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राजकोषीय नीति: गिरते हुए रुपये की चुनौती

Lokesh Pal May 23, 2026 05:00 11 0

संदर्भ:

23 मई 2026 तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर होकर ₹97 प्रति डॉलर तक पहुँच गया है।

इसने अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को हस्तक्षेप करना चाहिए या मुद्रा का मूल्य बाजार को स्वयं निर्धारित करने देना चाहिए।

रुपये के अवमूल्यन (Depreciation) के कारण

  • ऊँची तेल कीमतें: होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में नाकाबंदी के कारण तेल आयात महँगा हो गया है। चूँकि भारत अपने तेल की लगभग 85% आवश्यकताओं का आयात करता है, इसलिए आयात बिल चुकाने के लिए डॉलर की माँग बढ़ गई है।
  • बाह्य मुद्रास्फीति (External Inflation): अन्य देशों से आयातित वस्तुओं, जैसे उर्वरकों की ऊँची कीमतें, डॉलर की आवश्यकता को और बढ़ा देती हैं।
  • पूँजी का पलायन: विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं और अमेरिका में निवेश कर रहे हैं, जहाँ ब्याज दरें बढ़कर 5% हो गई हैं।

विनिमय दर (Exchange Rate) का अर्थ

  • विनिमय दर का अर्थ है एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा के संदर्भ में मूल्य, जैसे 1 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए कितने रुपये की आवश्यकता होगी।

वर्तमान स्थिति

  • भारतीय रुपया लगातार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है, जिससे मुद्रास्फीति, आयात और व्यापक आर्थिक स्थिरता (मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता) को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।

रुपये के अवमूल्यन के कारण

  • बढ़ती तेल कीमतें: भारत अपनी लगभग 85% कच्चे तेल की आवश्यकताओं का आयात करता है, और वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल और डॉलर की माँग बढ़ जाती है।
  • बाह्य मुद्रास्फीति : निर्यातक देशों में मुद्रास्फीति बढ़ने से उर्वरक और मशीनरी जैसी आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे डॉलर की माँग और अधिक बढ़ जाती है।
  • FIIs द्वारा पूँजी बहिर्गमन (Capital Outflows by FIIs): विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अमेरिका में उच्च ब्याज दरों के कारण भारत से अपने निवेश निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की माँग बढ़ रही है।

मुद्दा : क्या RBI को हस्तक्षेप करना चाहिए?

मत/दृष्टिकोण 1: रुपये को अपना बाज़ार मूल्य निर्धारित करने दें

कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि:

  • गीता गोपीनाथ जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रुपये को बाजार की शक्तियों के अनुसार अपना स्वाभाविक मूल्य तय करने देना चाहिए।
  • अवमूल्यन का निर्यात पर प्रभाव: कमजोर रुपया भारतीय वस्तुओं को वैश्विक स्तर पर सस्ता बनाता है, जिससे निर्यात बढ़ता है और व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होता है।
  • आयात पर प्रभाव: अवमूल्यन से आयात महँगा हो जाता है, जिससे अनावश्यक आयात कम होते हैं और व्यापार असंतुलन को सुधारने में मदद मिलती है।
  • RBI के हस्तक्षेप पर चिंता: यदि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये को कृत्रिम रूप से स्थिर करता है, तो निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।

मत/दृष्टिकोण 2: RBI को रुपये को स्थिर करना चाहिए

  • लगातार गिरावट का डर: कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि लगातार गिरती हुई मुद्रा अनिश्चितता उत्पन्न करती है और व्यापार एवं निवेश को हतोत्साहित करती है।
  • निर्यात निर्णयों में देरी: विदेशी खरीदार आगे और अवमूल्यन की आशंका में खरीदारी टाल सकते हैं, जिससे तत्काल निर्यात माँग कम हो सकती है।
  • आयात का अग्रिम-क्रय (Front-loading of Imports): भारतीय आयातक भविष्य में रुपए के अवमूल्यन की आशंका से डॉलर की खरीद पहले ही कर सकते हैं, जिससे डॉलर की सट्टेबाज़ी वाली मांग बढ़ जाती है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार पर जोखिम: RBI द्वारा डॉलर की अत्यधिक बिक्री के माध्यम से हस्तक्षेप करने से विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकता है, जिससे वर्ष 1991 के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) संकट जैसी स्थिति का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

आगे की राह 

  • FII की बजाय FDI पर अधिक ध्यान: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अस्थिर विदेशी संस्थागत निवेश (FII) प्रवाह की तुलना में अधिक स्थिर और उत्पादक होता है, जिसे अक्सर “हॉट मनी” कहा जाता है।
  • सरकारी प्रतिबद्धता का महत्व: स्पष्ट नीतिगत संकेत और सरकारों द्वारा विश्वसनीय हस्तक्षेप बाजार की अपेक्षाओं और मुद्रा की अस्थिरता को स्थिर करने में मदद कर सकते हैं।

 शब्द   अर्थ 
 रुपये का अवमूल्यन डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट
 आयातित मुद्रास्फीति आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ने से होने वाली महँगाई
 FII  विदेशी संस्थागत निवेशक जो वित्तीय बाजारों में निवेश करते हैं
 FDI  दीर्घकालिक उत्पादक परिसंपत्तियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
 हॉट मनी अल्पकालिक अस्थिर पूँजी जो तेजी से किसी देश में आ-जा सकती है
 आयात की अग्रिम खरीद भविष्य में अवमूल्यन की आशंका के कारण पहले से डॉलर/आयात खरीद लेना
 सट्टात्मक पूँजी पलायन मुद्रा के कमजोर होने की आशंका के कारण पूँजी का बाहर जाना

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारतीय रुपये का अवमूल्यन व्यापक आर्थिक मूलभूत कारकों (macroeconomic fundamentals) की तुलना में सट्टात्मक विदेशी पूँजी के बहिर्गमन से अधिक प्रभावित होता है। चर्चा कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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