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संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बाघों के साथ सहअस्तित्व

Lokesh Pal July 29, 2026 05:15 5 0

संदर्भ:

बाघ संरक्षण के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 (2022) हो गई है। हालाँकि, अब  35–40% बाघ अभयारण्यों से बाहर के क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं, जिससे वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक नई संरक्षण रणनीति की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है।

मुख्य बिन्दु :

  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बाघों के संरक्षण के लिए एक पहल आरंभ की है।
    • उद्देश्य:
      • संरक्षित क्षेत्रों के अलावा भी बाघ संरक्षण के लिए एक वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़, परिदृश्य-आधारित ढाँचा निर्मित करना ।
      • मानव-बाघ संघर्ष को कम करना।

भारत की बाघ संरक्षण के क्षेत्र में विशेष उपलब्धियाँ :

  •  बाघ परियोजना (1973): आवास संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से बाघों की घटती संख्या को नियंत्रित करने के उद्देश्य से आरंभ की गई थी ।
  • संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार: बाघ अभयारण्यों की संख्या 1973 में 9 (18,278 वर्ग किलोमीटर) से बढ़कर अब 58 (84,488 वर्ग किलोमीटर) हो गई हैं, जो भारत के कुल भूभाग का लगभग 2.6 प्रतिशत है।
  • बाघों की संख्या में वृद्धि: बाघों की संख्या वर्ष 2006 में तकरीबन 1,411 से बढ़कर वर्ष 2022 में तकरीबन 3,682 हो गई है, जिससे भारत विश्व के 70 प्रतिशत से अधिक की संख्या में जंगली बाघों का निवास स्थल बन गया है।
  • नई संरक्षण संबंधी चुनौतीयाँ : बढ़ती संख्या में बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर मानव-बहुल क्षेत्रों की ओर फैल रहे हैं।

बाघों का बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर की ओर पलायन की मुख्य वजहें

  • आवास संतृप्ति: बढ़ती बाघों की संख्या की वजह से अभयारण्यों की सीमाओं से बाहर क्षेत्रीय विस्तार हो रहा है।
  • बड़े विचरण क्षेत्र की आवश्यकता: बाघ स्वाभाविक रूप से शिकार और साथी की तलाश में क्षेत्रीय फैलाव करते हैं। 
  • संयोजित वन गलियारे: आवास संयोजकता में सुधार से अभयारण्य और गैर-अभयारण्य वनों के मध्य आवाजाही संभव हुई है।
  • साझा परिदृश्य: बाघ अब अभयारण्य वनों, कृषि क्षेत्रों और गाँव की सीमाओं के पास निवास कर रहे हैं, जिससे मनुष्यों के साथ उनकी अंतःक्रिया में वृद्धि हो रही है।

संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बाघों के पलायन की वजह से उत्पन्न मुख्य समस्याएँ :

  • मानव-बाघ संघर्ष: मानव मृत्यु, पशुधन की हानि और आकस्मिक मुठभेड़ जैसी घटनाओं में वृद्धि।
  • सार्वजनिक सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: स्थानीय समुदायों में बढ़ता भय प्रायः वन्यजीव संरक्षण के प्रति प्रतिरोध को जन्म दे सकता है।
  • परिचालन भार: वन विभागों को जटिल बचाव अभियानों और आपातकालीन प्रतिक्रिया संबंधी जरूरतों का सामना करना पड़ता है।
  • विकास का दबाव: सड़कों, बस्तियों और अवसंरचना के विस्तार की वजह से आवास खंडित हो जाता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है।
  • मुआवजे में विलंब: पशुधन या मानव हानि के लिए धीमी क्षतिपूर्ति संरक्षण के प्रति समुदाय के समर्थन को कम करती है।

संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बाघ संरक्षण पहल : 

  • उद्देश्य: मानव जीवन और आजीविका की सुरक्षा करते हुए संरक्षित क्षेत्रों से बाहर बाघों के संरक्षण हेतु एक विज्ञान-आधारित, परिदृश्य-स्तरीय दृष्टिकोण स्थापित करना।
  • दृष्टिकोण: प्रौद्योगिकी, तैयारी और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से प्रतिक्रियात्मक संघर्ष प्रबंधन से हटकर सक्रिय रोकथाम की ओर बदलाव।
  • प्रायोगिक कार्यान्वयन: अखिल भारतीय बाघ आकलन (2022) के आधार पर प्रारंभ में 9 राज्यों के 40 वन प्रभागों में लागू किया गया।
  • सहभागी राज्य: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और असम।

पहल के प्रमुख घटक:

