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भारत के जलवायु भविष्य का वित्तपोषण: ट्रिलियन-डॉलर का प्रश्न

Lokesh Pal June 05, 2026 05:15 12 0

संदर्भ:

भारत के समक्ष जलवायु वित्तपोषण संबंधी एक विशाल चुनौती विद्यमान है। अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को वर्ष 2030 तक पूरा करने के लिए भारत को ₹162.5 ट्रिलियन (2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) की आवश्यकता होगी, जबकि वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लगभग 10.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जरूरत पड़ेगी।

  • अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिबद्धताओं के अपेक्षित स्तर तक न पहुँच पाने की स्थिति में, भारत को बड़े पैमाने पर हरित पूँजी जुटाने के लिए शीघ्र ही एक सुदृढ़ और प्रभावी घरेलू वित्तीय ढाँचा विकसित करना होगा।

वित्तीय अंतराल के बारे में

  • क्षेत्रीय मांग: अधिक उत्सर्जन करने वाले चार प्रमुख क्षेत्रों—इस्पात, सीमेंट, बिजली और सड़क परिवहन—के डीकार्बोनाइजेशन हेतु वर्ष 2022 से वर्ष 2030 के बीच अतिरिक्त 467 अरब डॉलर (प्रति वर्ष लगभग 54 अरब डॉलर) के पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होगी।
  • नियामकीय प्रोत्साहन की आवश्यकता: इन क्षेत्रों में निजी निवेश स्वतः नहीं आएगा क्योंकि हरित इस्पात और हरित सीमेंट की आर्थिक व्यवहार्यता अभी भी सीमित है। इनके लिए मजबूत नियामकीय प्रोत्साहनों की आवश्यकता है।
  • वैश्विक वित्तीय कमी: विकसित देश पेरिस समझौते के अंतर्गत प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर उपलब्ध कराने के लक्ष्य को पूरा नहीं कर सके। वहीं, बाकू नई सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (NCQG) के तहत वर्ष 2035 तक 300 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता को भी व्यापक रूप से अपर्याप्त माना जा रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार भारत को हरित वित्त में प्रतिवर्ष अपने GDP का अतिरिक्त 2.5% निवेश करना होगा।
  • सकारात्मक प्रगति: भारत ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 2024 के अंत तक भारत ने 55.9 अरब डॉलर का सतत ऋण जारी किया, जो वर्ष 2021 की तुलना में 186% अधिक है। इसमें 83% हिस्सा हरित ऋण का था, जिसे ₹477 अरब के संप्रभु हरित बांड का समर्थन प्राप्त है।

जिन चुनौतियों का समाधान आवश्यक है

  • समन्वयकारी तंत्र: यद्यपि ग्रीन बॉन्ड, ब्लेंडेड फाइनेंस तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) जैसे वित्तीय साधन उपलब्ध हैं, फिर भी प्रणाली में एक मानकीकृत वर्गीकरण, गारंटी संरचना तथा तरलता तंत्र का अभाव है। परिणामस्वरूप, हरित ऋण को कार्बन-गहन “ब्राउन” ऋण की तुलना में अधिक सस्ता और आकर्षक बनाना अभी संभव नहीं हो पाया है।
  • RBI का हरित वित्त अभियान: वर्ष 2025 में RBI ने जलवायु वित्त और जलवायु परिवर्तन जोखिम प्रबंधन जारी किए, जिसके तहत वाणिज्यिक बैंकों को जोखिम प्रबंधन में जलवायु जोखिमों को शामिल करना अनिवार्य किया गया। साथ ही, पात्र हरित गतिविधियों को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) के अंतर्गत शामिल किया गया।
  • PSL की शक्ति: PSL एक अत्यंत प्रभावशाली नीति उपकरण है। प्रत्येक ₹10,000 करोड़ के ऋण में से वाणिज्यिक बैंकों को ₹4,000 करोड़ प्राथमिकता क्षेत्रों को देना होता है। हरित परियोजनाओं को PSL का दर्जा मिलने से बैंकिंग क्षेत्र का ध्यान स्वतः स्थिरता और हरित निवेश की ओर स्थानांतरित हो जाता है।
  • आधारभूत ढाँचे का अभाव: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में राष्ट्रीय जलवायु-वित्त वर्गीकरण की घोषणा की थी। यह हरित परिसंपत्तियों की पहचान, ग्रीनवॉशिंग की रोकथाम तथा अंतरराष्ट्रीय अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा।

