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भारत में जल संबंधी शासन

Lokesh Pal May 15, 2026 03:42 4 0

संदर्भ

भारत का जल संबंधी संकट अब केवल कमी की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि शासन, संस्थागत समन्वय और सतत् प्रबंधन की चुनौती के रूप में बढ़ते हुए देखा जा रहा है।

संबंधित तथ्य

  • भारत में वैश्विक जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ हिस्सा निवास करता है। लेकिन इसके पास केवल लगभग 4% वैश्विक मीठे जल संसाधन उपलब्ध हैं।
  • जल मुख्यतः राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत एक राज्य विषय है।

जल संबंधी शासन के बारे में

  • जल संबंधी शासन उन कानूनों, संस्थाओं, नीतियों और प्रक्रियाओं की प्रणाली को संदर्भित करता है, जिनके माध्यम से जल संसाधनों का प्रबंधन, आवंटन, विनियमन और वितरण विभिन्न उपयोगकर्ताओं के बीच सतत् और न्यायसंगत तरीके से किया जाता है।
  • इसमें शामिल हैं:-
    • जल उपयोग से संबंधित निर्णय-निर्माण
    • सरकारों और हितधारकों के बीच समन्वय
    • नदियों, भूजल, सिंचाई और पेयजल का प्रबंधन
    • जल गुणवत्ता का विनियमन और संरक्षण
    • जनभागीदारी और जवाबदेही

 जल संबंधी शासन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • जल की कमी को रोकना: अच्छा  जल संबंधी शासन जल भंडारण, संरक्षण और न्यायसंगत वितरण को बढ़ावा देता है, जिससे जल संबंधी समस्या कम होती है।
    • उदाहरण के लिए, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण सूखा-प्रवण क्षेत्रों में जल तनाव को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में सहायता करते हैं।
  • जल पर संघर्षों में कमी: उचित शासन राज्यों, किसानों, उद्योगों और घरेलू उपयोगकर्ताओं के बीच जल साझा करने के लिए पारदर्शी नियम बनाता है, जिससे विवाद कम होते हैं।
    • उदाहरण के लिए, नदी जल न्यायाधिकरण कावेरी विवाद जैसे अंतर-राज्यीय नदी विवादों को सुलझाने में सहायता करते हैं।
  • सिंचाई दक्षता में सुधार: वैज्ञानिक जल प्रबंधन सूक्ष्म-सिंचाई और कुशल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है, जिससे कृषि में जल की बर्बादी कम होती है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) जैसे कार्यक्रम “प्रति बूँद अधिक फसल” को बढ़ावा देते हैं, जिससे जल उत्पादकता में सुधार होता है।
  • स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित करना: सुदृढ़  जल संबंधी शासन बेहतर अवसंरचना, निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण के माध्यम से सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता में सुधार करता है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा: सतत् जल प्रबंधन नदियों, आर्द्रभूमियों, वनों और जैव विविधता को अत्यधिक दोहन और प्रदूषण से बचाता है। नमामि गंगे जैसी पहलें नदी प्रणालियों में पारिस्थितिकी संतुलन बहाल करने का लक्ष्य रखती हैं।
  • जलवायु अनुकूलन: प्रभावी शासन समुदायों को बाढ़, सूखा और अनियमित वर्षा जैसी जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के लिए तैयार करता है। वाटरशेड विकास और जल संरक्षण कार्यक्रम दीर्घकालिक अनुकूलन को मजबूत करते हैं।

