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भारत में घटती प्रजनन दर: क्या सरकार को बड़े परिवारों को प्रोत्साहन देना चाहिए?

Lokesh Pal June 12, 2026 05:15 7 0

संदर्भ:

भारत की प्रजनन दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इस पर बहस चल रही है कि क्या सरकार को परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए।

महत्वपूर्ण शब्दावली

  • कुल प्रजनन दर (TFR): एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में औसतन जन्म दिए जाने वाले बच्चों की संख्या।
  • प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन: लगभग 2.1 की कुल प्रजनन दर (TFR) का अर्थ है कि जनसंख्या का प्रतिस्थापन स्थिर बना हुआ है, अर्थात् एक पीढ़ी स्वयं को अगली पीढ़ी में पर्याप्त रूप से प्रतिस्थापित कर रही है।
    • 2.1 से अधिक → जनसंख्या बढ़ती है
    • 2.1 से कम → जनसंख्या अंततः घटने लगती है

भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण

  • भारत ने 1952 में विश्व का पहला आधिकारिक परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया था।
  • प्रारंभिक उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण पर था।
  • वर्तमान में भारत की TFR प्रतिस्थापन स्तर से नीचे (लगभग 1.9) पहुँच चुकी है।

भविष्य से संबंधित चिंताएँ

  • कार्यशील आयु की जनसंख्या में कमी से श्रमबल भागीदारी और आर्थिक उत्पादकता घट सकती है।
  • वृद्ध जनसंख्या में वृद्धि से स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा की मांग बढ़ेगी।
  • उच्च आश्रितता अनुपात कार्यशील आबादी और कल्याणकारी व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डालेगा।
  • यदि पर्याप्त कार्यबल प्रतिस्थापन नहीं हुआ तो भारत अपना जनसांख्यिकीय लाभांश खो सकता है।
  • भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवा और वृद्धजन देखभाल से जुड़ी सक्रिय नीतियों की आवश्यकता होगी।

घटती प्रजनन दर से संबंधित समस्याएँ

1. श्रमबल की कमी

  • युवा जनसंख्या में कमी से कार्यबल का आकार घट सकता है।
  • कम श्रमिकों के कारण औद्योगिक उत्पादकता में कमी, करदाताओं की संख्या में गिरावट तथा आर्थिक विकास की गति में मंदी आ सकती है।
  • श्रमबल की कमी से व्यवसायों तथा सार्वजनिक वित्त पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।

2. वृद्ध होती जनसंख्या

  • वर्ष 2050 तक भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा वृद्ध हो सकता है।
  • इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन तथा दीर्घकालिक देखभाल सेवाओं की मांग में वृद्धि होगी।
  • भारत को एक सुदृढ़ सिल्वर इकोनॉमी विकसित करने की आवश्यकता होगी, जो वृद्धजन स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, सहायक आवास तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिए समर्थन प्रणालियों पर केंद्रित हो।

क्या भारत को अधिक बच्चों के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए?

नकद प्रोत्साहनों के विरुद्ध तर्क

  • छोटी वित्तीय सहायता बच्चों के पालन-पोषण की उच्च लागत की भरपाई नहीं कर सकती।
  • प्रोत्साहन मुख्यतः आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि व्यापक स्तर पर प्रजनन प्रवृत्तियों पर उनका प्रभाव सीमित रह सकता है।
  • यदि परिवारों को पर्याप्त सहायता और संसाधन उपलब्ध कराए बिना अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो ऐसे उपाय गरीबी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

वैश्विक अनुभव

  • पोलैंड: वित्तीय प्रोत्साहनों के कारण जन्म दर में अस्थायी वृद्धि हुई, लेकिन यह प्रभाव लंबे समय तक कायम नहीं रह सका।
  • जापान और दक्षिण कोरिया: जन्म दर बढ़ाने के उद्देश्य से निर्मित गई जनन-समर्थक नीतियों पर भारी सरकारी व्यय के बावजूद, इन देशों की प्रजनन दर बहुत निम्न स्तर पर बनी रही।
  • दक्षिण कोरिया का अनुभव दर्शाता है कि केवल नकद प्रोत्साहन दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होते।

बेहतर उपाय: परिवार-समर्थक नीतियाँ

  • माता और पिता दोनों के लिए सवेतन अभिभावकीय अवकाश उपलब्ध कराया जाए।
  • किफायती और सुलभ बाल देखभाल सेवाएँ सुनिश्चित की जाएँ।
  • सामाजिक सुरक्षा और परिवार सहायता प्रणालियों को मजबूत किया जाए।
  • स्वस्थ कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा दिया जाए।
  • फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों के अनुभव यह बताते हैं कि ये उपाय प्रजनन परिणामों में सुधार ला सकते हैं, हालाँकि वे आवश्यक रूप से प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन को पुनः स्थापित नहीं कर पाते।

मातृत्व दंड 

  • बच्चों के जन्म के बाद महिलाओं के करियर में अक्सर व्यवधान आता है।
  • माताओं को पदोन्नति में धीमी प्रगति और वेतन संबंधी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
  • कुछ महिलाओं को रोजगार की असुरक्षा या रोजगार खोने जैसी समस्याएँ भी झेलनी पड़ती हैं।
  • अतः प्रजनन दर में सुधार के लिए केवल नकद प्रोत्साहनों पर निर्भर रहने के बजाय, मातृत्व दंड को कम करना तथा परिवार-अनुकूल कार्यस्थलों का निर्माण करना आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत की कुल प्रजनन दर के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आने के साथ, बड़े परिवारों को प्रोत्साहित करने की मांग प्रमुखता से उभर रही है। ऐसे प्रस्तावों के जनसांख्यिकीय आधार का परीक्षण कीजिए तथा उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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