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औपनिवेशिक वास्तुकला : भारत की न्यायिक प्रणाली में छिपा हुआ अवरोध

Lokesh Pal April 14, 2026 05:00 15 0

संदर्भ:

असम, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नए उच्च न्यायालय परिसरों से संबंधित हालिया योजनाएँ, औपनिवेशिक युग के न्यायालयी अवसंरचना से आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती हैं।

  • आधुनिक, नागरिक-केंद्रित डिजाइन अवसंरचना पहुँच और दक्षता में सुधार कर सकती है, जिससे लंबित मामलों को संबोधित करने तथा संस्थागत भय से जन-अनुकूल न्याय की ओर स्थानांतरित होने में मदद मिलेगी।

औपनिवेशिक विरासत और “न्यायिक स्लमाइज़ेशन” (Judicial Slumisation):

  • औपनिवेशिक अवशेष: अधिकांश भारतीय अदालतों को ब्रिटिश काल में डिजाइन किया गया था, जिसमें विशाल स्तंभों और वृहद संरचनाओं का उपयोग किया गया, ताकि यह संकेत दिया जा सके कि राज्य सर्वोच्च था और नागरिक केवल प्रजा (वस्तु) के समान थे।
  • लंबित न्यायिक मामलों का बोझ: 1960 में सर्वोच्च न्यायालय ने ~2,600 मामलों का प्रबंधन किया; आज वह आँकड़ा 86,000 से अधिक है, जिसमें निचली अदालतों में 4.6 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
  • न्यायिक स्लमाइज़ेशन (Judicial Slumisation): विधि विशेषज्ञों द्वारा गढ़ा गया यह शब्द, अदालतों के बेतरतीब विस्तार और ‘रेट्रोफिटिंग’ (पुराने ढाँचे में नया जोड़ना) को संदर्भित करता है। इसका परिणाम भीड़भाड़ वाले गलियारे और खराब बुनियादी ढाँचा है, जहाँ न तो न्यायाधीशों और न ही अधिवक्ताओं को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है, जिससे न्याय की गंभीरता कम हो जाती है।

मुख्य अवधारणाएँ और संस्थागत ढाँचा:

  • NCMS-2024: राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (NCMC) यह स्वीकार करती है, कि आधुनिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए बुनियादी ढाँचे में सुधार किया जाना चाहिए। हालाँकि, इसकी वर्तमान उप-समिति मुख्य रूप से जिला तथा तालुका स्तर के न्यायालयों पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे एकीकृत उच्च न्यायालय परिसरों की आवश्यकता की अनदेखी होती है।
  • एकीकृत न्याय केंद्र: एक अवसंरचनात्मक अवधारणा, जहाँ न्यायिक कक्ष एक केंद्रीय बिन्दु के माध्यम से सुलभ होते हैं, जिससे हितधारकों के लिए आवाजाही के समय में कमी और निपटान दर में सुधार होता है।

परिचालन संबंधी बाधाएँ – डॉकेट प्रणाली (The Docket System):

न्यायिक परिसर की भौतिक अवसंरचना सीधे उसकी परिचालन दक्षता को प्रभावित करता है:

  • डॉकेट प्रणाली: भारतीय अदालतें ‘डॉकेट प्रणाली’ पर कार्य करती हैं, जहाँ मामलों की सुनवाई अलग-अलग कमरों में सीरियल नंबर द्वारा की जाती है।
  • विलंब की संस्कृति: संकीर्ण, भीड़भाड़ और अत्यधिक शोर वाले गलियारे वकीलों को व्यापक सुनवाइयों के बीच तेजी से कार्य करने से रोकते हैं। यह जूनियर वकीलों को मुख्य रूप से “पास-ओवर” या “प्रॉक्सी” (स्थगन) लेने के लिए बाध्य करता है, क्योंकि अदालत परिसर में तीव्र आवाजाही के लिए आवश्यक एकीकरण का अभाव है।

न्यायिक बुनियादी ढाँचे के बीच विरोधाभास:

न्यायिक घोषणाओं और भौतिक वातावरण के मध्य एक स्पष्ट विसंगति मौजूद है:

  • अधिकार बनाम वास्तविकता: जबकि उच्च न्यायालय मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत प्रगतिशील निर्णय पारित करते हैं, तथा दिव्यांगों के अधिकारों की वकालत करते हैं, किन्तु अदालत परिसर में अक्सर पालना-घर (क्रेच) या दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सार्वभौमिक पहुँच का अभाव होता है।
  • उपेक्षित हितधारक: वर्तमान बुनियादी ढाँचा सामान्यतः केवल न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि वकीलों, वादी तथा न्यायिक रजिस्ट्री कर्मचारियों की कार्यात्मक आवश्यकताओं की अनदेखी की जाती है।

एक नया विजन – वैश्विक बेंचमार्क:

भारत को औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़ने वाले दिशा-निर्देश बनाने के लिए, न्यायिक वास्तुकला (अवसंरचना निर्माण) विशेषज्ञों की तलाश करनी चाहिए।

  • संयुक्त राज्य अमेरिका (1930 के बाद): कार्यात्मक न्यायालयी कक्ष निर्माण सुनिश्चित करने के लिए, न्यू डील के बाद कठोर डिजाइन दिशा-निर्देश तैयार किए।
  • जापान (1980 के दशक): अपनी आर्थिक समृद्धि के दौरान आधुनिक वास्तुशिल्प मानकों का उपयोग करके टोक्यो जिला अदालत का पुनर्निर्माण किया।
  • ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका: ये राष्ट्र नागरिक-केंद्रित डिजाइनों का उपयोग करते हैं, जो सामुदायिक मूल्यों और स्थानीय सौंदर्य को दर्शाते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि अदालत एक शाही सत्ता की बजाय सार्वजनिक सेवा स्थल की भाँति निर्मित हो।

आगे की राह:

  • मॉडल दिशा-निर्देश : भारत को औपचारिक डिजाइन अवसंरचना ब्लूप्रिंट की आवश्यकता है, जो ध्वनिकी (acoustics) – शोर व्यवस्था, डिजिटल कनेक्टिविटी और जलवायु-उत्तरदायी अवसंरचना को प्राथमिकता देते हों।
  • समावेशिता : सभी नए परिसरों में अनिवार्य पालना-घर (क्रेच), पार्किंग और दिव्यांगों के लिए निर्बाध पहुँच प्रदान की जानी चाहिए।
  • औपनिवेशिक विरासत को त्यागना: लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करने के लिए अदालती वास्तुकला की पुनर्कल्पना करना, “संस्थागत भय” से दूर पीड़ितों और वादियों के लिए अधिक स्वागत योग्य वातावरण की ओर बढ़ना।

निष्कर्ष

नए उच्च न्यायालयों का निर्माण न्याय के भौतिक वातावरण को त्वरित सुनवाई के संवैधानिक वादे के साथ संरेखित करने का सदी में एक बार प्राप्त होने वाला अवसर है। “न्यायिक स्लमाइज़ेशन” से मानव-केंद्रित डिजाइन की ओर बढ़कर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसके न्यायिक स्थल सुलभ होने के साथ मानव कुशल भी हों।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भारत में न्यायिक लंबितता केवल न्यायाधीशों की कमी के कारण नहीं, बल्कि अपर्याप्त न्यायिक अवसंरचना के कारण भी है। ‘न्यायिक स्लमाइज़ेशन’ की अवधारणा का परीक्षण कीजिए, तथा बेहतर न्याय वितरण के लिए न्यायिक परिसरों की पुनर्कल्पना हेतु उपाय सुझाइए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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