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न चीन के समक्ष समर्पण, न अमेरिका पर निर्भरता

Lokesh Pal July 27, 2026 02:00 5 0

संदर्भ:

अमेरिकी विदेश नीति में बढ़ती अनिश्चितता तथा चीन के साथ लगातार बने तनाव ने इस बहस को फिर से तेज कर दिया है कि क्या भारत को अपनी चीन नीति में पुनर्संतुलन करना चाहिए या रणनीतिक स्वायत्तता  की नीति पर ही आगे बढ़ना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • बदलता अमेरिकी दृष्टिकोण: टैरिफ, वीज़ा प्रतिबंध और बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं सहित अमेरिका की हालिया नीतिगत घटनाओं ने दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के रूप में वाशिंगटन की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
  • भारत-चीन संबंधों में गिरावट: डेपसांग (2013), चुमार (2014), डोकलाम (2017) और गलवान घाटी संघर्ष (2020) सहित बार-बार हुए सीमा विवादों की वजह से द्विपक्षीय संबंध बिगड़ते गए हैं।

चीन के साथ संबंध सामान्य करने का सुझाव क्यों दिया जा रहा है?

  • व्यावसायिक हित: कई उद्योग चीनी पूँजीगत वस्तुओं , इलेक्ट्रॉनिक्स, सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्वों (APIs) और विनिर्माण निविष्टियों तक आसान पहुँच चाहते हैं।
  • आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता: भारत का औद्योगिक तंत्र अब भी चीनी आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
  • रणनीतिक अनिश्चितता: अमेरिकी विदेश नीति की अप्रत्याशितता को लेकर चिंताओं ने अधिक संतुलित बाह्य सहभागिता  की मांग को बल दिया है।

चीन पर अधिक निर्भरता को लेकर चिंताएँ

  • सीमा पार आक्रामकता: चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा ( LAC) को क्रमिक सैन्य कार्रवाइयों के माध्यम से बार-बार बदलने का प्रयास किया है।
  • क्षेत्रीय दावे: बीजिंग अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे जताता रहा है, स्टेपल वीज़ा जारी करता है और भारत की क्षेत्रीय सत्यनिष्ठा को चुनौती देता है।
  • पाकिस्तान को समर्थन: चीन निरंतर सैन्य, कूटनीतिक और तकनीकी सहयोग के माध्यम से पाकिस्तान का प्रमुख रणनीतिक साझेदार बना हुआ है।
  • आर्थिक जबरदस्ती : चीन ने आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार निर्मित करने और विभिन्न महत्त्वपूर्ण औद्योगिक निविष्टियों के निर्यात पर रोक लगाने की अपनी इच्छाशक्ति जाहीर की है।
  • रणनीतिक निर्भरता: व्यापार घाटे के बढ़ते आकार से भारत की आर्थिक सुभेद्यता बढ़ती है और रणनीतिक सुनम्यता में कमी दर्ज की गई है।

रणनीतिक स्वायत्तता का महत्त्व

  • स्वतंत्र निर्णय-प्रक्रिया: भारत को विदेश नीति केवल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तैयार करनी चाहिए।
  • संतुलित सहभागिता: रणनीतिक स्वायत्तता भारत को अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान, आसियान (ASEAN) और वैश्विक दक्षिण  के साथ एक साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखने में सक्षम बनाती है।
  • विविधीकृत साझेदारियाँ: किसी एक देश पर निर्भरता घटाने से दीर्घकालिक सुदृढ़ता मजबूत होती है।
  • अधिक रणनीतिक लाभ: विविधीकृत विदेश नीति बहुध्रुवीय (Multipolar) होती दुनिया में भारत की सौदेबाज़ी क्षमता को मजबूत करती है।

सरकारी पहलें

पहल विवरण
आत्मनिर्भर भारत घरेलू विनिर्माण एवं तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना रणनीतिक क्षेत्रों में विनिर्माण को मज़बूती
राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति आपूर्ति शृंखला दक्षता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) व्यापार व संपर्क  का विविधीकरण
आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ता पहल (SCRI) जापान व ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से सुदृढ़ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण

चुनौतियाँ

  • आयात निर्भरता: कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अब भी चीनी निविष्टियों पर बहुत हद तक निर्भर हैं।
  • तकनीकी अंतराल : उन्नत विनिर्माण में घरेलू क्षमताएँ अब भी सीमित हैं।
  • भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता भारत के रणनीतिक विकल्पों को जटिल बना रही है।
  • संक्रमण लागत : आपूर्ति शृंखला विविधीकरण से अल्पकाल में उत्पादन लागत बढ़ सकती है।

आगे की राह

  • घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करना: रणनीतिक उद्योगों व उन्नत तकनीकों में स्वदेशी क्षमताओं का विस्तार।
  • आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण: यूरोप, पूर्वी एशिया और वैश्विक दक्षिण के विश्वसनीय साझेदारों से सोर्सिंग बढ़ाना।
  • विभिन्न देशों के साथ संबंधों को गहरा करना: कठोर गठबंधन ढाँचों में शामिल हुए बिना मुद्दा-आधारित साझेदारियाँ जारी रखना।
  • सीमा सुसज्जता में वृद्धि: LAC पर अवसंरचना और सैन्य क्षमताओं में सुधार।
  • महत्त्वपूर्ण तकनीकों में निवेश: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों  में आत्मनिर्भरता का निर्माण करना।
  • व्यावहारिक कूटनीति को बनाए रखना: भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृढ़ता से रक्षा करते हुए चीन के साथ संवाद जारी रखना।

निष्कर्ष:

निष्कर्षतः भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का आधार आर्थिक सुदृढ़ता, विविधीकृत साझेदारियों और घरेलू आत्मनिर्भरता पर टिका होना चाहिए — न कि अमेरिका या चीन, किसी एक की निर्भरता पर।

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की नीति वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तनों के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है? भारत-अमेरिका, भारत-चीन तथा अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों के आलोक में चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न: आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ता पहल (Supply Chain Resilience Initiative—SCRI)’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—

  1. यह भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की एक पहल है।
  2. इसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक लचीला, विश्वसनीय और विविधीकृत बनाना है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों

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