जलवायु निधियों का सामाजिक हाशियाकरण एवं विकेंद्रीकरण

  • अपर्याप्त रूप से उपयोग किया गया मिश्रित वित्त (Blended Finance): भारत मिश्रित वित्त का पर्याप्त उपयोग नहीं कर रहा है। यह एक ऐसी रणनीति है जिसमें सार्वजनिक या रियायती निधियों का उपयोग निजी निवेश के जोखिम को कम करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, सरकार द्वारा दी गई 100 मिलियन डॉलर की प्रथम-हानि गारंटी जोखिम को वहन कर सकती है और हरित हाइड्रोजन या पवन ऊर्जा जैसी परियोजनाओं में 1 बिलियन डॉलर तक के निजी सह-निवेश को आकर्षित एवं प्रोत्साहित कर सकती है।
  • संघीय स्तर पर जोखिम का विकेंद्रीकरण: जलवायु अनुकूलन संबंधी कार्य—जैसे विदर्भ में सूखा-रोधी उपाय या ओडिशा में तटीय सुरक्षा—राज्य सरकारों द्वारा किए जाते हैं। किंतु अधिकांश राज्यों के पास वैश्विक जलवायु पूँजी बाजारों तक सीधे पहुँचने की वित्तीय क्षमता या संस्थागत संरचना का अभाव है।
  • संस्थागत अदृश्यता: यद्यपि तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य महत्वाकांक्षी जलवायु कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं, फिर भी व्यापक वित्तीय ढाँचे की कमजोरी के कारण कई क्षेत्रीय अनुकूलन परियोजनाएँ वित्तीय संसाधनों के अभाव में अटकी हुई हैं।

आगे की राह 

  • वर्गीकरण: जलवायु-वित्त वर्गीकरण तथा क्षेत्र-विशिष्ट ढाँचों (जैसे ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी) को शीघ्र अंतिम रूप देकर लागू किया जाए, ताकि “हरित” गतिविधियों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा स्थापित हो सके।
  • प्रोत्साहन से अनिवार्यता की ओर: RBI को केवल हरित वित्त को प्रोत्साहित करने तक सीमित न रहकर इसे नियामकीय रूप से अनिवार्य बनाना चाहिए। इसके लिए विभेदित पूँजी आवश्यकताओं को लागू किया जा सकता है, जिससे प्रदूषणकारी या “ब्राउन” क्षेत्रों को दिए जाने वाले ऋण अधिक पूँजी-गहन बनें। साथ ही, बैंकों के संपूर्ण ऋण पोर्टफोलियो पर कठोर जलवायु तनाव-परीक्षण लागू किया जाना चाहिए, ताकि जलवायु संबंधी वित्तीय जोखिमों का बेहतर आकलन और प्रबंधन किया जा सके।
  • राज्यों की वित्तीय पहुँच: केंद्र सरकार, NABARD तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से एक राज्य जलवायु वित्त सुविधा स्थापित की जानी चाहिए, जिससे राज्यों और नगर निकायों को हरित ऋण बाजारों तक सीधी पहुँच प्राप्त हो सके।
  • संप्रभु हरित बांड बाजार का विस्तार: संप्रभु हरित बांडों के निर्गम को तीव्र गति से बढ़ाया जाए तथा उन्हें स्थायी रूप से वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) ढाँचे में शामिल किया जाए, ताकि घरेलू संस्थागत निवेश का स्थायी प्रवाह सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

भारत की जलवायु-वित्त संबंधी बाधा धन की पूर्ण कमी का नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता की कमी का प्रश्न है। यदि आगामी बजटों में नियामकीय साधनों को अधिक प्रभावी बनाया जाए, तो भारत अपनी प्राकृतिक पूँजी को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे अधिक लचीली, समावेशी और न्यायसंगत आर्थिक सुरक्षा-पंक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “भारत के जलवायु अनुकूलन एवं शमन लक्ष्यों की प्राप्ति में चुनौती केवल वित्तीय साधनों की उपलब्धता नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर पूँजी जुटाने की है”। हाल की RBI पहलों तथा व्यापक जलवायु-वित्त वर्गीकरण की आवश्यकता के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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