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लैंड पूलिंग (Land Pooling): शहरी विकास का सहभागी मॉडल

Lokesh Pal June 03, 2026 05:30 13 0

संदर्भ:

तेजी से हो रहे शहरीकरण के लिए सड़कों, आवास, पार्कों, उपयोगिता सेवाओं तथा सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण हेतु भूमि की आवश्यकता होती है। किंतु भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर तथा पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (RFCTLARR Act, 2013) के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रायः महंगी तथा विवादास्पद सिद्ध होती है।

लैंड पूलिंग (Land Pooling) क्या है?

  • स्वैच्छिक भूमि एकत्रीकरण तंत्र: लैंड पूलिंग एक स्वैच्छिक भूमि विकास मॉडल है, जिसमें कई भूमि स्वामी अपनी भूमि को एक साथ मिलाकर नियोजित शहरी विकास के लिए उपलब्ध कराते हैं।
  • भूमि स्वामियों द्वारा भूमि का योगदान: इस योजना के अंतर्गत भूमि स्वामी अपनी भूमि का एक निर्धारित भाग (सामान्यतः 25–40%) विकास प्राधिकरण को सार्वजनिक अवसंरचना तथा नागरिक सुविधाओं के निर्माण हेतु प्रदान करते हैं।
  • सरकार द्वारा अवसंरचना विकास: सरकार या नियोजन प्राधिकरण संकलित (पूल की गई) भूमि पर सड़कें, जल निकासी प्रणाली, जलापूर्ति, सीवरेज नेटवर्क, हरित क्षेत्र तथा अन्य शहरी अवसंरचनाओं का विकास करता है।
  • विकसित भूखंडों की वापसी: अवसंरचना विकास पूर्ण होने के बाद शेष भूमि को मूल भूमि स्वामियों को विकसित भूखंडों के रूप में वापस कर दिया जाता है। बेहतर अवसंरचना और शहरीकरण के कारण इन भूखंडों का मूल्य पहले की तुलना में काफी अधिक हो जाता है।

लैंड पूलिंग कैसे कार्य करती है?

  • चरण 1: भूमि पूलिंग: नियोजित शहरी विकास के लिए अनेक भूमि स्वामी स्वेच्छा से अपने-अपने भूमि खंडों को एक साझा लैंड पूल में सम्मिलित करते हैं।
  • चरण 2: अवसंरचना विकास: सरकार या विकास प्राधिकरण संकलित (पूल की गई) भूमि पर आवश्यक सड़कें, पार्क, उपयोगिता सेवाएँ, सार्वजनिक सुविधाएँ तथा किफायती आवास विकसित करता है।
  • चरण 3: भूमि का पुनर्गठन: विकास कार्य पूर्ण होने के बाद, भूमि स्वामियों को उनके मूल भूमि योगदान के अनुपात में आकार में कुछ छोटे, किंतु पूर्णतः विकसित एवं सभी आवश्यक सुविधाओं से युक्त भूखंड वापस प्राप्त होते हैं।
  • चरण 4: मूल्य वृद्धि: बेहतर अवसंरचना और शहरी संपर्क के कारण भूमि के मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जिससे भूमि स्वामियों और सरकार दोनों को लाभ प्राप्त होता है।

लैंड पूलिंग के लाभ

  • सहभागी शहरीकरण: भूमि स्वामी केवल मुआवज़ा प्राप्त करने वाले निष्क्रिय पक्ष न रहकर विकास प्रक्रिया के सक्रिय हितधारक बन जाते हैं। इससे अनिवार्य भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों, विरोध और न्यायिक मुकदमों में कमी आती है।
  • वित्तीय रूप से स्थायी मॉडल: इस मॉडल के अंतर्गत सरकार को भूमि अधिग्रहण पर बड़ी प्रारंभिक राशि खर्च नहीं करनी पड़ती, जिससे शहरी विस्तार अधिक वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनता है तथा राजकोषीय बोझ भी कम होता है।
  • बड़े पैमाने पर विस्थापन का अभाव: चूँकि भूमि स्वामी अपनी भूमि के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से का स्वामित्व बनाए रखते हैं, इसलिए यह मॉडल विस्थापन, पुनर्वास तथा पुनर्स्थापन से जुड़ी चुनौतियों को न्यूनतम करता है।
  • लाभों का न्यायसंगत साझाकरण: शहरी विकास तथा भूमि मूल्यों में वृद्धि से प्राप्त लाभों को सरकार और भूमि स्वामियों के बीच साझा किया जाता है, जिससे विकास के लाभों का अधिक संतुलित एवं न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित होता है।
  • तेज़ शहरी विस्तार: लैंड पूलिंग नियोजित शहरी विकास, अवसंरचना निर्माण तथा भूमि के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करती है, जिससे शहरों और शहरी गलियारों के विकास में तेजी आती है।

