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पश्चिमी घाट पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) योजना

Lokesh Pal June 26, 2026 02:15 7 0

संदर्भ

.केंद्र सरकार पश्चिमी घाट के लिए पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) की अधिसूचना को अंतिम रूप देने का प्रयास कर रही है, जो मुख्यतः के. कस्तूरीरंगन समिति (2013) की अनुशंसाओं पर आधारित है।

पश्चिमी घाट के बारे में (UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2005)

  • पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर विस्तृत 1,500 किमी लंबी पर्वत शृंखला है।
    • पश्चिमी घाट उत्तरी क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम ऊँचा है।
    • पश्चिमी घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है।
    • उत्तरी क्षेत्रों (महाराष्ट्र और गुजरात) में इसकी औसत ऊँचाई लगभग 900–1,200 मीटर है। दक्षिण की ओर बढ़ने पर चोटियाँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, जहाँ केरल में ऊँचाई 2,000 मीटर से अधिक हो जाती है तथा अनामुडी (2,695 मीटर) इसकी सर्वोच्च चोटी है।

  • निम्नलिखित राज्यों में विस्तृत है
    • गुजरात
    • महाराष्ट्र
    • गोवा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • तमिलनाडु।
  • निम्नलिखित के रूप में मान्यता प्राप्त है
    • यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
    • विश्व के 8 सर्वाधिक जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक।
    • अग्स्त्यामलाई जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र दक्षिणी पश्चिमी घाट में स्थित है।
  • पश्चिमी घाट से उद्गम होने वाली प्रमुख नदियाँ
    • गोदावरी नदी
    • कृष्णा नदी
    • कावेरी नदी
    • पेरियार नदी।

पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या है?

  • पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) ऐसा क्षेत्र है, जिसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया जाता है, जहाँ संवेदनशील पारितंत्रों की सुरक्षा के लिए कुछ विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है।
  • उद्देश्य
    • जैव विविधता का संरक्षण।
    • पर्यावरणीय निम्नीकरण की रोकथाम।
    • सतत् विकास को बढ़ावा देना।
  • प्रदूषणकारी गतिविधियों का विनियमन।

विभिन्न समितियों द्वारा पश्चिमी घाट संरक्षण पर अनुशंसाएँ

  • माधव गाडगिल समिति (पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल, 2011)
    • संपूर्ण पश्चिमी घाट को ESA घोषित करना: समिति ने संपूर्ण पश्चिमी घाट क्षेत्र (लगभग 1,29,037 वर्ग किमी.) को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की।
    • तीन-स्तरीय पारिस्थितिकीय क्षेत्रीकरण: समिति ने क्षेत्र को ESZ-I, ESZ-II और ESZ-III में पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रस्ताव दिया, जिसमें ESZ-I को सर्वोच्च स्तर का संरक्षण प्रदान किया जाना था।
    • विकास पर कड़े प्रतिबंध: समिति ने पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन, पत्थर खनन, ताप विद्युत संयंत्रों तथा बड़े बाँधों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
  • के. कस्तूरीरंगन समिति (उच्च-स्तरीय कार्यदल, 2013)
    • परिदृश्य-आधारित दृष्टिकोण: समिति ने पश्चिमी घाट को 60% सांस्कृतिक परिदृश्य (मानव-प्रधान क्षेत्र) तथा 40% प्राकृतिक परिदृश्य (पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र) में वर्गीकृत किया।
    • ESA क्षेत्र में कमी: समिति ने संपूर्ण पश्चिमी घाट क्षेत्र के बजाय प्राकृतिक परिदृश्य के केवल लगभग 60,000 वर्ग किमी. क्षेत्र को ESA के रूप में अधिसूचित करने की सिफारिश की।
    • संतुलित संरक्षण ढाँचा: समिति ने खनन, ताप विद्युत संयंत्रों, लाल सूची के उद्योगों तथा बड़ी निर्माण परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया, जबकि आबादी क्षेत्रों में सतत् विकास की अनुमति देने की सिफारिश की।
  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का प्रारूप ESA अधिसूचना (2014)
    • परिष्कृत ESA सीमा: उपग्रह मानचित्रण और स्थलीय सत्यापन के आधार पर मंत्रालय ने छह राज्यों में 56,825.7 वर्ग किमी. क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में प्रस्तावित किया।
    • उच्च-प्रभाव वाली गतिविधियों का विनियमन: प्रारूप अधिसूचना में अधिसूचित ESA के भीतर नए खनन, ताप विद्युत संयंत्रों तथा अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया गया।
  • संजय कुमार समिति (2022–2026)
    • मानचित्रण संबंधी विवादों का समाधान: समिति का गठन ग्राम-स्तरीय मानचित्रों में विसंगतियों का समाधान करने तथा राज्य सरकारों द्वारा उठाई गई आपत्तियों की समीक्षा करने के लिए किया गया।
    • चरणबद्ध राज्य-वार कार्यान्वयन: समिति ने पश्चिमी घाट के सभी छह राज्यों के मध्य सहमति की प्रतीक्षा करने के बजाय राज्य-वार आधार पर ESA अधिसूचना लागू करने हेतु लचीला दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की।

