक प्रथाओं का संहिताकरण: सरकार को स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) और जनजातीय अनुसंधान संस्थानों के साथ मिलकर जनजातीय पारंपरिक कानूनों को व्यवस्थित रूप से प्रलेखित और संहिताबद्ध करना चाहिए, ताकि सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए स्पष्टता सुनिश्चित की जा सके।
  • विकेंद्रीकृत शासन को मजबूत करना: यह सुनिश्चित किया जाए कि विस्तारित बजट को पेसा (PESA) अधिनियम के तहत सीधे स्थानीय ग्राम सभाओं के माध्यम से पारदर्शी रूप से भेजा जाए, जिससे वास्तविक जनजातीय स्वशासन को मजबूती मिले।
  • आम सहमति आधारित दृष्टिकोण: राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक प्रस्तुत करने से पहले, केंद्र सरकार को पारदर्शी मसौदे जारी करने चाहिए और देशज समुदायों के बीच विश्वास उत्पन्न करने व डर को दूर करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद जैसे मंचों का उपयोग करना चाहिए।

निष्कर्ष

समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण को संवैधानिक समानता और जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक स्वायत्तता, दोनों को बनाए रखना चाहिए। जनजातीय पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए, धीरे-धीरे और आपसी परामर्श से सुधार सुनिश्चित करना, समावेशी और सहयोगात्मक राष्ट्र-निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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