 जल शासन संबंधी चुनौतियाँ

  • संस्थागत विखंडन: केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर अनेक एजेंसियाँ समान कार्य करती हैं, जिससे जल प्रबंधन में समन्वय की कमी तथा अक्षमता उत्पन्न होती है। कमजोर केंद्र–राज्य सहयोग समेकित नीति क्रियान्वयन को और जटिल बनाता है।
  • भूजल विनियमन की विफलता: भूजल को अक्सर भू-स्वामित्व से जुड़ी निजी संपत्ति माना जाता है, जिससे अत्यधिक दोहन को बढ़ावा मिलता है।
    • कमजोर विनियमन और खराब प्रवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में जल स्तर में गिरावट आई है।
  • नदी बेसिन योजना का अभाव: जल संबंधी शासन मुख्यतः प्रशासनिक सीमाओं पर आधारित है, न कि प्राकृतिक नदी बेसिनों पर। पारिस्थितिकी और समेकित बेसिन-स्तरीय दृष्टिकोण के अभाव से सतत् जल प्रबंधन प्रभावित होता है।
  • कमजोर अवसंरचना: जल वैज्ञानिक आकलनों से संकेत मिलता है कि कुल जल उपलब्धता अधिक होने के बावजूद, केवल लगभग 1,100 अरब घन मीटर जल ही उपयोग योग्य माना जाता है, जिसका कारण भंडारण अवसंरचना की सीमाएँ, असमान वर्षा वितरण और पारिस्थितिकी बाधाएँ हैं।
  • प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में गिरावट: स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5,000 घन मीटर से अधिक थी।
    • वर्ष 2026 में यह घटकर लगभग 1,400 घन मीटर रह गई है।
  • वित्तीय बाधाएँ: अपर्याप्त वित्तपोषण और जल अवसंरचना का कुप्रबंधन दक्षता और सेवा प्रदायता को कम करता है।
    • सिंचाई और शहरी जल प्रणालियों में कम लागत वसूली दीर्घकालिक स्थिरता को कमजोर करती है।
  • शहरी जल तनाव: तीव्र शहरीकरण ने जल आपूर्ति नेटवर्क और सीवेज प्रणालियों पर दबाव बढ़ा दिया है। लीकेज, अवैध कनेक्शन शहरों में प्रमुख अक्षमताएँ उत्पन्न करते हैं।
    • नीति आयोग समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार, लगभग 600 मिलियन लोग उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, सूखा, हिमनद पिघलना और अनियमित वर्षा पैटर्न की आवृत्ति बढ़ रही है। ये चरम घटनाएँ जल उपलब्धता और प्रबंधन को अधिक अनिश्चित बनाती हैं।

पर्याप्त वर्षा के बावजूद भारत में जल संकट क्यों उत्पन्न होता है?

  • असमान वर्षा वितरण: भारत में अधिकांश वर्षा मानसून ऋतु के दौरान होती है, जिससे समय और स्थान के आधार पर उच्च भिन्नता उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा और जल कमी होती है।
  • अपर्याप्त भंडारण अवसंरचना: भारत में वर्षा जल को प्रभावी ढंग से संगृहीत और उपयोग करने के लिए पर्याप्त जलाशय, वर्षा जल संचयन प्रणाली और भंडारण सुविधाएँ नहीं हैं। कमजोर भूजल पुनर्भरण तंत्र उपयोग योग्य जल की उपलब्धता को और कम करता है।
  • अत्यधिक भूजल दोहन: ट्यूबवेल सिंचाई के तीव्र विस्तार और मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली ने भूजल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा दिया है। परिणामस्वरूप पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में जल स्तर तेजी से गिर रहा है।
  • अकुशल कृषि पद्धतियाँ: जल-अभाव वाले क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों की कृषि मीठे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाती है। पारंपरिक बाढ़ सिंचाई विधियाँ भी बड़े पैमाने पर जल की बर्बादी का कारण बनती हैं।
  • प्रदूषण और क्षरण: औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज और कृषि अपवाह नदियों, झीलों और भूजल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। इससे स्वच्छ और उपयोग योग्य मीठे जल की उपलब्धता घटती है।
  • कमजोर संस्थागत समन्वय: भारत में जल संबंधी शासन केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के मध्य विभाजित है, जिससे समन्वय की कमी और जिम्मेदारियों का अतिव्यापन होता है। समेकित नदी बेसिन प्रबंधन के अभाव से सतत् योजना और भी कमजोर होती है।