पश्चिमी घाट को संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?

  • जैव-विविधता हॉटस्पॉट: पश्चिमी घाट विश्व के आठ सर्वाधिक जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक है, जहाँ हजारों पौधों की प्रजातियाँ तथा ‘लायन-टेल्ड मकॉक’, नीलगिरि तहर, पर्पल फ्रॉग और मालाबार जायंट स्क्विरल जैसी अनेक स्थानिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • जल सुरक्षा: पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसून की पवनों को अवरुद्ध कर, भूजल पुनर्भरण करता है तथा गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और पेरियार जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है, जो 24.5 करोड़ से अधिक लोगों को जल उपलब्ध कराती हैं।
  • जलवायु विनियमन: पश्चिमी घाट के घने वन कार्बन का अवशोषण करते हैं, तापमान का विनियमन करते हैं तथा वर्षा प्रतिरूपों को प्रभावित करते हैं, जिससे जलवायु स्थिरता में महत्त्वपूर्ण योगदान मिलता है।
  • आपदा जोखिम में कमी: स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र भूस्खलन, मृदा अपरदन, बाढ़ तथा आकस्मिक बाढ़ के जोखिम को कम करते हैं, जबकि वनों की कटाई और खनन ऐसी आपदाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाते हैं।
  • पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ एवं आजीविका: यह क्षेत्र जल आपूर्ति, परागण, मृदा संरक्षण, कार्बन भंडारण तथा लाखों लोगों की आजीविका के समर्थन जैसी आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करता है।

पश्चिमी घाट ESA के संबंध में राज्यों की प्रमुख चिंताएँ

  • किसानों एवं बागान मालिकों पर प्रभाव: राज्यों को आशंका है कि ESA संबंधी प्रतिबंधों का कृषि, बागानों तथा भूमि-उपयोग आधारित आजीविकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • अवसंरचना विकास पर बाधाएँ: सड़कों, आवास, विद्युत परियोजनाओं तथा अन्य अवसंरचना पर प्रतिबंधों को क्षेत्रीय विकास में बाधा के रूप में देखा जा रहा है।
  • औद्योगिक विकास में कमी: राज्यों का तर्क है कि उद्योगों पर लगाए गए प्रतिबंध निवेश तथा आर्थिक विस्तार को हतोत्साहित कर सकते हैं।
  • खनन पर प्रतिबंध: खनन पर निर्भर क्षेत्रों को प्रस्तावित प्रतिबंधों के कारण रोजगार, राजस्व तथा आर्थिक अवसरों की हानि की आशंका है।
  • विस्थापन एवं आजीविका के नुकसान का भय: स्थानीय समुदायों को चिंता है कि कड़े पर्यावरणीय विनियमों से उनकी पारंपरिक आजीविकाएँ तथा बस्तियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • बस्तियों को बाहर रखने की माँग: राज्य गाँवों, बागान क्षेत्रों तथा कृषि भूमि को ESA सीमाओं से बाहर रखने की माँग कर रहे हैं।
  • प्रशासनिक एवं सीमा निर्धारण संबंधी विवाद: ग्राम-स्तरीय मानचित्रण, भूमि अभिलेखों तथा उपग्रह-आधारित ESA सीमांकन की सटीकता को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
  • संघवाद एवं राज्यों की स्वायत्तता संबंधी चिंताएँ: राज्यों का मत है कि संरक्षण उपायों में स्थानीय परिस्थितियों का बेहतर प्रतिबिंब होना चाहिए तथा निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में राज्यों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