  • संघर्ष निवारण: त्वरित प्रतिक्रिया दलों की तैनाती, संचार प्रणालियों में सुधार और बेहतर बचाव अवसंरचना। 
  • प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी: निगरानी और पूर्व चेतावनी हेतु कैमरा ट्रैप, मानवरहित हवाई यान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा उपग्रह-सक्षम निगरानी प्रणाली का उपयोग।
  • सामुदायिक भागीदारी: जन जागरूकता कार्यक्रमों और भागीदारी-आधारित संरक्षण के माध्यम से स्थानीय समुदायों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना ।
  • समयबद्ध मुआवजा: जनविश्वास को सुदृढ़ करने हेतु क्षतिपूर्ति दावों का सरलीकरण और शीघ्र निपटान की व्यवस्था ।
  • क्षमता निर्माण: प्रभावी संघर्ष प्रबंधन हेतु वन कर्मियों, पशु चिकित्सकों और बचाव दलों को प्रशिक्षित करना।

पहल का महत्त्व:

  • परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण: यह स्वीकार करती है कि बाघ संरक्षण को संरक्षित क्षेत्रों से आगे बढ़कर व्यापक पारिस्थितिक परिदृश्यों तक विस्तारित होना चाहिए।
  • मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व को बढ़ावा: संघर्ष-प्रेरित प्रतिक्रियाओं के स्थान पर सतत सहअस्तित्व को प्रोत्साहित करती है।
  • वन्यजीव शासन को सुदृढ़ करना: प्रौद्योगिकी, संस्थाओं और सामुदायिक भागीदारी को संरक्षण योजनाओं के साथ एकीकृत करती है।
  • जैव विविधता संरक्षण में सहायक: दीर्घकालिक आनुवंशिक विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के लचीलेपन के लिए आवश्यक पारिस्थितिक गलियारों की रक्षा करता है।
  • वैश्विक संरक्षण नेतृत्व: बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के संरक्षण में भारत की वैश्विक अग्रणी स्थिति को सुदृढ़ करती है।

चुनौतियाँ:

  • सामुदायिक समर्थन बनाए रखना: संरक्षण की सफलता स्थानीय समुदायों के निरंतर सहयोग पर निर्भर करती है। 
  • संस्थागत क्षमता: प्रभावी कार्यान्वयन हेतु पर्याप्त जनशक्ति, वित्तपोषण और प्रशिक्षित कार्मिकों की आवश्यकता होती है।
  • विकास और संरक्षण में संतुलन: अवसंरचना विस्तार को पारिस्थितिक विचारों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी को अपनाना : निगरानी उपकरणों हेतु निरंतर निवेश, रखरखाव और कुशल संचालन की आवश्यकता होती है।
  • अंतर-अभिकरण समन्वय: वन विभागों, ज़िला प्रशासनों और स्थानीय निकायों के मध्य समन्वय अनिवार्य बना रहता है।

आगे की राह:

  • परिदृश्य-आधारित योजना को सुदृढ़ करना: बाघ संरक्षण को क्षेत्रीय भू-उपयोग और विकास योजना के साथ एकीकृत करना चाहिए ।
  • मुआवजा प्रणाली में सुधार: पारदर्शी, सरलीकृत और समयबद्ध क्षतिपूर्ति तंत्र सुनिश्चित करना।
  • समुदाय-आधारित संरक्षण को बढ़ावा देना: जागरूकता, आजीविका सहायता और सहभागी प्रबंधन के माध्यम से स्थानीय संरक्षक को प्रोत्साहित करना।
  • आधुनिक संरक्षण प्रौद्योगिकियों में निवेश: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम निगरानी तंत्र, मानवरहित हवाई यान और पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विस्तार किया जाना चाहिए ।
  • संस्थागत क्षमता निर्माण: विशेष प्रशिक्षण और पर्याप्त वित्तीय सहायता के माध्यम से वन शासन को सुदृढ़ करना।

निष्कर्ष:

यह पहल संरक्षित-क्षेत्र-केंद्रित संरक्षण से परिदृश्य-आधारित सहअस्तित्व की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करती है, जो यह स्वीकार करती है कि बाघ संरक्षण का भविष्य विज्ञान-आधारित प्रबंधन, सुदृढ़ संस्थाओं तथा सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पारिस्थितिक संरक्षण और मानव कल्याण के मध्य संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करता है।

UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारणों का परीक्षण कीजिए। संघर्ष को कम करते हुए वन्यजीव संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपायों की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: भारत में बाघ संरक्षण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—

  1. भारत में बाघों की गणना प्रत्येक चार वर्ष में की जाती है।
  2. भारत विश्व के 70% से अधिक जंगली बाघों का आवास है।
  3. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d) 1, 2 और 3

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