 जल संबंधी शासन से संबंधित सरकारी पहलें

योजना  मंत्रालय  उद्देश्य  मुख्य विशेषताएँ  महत्त्व 
जल जीवन मिशन जल शक्ति मंत्रालय ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित नल जल उपलब्ध कराना फंक्शनल हाउसहोल्ड टैप कनेक्शंस (FHTCs), ग्राम स्तर पर जल योजना ग्रामीण पेयजल पहुँच और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
अटल भूजल योजना जल शक्ति मंत्रालय सतत् भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देना सामुदायिक भागीदारी, भूजल बजटिंग,  जलभृत प्रबंधन जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल क्षय को संबोधित करता है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय सिंचाई दक्षता में सुधार “पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ , ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई कृषि में जल अपव्यय को कम करता है।
नमामि गंगे कार्यक्रम  जल शक्ति मंत्रालय गंगा नदी का पुनरुद्धार सीवेज उपचार, प्रदूषण नियंत्रण, रिवरफ्रंट विकास नदी पारिस्थितिकी और जल गुणवत्ता की बहाली
अमृत (AMRUT) मिशन आवास और शहरी कार्य मंत्रालय शहरी जल अवसंरचना में सुधार जल आपूर्ति नेटवर्क, सीवेज प्रणाली, अपशिष्ट जल पुन: उपयोग शहरी जल प्रबंधन को सुदृढ़ करता है।

चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की अवधारणा

  • चक्रीय जल अर्थव्यवस्था जल प्रबंधन का एक सतत् दृष्टिकोण है, जो जल संसाधनों के पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण, संरक्षण और कुशल आवंटन पर केंद्रित होता है।
  • पारंपरिक उपयोग करो और त्याग दो” मॉडल के विपरीत, यह अपशिष्ट जल को एक संसाधन के रूप में मानते हुए जल दक्षता को अधिकतम करने और दीर्घकालिक स्थिरता को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है।

चक्रीय जल अर्थव्यवस्था के प्रमुख घटक

  • अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण: चक्रीय जल अर्थव्यवस्था विभिन्न गैर-पेय उपयोगों के लिए अपशिष्ट जल के उपचार और पुनः उपयोग को प्रोत्साहित करती है, जिससे मीठे जल के संसाधनों पर दबाव कम होता है।
    • उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग उद्योगों, कृषि और शहरी परिदृश्य जैसे पार्क तथा उद्यानों में किया जा सकता है।
  • कुशल सिंचाई: ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली जैसी आधुनिक सिंचाई विधियाँ जल को सीधे फसलों तक पहुँचाती हैं, जिससे जल की न्यूनतम बर्बादी होती है।
    • प्रेसिजन फार्मिंग’ तकनीकें कृषि जल उत्पादकता को और बढ़ाती हैं तथा मीठे जल संसाधनों का संरक्षण करती हैं।
  • माँग-पक्ष प्रबंधन: माँग-पक्ष उपाय फसल विविधीकरण, कुशल जल उपयोग पद्धतियों और तर्कसंगत जल मूल्य निर्धारण सुधारों के माध्यम से अनावश्यक जल खपत को कम करने पर केंद्रित होते हैं। ये उपाय जल संसाधनों के सतत् और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देते हैं।
  • प्रौद्योगिकीय नवाचार: IoT-आधारित जल निगरानी प्रणाली, स्मार्ट मीटरिंग और GIS मैपिंग जैसी उन्नत तकनीकें जल प्रबंधन की दक्षता को बढ़ाती हैं।
    • ये तकनीकें वास्तविक समय निगरानी, रिसाव का पता लगाने, भूजल आकलन और बेहतर योजना निर्माण में सहायता करती हैं।