पश्चिमी घाट ESA पर सहमति निर्माण कठिन क्यों बना हुआ है?

  • संरक्षण बनाम विकास की दुविधा: पश्चिमी घाट एक ओर पारिस्थितिकीय धरोहर है तो दूसरी ओर एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र भी है।
    • जहाँ संरक्षणवादी, जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के संरक्षण के लिए कड़े पर्यावरणीय संरक्षण का समर्थन करते हैं, वहीं राज्यों को आशंका है कि खनन, उद्योगों, अवसंरचना तथा निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध आर्थिक वृद्धि एवं विकास को बाधित कर सकते हैं।
  • केंद्र–राज्य मतभेद: केंद्र सरकार विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आधार पर ESA अधिसूचनाओं को लागू करना चाहती है, जबकि राज्य प्रायः स्थानीय परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाले संशोधनों की माँग करते हैं।
    • ESA के दायरे तथा अनुमेय गतिविधियों को लेकर मतभेदों के कारण लंबे समय से असहमति बनी हुई है।
  • आजीविका संबंधी चिंताएँ: पश्चिमी घाट में लाखों लोग कृषि, बागानों, वानिकी तथा संबंधित गतिविधियों पर निर्भर हैं। किसानों, बागान मालिकों तथा स्थानीय समुदायों को आशंका है कि ESA विनियम आर्थिक अवसरों को सीमित कर सकते हैं, भूमि उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं तथा भविष्य की आजीविका को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न कर सकते हैं।
  • ESA सीमाओं में अस्पष्टता: उपग्रह-आधारित मानचित्रण तथा स्थलीय वास्तविकताओं के मध्य अंतर के कारण ग्राम सीमाओं, भूमि अभिलेखों तथा बस्ती क्षेत्रों को लेकर विवाद उत्पन्न हुए हैं।
    • राज्य बार-बार संशोधन एवं कुछ क्षेत्रों को बाहर रखने की माँग करते रहे हैं, जिससे ESA सीमाओं को अंतिम रूप देने में विलंब हुआ है।
  • अपर्याप्त प्रतिपूर्ति एवं प्रोत्साहन: संरक्षण के कारण कुछ विकासात्मक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगते हैं, जिससे राज्यों को अवसर लागत वहन करनी पड़ती है।
    • राज्यों का तर्क है कि चूँकि पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकीय लाभ पूरे देश को प्राप्त होते हैं, इसलिए संरक्षण से होने वाली हानियों की भरपाई तथा पर्यावरणीय संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता, अनुदान तथा प्रतिपूर्ति तंत्र उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