लैंड पूलिंग के सफल राज्यीय उदाहरण

  • गुजरात मॉडल: गुजरात ने गुजरात टाउन प्लानिंग स्कीम (TPS) के माध्यम से लैंड पूलिंग को सफलतापूर्वक लागू किया है। यह मॉडल भूमि एकत्रीकरण, अवसंरचना विकास तथा विकसित भूखंडों के न्यायसंगत पुनर्वितरण को एकीकृत करता है।
  • प्रमुख शहरों में कार्यान्वयन: इस मॉडल को अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट जैसे शहरों में व्यापक रूप से अपनाया गया है, जिससे नियोजित शहरी विस्तार और बुनियादी ढाँचे के निर्माण में मदद मिली है।
  • महाराष्ट्र मॉडल: महाराष्ट्र ने शहरी विकास, अवसंरचना परियोजनाओं तथा परि-शहरी (Peri-Urban) क्षेत्रों के विकास को समर्थन देने के लिए लैंड पूलिंग तंत्र को व्यापक स्तर पर अपनाया है, विशेषकर तेजी से विस्तार कर रहे महानगरीय क्षेत्रों के आसपास।
  • प्रमुख शहरी केंद्रों के आसपास विकास: इस दृष्टिकोण का उपयोग मुंबई और पुणे तथा उनके आसपास के क्षेत्रों में किया जा रहा है। इससे भूमि उपलब्धता संबंधी बाधाओं को दूर करने में सहायता मिल रही है तथा सतत शहरीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।
  • राज्यों के अनुभवों से प्रमुख सीख: गुजरात और महाराष्ट्र दोनों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि प्रभावी नियोजन, पारदर्शी शासन तथा हितधारकों की सक्रिय भागीदारी लैंड पूलिंग योजनाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

लैंड पूलिंग से संबंधित चुनौतियाँ

  • भूमि स्वामियों के बीच विश्वास का निर्माण: अनेक भूमि स्वामियों को भूमि स्वामित्व के नुकसान तथा भविष्य में मिलने वाले प्रतिफल को लेकर अनिश्चितता का भय रहता है, जिसके कारण वे लैंड पूलिंग योजनाओं में भाग लेने के प्रति अनिच्छुक रहते हैं।
  • कानूनी अस्पष्टताएँ: स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों और सुदृढ़ कानूनी ढाँचे के अभाव में भूमि स्वामित्व, मुआवज़े तथा भूखंडों के पुनर्वितरण से संबंधित विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। इससे लैंड पूलिंग योजनाओं के कार्यान्वयन में अनिश्चितता और कानूनी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
  • वित्तपोषण संबंधी चिंताएँ : सफल क्रियान्वयन के लिए अवसंरचना विकास हेतु प्रारंभिक स्तर पर पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो संबंधित प्राधिकरणों के लिए वित्तीय चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकती हैं।
  • भूमि अभिलेखों की खराब स्थिति: त्रुटिपूर्ण, पुराने तथा गैर-डिजिटीकृत भूमि अभिलेख अक्सर भूमि की पहचान, स्वामित्व के सत्यापन और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब का कारण बनते हैं।
  • प्रशासनिक क्षमता संबंधी सीमाएँ: लैंड पूलिंग के प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी के लिए सशक्त नियोजन संस्थानों, कुशल प्रशासनिक तंत्र तथा तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

आगे की राह 

  • कानूनी ढाँचे को सुदृढ़ बनाना: लैंड पूलिंग के लिए पारदर्शी, पूर्वानुमेय एवं व्यापक कानूनी प्रावधान स्थापित किए जाएँ, ताकि क्रियान्वयन के दौरान कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित हो और विवादों में कमी आए।
  • भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण: उचित भूमि मानचित्रण, स्वामित्व सत्यापन तथा डिजिटीकृत भूमि अभिलेख की उपलब्धता सुनिश्चित किए जाएँ, ताकि परियोजनाओं का सुचारु क्रियान्वयन हो सके और पारदर्शिता में वृद्धि हो।
  • लाभों के पारदर्शी साझाकरण की व्यवस्था: भूमि स्वामियों को संभावित लाभों, भूखंडों के पुनर्वितरण की प्रक्रिया तथा मुआवजा तंत्र के बारे में स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी प्रदान की जानी चाहिए, ताकि उनके बीच विश्वास और सहभागिता की भावना विकसित हो सके।
  • क्षमता निर्माण: शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) तथा नियोजन प्राधिकरणों की संस्थागत और तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ किया जाए, ताकि योजनाओं का प्रभावी नियोजन, क्रियान्वयन एवं निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
  • सामुदायिक सहभागिता: भूमि स्वामियों एवं स्थानीय समुदायों को योजना निर्माण और निर्णय-निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में शामिल किया जाए, ताकि विश्वास, सहयोग तथा परियोजनाओं के प्रति हितधारकों की स्वामित्व भावना को बढ़ावा मिल सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत के शहरी विकास में लैंड पूलिंग नीति किस प्रकार भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के लिए एक वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर तथा सहभागितापूर्ण विकल्प प्रदान करती है? क्षेत्रीय अध्ययन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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