जल संबंधी शासन में श्रेष्ठ प्रथाएँ एवं वैश्विक सीख

देश  सर्वोत्तम अभ्यास मुख्य विशेषताएँ भारत के लिए सीख 
इजरायल  ड्रिप सिंचाई एवं अपशिष्ट जल पुनः उपयोग सूक्ष्म सिंचाई का व्यापक उपयोग, कृषि के लिए उपचारित अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण जल-कुशल खेती को बढ़ावा देना और कृषि में बड़े पैमाने पर अपशिष्ट जल पुनः उपयोग
सिंगापुर  ‘NEWater’ पुनर्चक्रण मॉडल उन्नत अपशिष्ट जल उपचार और समेकित शहरी जल प्रबंधन शहरी जल पुनर्चक्रण को सुदृढ़ करना और मीठे जल पर निर्भरता कम करना।
ऑस्ट्रेलिया  ‘मर्रे–डार्लिंग’ नदी बेसिन प्रबंधन बेसिन-स्तरीय योजना, पारिस्थितिकी संरक्षण, अंतर-राज्य समन्वय समेकित नदी बेसिन शासन और सतत् जल आवंटन नीतियाँ अपनाना।

आगे की राह

  • समेकित जल संसाधन प्रबंधन: भारत को नदी बेसिन-स्तरीय योजना और कृषि, उद्योग, शहरी विकास तथा पर्यावरण क्षेत्रों में समन्वित निर्णय-निर्माण के माध्यम से समेकित जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) अपनाना चाहिए।
    • यह दृष्टिकोण जल के कुशल आवंटन में सुधार, अंतर-क्षेत्रीय संघर्षों में कमी और दीर्घकालिक जल स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।
  • स्थानीय शासन को सुदृढ़ करना: विकेन्द्रीकृत जल प्रबंधन और स्थानीय योजना के लिए पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को अधिक शक्तियाँ और वित्तीय संसाधन प्रदान किए जाने चाहिए। समुदाय की बढ़ी हुई भागीदारी जवाबदेही में सुधार, संरक्षण प्रथाओं को प्रोत्साहन और जल-संबंधित योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित कर सकती है।
  • जल उपयोग दक्षता को बढ़ावा देना: भारत को फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए, अनुपयुक्त क्षेत्रों में जल-गहन फसलों से हटना चाहिए और ड्रिप तथा स्प्रिंकलर प्रणाली जैसी स्मार्ट सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए।
    • इसके साथ ही, तर्कसंगत जल मूल्य निर्धारण अपव्यय को कम कर सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में कुशल उपयोग को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • डेटा शासन में सुधार: एक सुदृढ़ जल शासन प्रणाली के लिए वास्तविक समय निगरानी, वैज्ञानिक ‘ जलभृत मैपिंग’ और विश्वसनीय जल वैज्ञानिक डेटाबेस आवश्यक हैं, ताकि साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण किया जा सके। ओपन-एक्सेस डेटा सिस्टम विकसित करने से पारदर्शिता बढ़ेगी, अनुसंधान को मजबूती मिलेगी और बेहतर जल प्रबंधन निर्णयों में सहायता मिलेगी।
  • अपशिष्ट जल पुनः उपयोग का विस्तार: शहरों को अनिवार्य अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण लक्ष्य अपनाने चाहिए, ताकि उद्योगों, कृषि और शहरी परिदृश्य में उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग बढ़ाया जा सके। अपशिष्ट जल पुनः उपयोग का विस्तार मीठे जल संसाधनों पर दबाव कम कर सकता है और चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को बढ़ावा देता है।
  • जलवायु-लचीली जल प्रणालियाँ: भारत को वर्षा जल संचयन, वाटरशेड विकास और अन्य प्रकृति-आधारित समाधान को सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि भूजल पुनर्भरण और जलवायु लचीलापन बढ़ाया जा सके।
    • ऐसे उपाय अत्यधिक वर्षा, सूखा, बाढ़ और दीर्घकालिक जलवायु-जनित जल तनाव का प्रबंधन करने में सहायक हो सकते हैं।

निष्कर्ष

  • भारत की जल समस्या मूलतः केवल जल विज्ञान संबंधी कमी नहीं, बल्कि एक शासन संबंधी चुनौती है।
  • सतत् जल सुरक्षा मजबूत संस्थानों, वैज्ञानिक योजना, सहभागी शासन और संसाधनों के कुशल उपयोग पर निर्भर करेगी।
  • विखंडित प्रबंधन से हटकर समेकित और चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन पारिस्थितिकी स्थिरता, कृषि लचीलापन और समावेशी आर्थिक विकास प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।

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