आगे की राह

  • वैज्ञानिक एवं पारदर्शी ESA सीमांकन: एक विश्वसनीय ESA ढाँचे के लिए उपग्रह चित्रों, स्थलीय सत्यापन, जैव विविधता आकलन तथा अद्यतन भूमि अभिलेखों के संयोजन के माध्यम से पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सटीक पहचान आवश्यक है।
    • मानचित्रण में पारदर्शिता तथा मानदंडों के सार्वजनिक प्रकटीकरण से विवाद कम किए जा सकते हैं तथा हितधारकों के बीच विश्वास स्थापित किया जा सकता है।
  • समुदाय-केंद्रित संरक्षण: संरक्षण प्रयास तब अधिक प्रभावी होते हैं, जब स्थानीय समुदायों को बाधा नहीं बल्कि साझेदार के रूप में देखा जाए।
    • किसानों, जनजातीय समुदायों, बागान श्रमिकों तथा ग्राम संस्थाओं को योजना निर्माण एवं निगरानी में शामिल किया जाना चाहिए। सहभागितापूर्ण शासन यह सुनिश्चित कर सकता है कि स्थानीय आजीविकाओं को प्रभावित किए बिना पारिस्थितिकीय उद्देश्यों की प्राप्ति हो।
  • पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान (PES): पश्चिमी घाट जल सुरक्षा, कार्बन अवशोषण तथा जलवायु विनियमन जैसी महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करता है, जिनका लाभ पश्चिमी घाट से बहुत दूर स्थित क्षेत्रों को भी मिलता है।
    • संरक्षण की लागत वहन करने वाले राज्यों और समुदायों को केंद्र तथा इन सेवाओं के लाभार्थियों से वित्तीय प्रोत्साहन, अनुदान अथवा प्रतिपूर्ति प्राप्त होनी चाहिए, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय संरक्षण को प्रोत्साहन मिले।
  • सतत् आजीविकाओं को बढ़ावा: संरक्षण को आर्थिक अवसरों से जोड़ा जाना चाहिए। सतत् कृषि, जैविक खेती, कृषि-वानिकी, पारिस्थितिकी पर्यटन तथा मूल्य संवर्द्धित वन उत्पाद पर्यावरणीय दबाव को कम करते हुए आय उत्पन्न कर सकते हैं।
    • ऐसे विकल्प पर्यावरण संरक्षण तथा विकासात्मक आकांक्षाओं के मध्य संतुलन स्थापित करने में सहायक हो सकते हैं।
  • खनन एवं पत्थर खनन की सुदृढ़ निगरानी: अनियंत्रित खनन पश्चिमी घाट में आवास विनाश, भूस्खलन तथा जल प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।
    • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को सुदृढ़ बनाना, आवधिक लेखा-परीक्षण, प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी का उपयोग तथा पर्यावरणीय कानूनों का कड़ाई से अनुपालन पारिस्थितिकीय अवनयन को रोकने के लिए आवश्यक है।
  • सहकारी संघवाद एवं सहमति निर्माण: चूँकि पश्चिमी घाट छह राज्यों में विस्तृत है, इसलिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के मध्य सहयोग के बिना संरक्षण सफल नहीं हो सकता है।
    • नियमित परामर्श, विवाद-निवारण तंत्र, कार्यान्वयन में लचीलापन तथा संरक्षण की साझा जिम्मेदारी पारिस्थितिकीय प्राथमिकताओं एवं क्षेत्रीय विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक हो सकती है।
  • समेकित परिदृश्य-आधारित योजना: संरक्षण एवं विकास को अलग-अलग उद्देश्यों के रूप में देखने के बजाय नीतियों में परिदृश्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जो वनों, कृषि, बस्तियों तथा जल संसाधनों को एकीकृत करे।
    • इससे पारिस्थितिकीय संपर्क बनाए रखते हुए सतत् भूमि उपयोग योजना को बढ़ावा मिल सकता है।
  • जलवायु-अनुकूल विकास रणनीति: बाढ़, भूस्खलन तथा अत्यधिक वर्षा की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए पश्चिमी घाट में विकास परियोजनाओं में जलवायु अनुकूलता उपायों को शामिल किया जाना चाहिए।
    • पर्यावरण-अनुकूल अवसंरचना, जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन तथा आपदा जोखिम आकलन को क्षेत्रीय योजना का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

पश्चिमी घाट का संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा तथा आजीविका सुरक्षा के लिए भी एक अनिवार्य पूर्वशर्त है।

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