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सार्वजनिक स्वास्थ्य को जनता की आवश्यकताओं से पुनः जोड़ने का महत्त्व

Lokesh Pal June 24, 2026 05:15 10 0

संदर्भ:

हाल के दिनों में भारत की स्वास्थ्य नीति लोगों की तत्काल स्वास्थ्य देखभाल संबंधी आवश्यकताओं से दूर हो रही है, क्योंकि वेलनेस सेंटर्स तथा डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड की पहलों के बावजूद सस्ती उपचारात्मक देखभाल तक पहुँच अभी भी कमजोर बनी हुई है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के बारे में:

  • जनसंख्या स्वास्थ्य: सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति समग्र जनसंख्या के स्वास्थ्य स्तर में सुधार करने और भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में मदद करने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC): सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि प्रत्येक व्यक्ति को वित्तीय कठिनाई का सामना किए बिना आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त हों सकें।
  • साक्ष्य-आधारित नीति: स्वास्थ्य नीतियों को लोकलुभावन या राजनीतिक रूप से आकर्षक योजनाओं की बजाय साक्ष्यों, मापन योग्य परिणामों तथा लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए।
  • स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच: निजी क्षेत्र की बढ़ती लागत और विविध सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधाओं में खराब गुणवत्ता के कारण स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच और गंभीर हो गई है।
  • लोगों की आवश्यकताएँ: सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को सस्ती/वहनीय उपचारात्मक देखभाल (Curative Care) को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि यह अधिकांश लोगों के लिए तात्कालिक स्वास्थ्य आवश्यकता बनी हुई है।

आयुष्मान भारत स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र:

  • नीतिगत पहल: जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने के लिए वर्ष 2018 में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की शुरुआत की गई थी।
  • संस्थागत नामकरण: मौजूदा स्वास्थ्य उप-केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) को “स्वास्थ्य तथा कल्याण केंद्र” का एक समान नाम दिया गया था।
  • जनादेश की अस्पष्टता: इस समान नामकरण ने जमीनी स्तर के स्वास्थ्य संस्थानों के विभिन्न स्तरों की वास्तविक भूमिकाओं तथा उत्तरदायित्व के संबंध में भ्रम उत्पन्न कर दिया है।
  • जिला स्वास्थ्य प्रणाली: जिला स्वास्थ्य प्रणाली के भीतर उप-केंद्रों, PHCs और CHCs के अलग-अलग जनादेश हैं, और उनकी पहचान उनकी संस्थागत भूमिकाओं के अनुसार विकसित हुई थी।
  • वेलनेस की ओर झुकाव: वेलनेस-सेंटर दृष्टिकोण ने ध्यान को जनसंख्या के स्वास्थ्य परिणामों से हटाकर व्यक्तिगत कल्याण पर स्थानांतरित कर दिया है।

वेलनेस-आधारित दृष्टिकोण से संबंधित चिंताएँ:

  • व्यक्तिपरक अवधारणा: कल्याण (Well-being) को परिभाषित करना और मापना कठिन है, क्योंकि यह अत्यधिक व्यक्तिगत तथा व्यक्तिपरक है।
  • मापन की समस्या: जनसंख्या के स्तर पर कल्याण का कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत पैमाना नहीं है, जिससे नीति का मूल्यांकन करना कठिन हो जाता है।
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: वेलनेस का प्रतिमान यह मानकर व्यक्तियों पर अत्यधिक जिम्मेदारी डालता है, कि वे स्वास्थ्य संबंधी विकल्पों को स्वतंत्र रूप से संशोधित कर सकते हैं।
  • संरचनात्मक उपेक्षा: यह दृष्टिकोण स्वास्थ्य परिणामों को आकार देने में गरीबी, स्वच्छता, पोषण, पीने के पानी, पर्यावरण, आवास तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की भूमिका का कम आकलन करता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य में कमजोरी: सार्वजनिक स्वास्थ्य को मापने योग्य और जनसंख्या-आधारित संकेतकों की आवश्यकता होती है, जबकि वेलनेस सामान्यतया व्यक्तिगत व्यवहार और जीवन शैली पर केंद्रित रहता है।

स्वास्थ्य संवर्धन तथा कल्याण

  • स्वास्थ्य संवर्धन : सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य संवर्धन अधिक उपयुक्त है क्योंकि यह उन सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्थितियों को मान्यता देता है जो लोगों के स्वस्थ व्यवहार अपनाने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।
  • जनसंख्या-आधारित दृष्टिकोण: स्वास्थ्य संवर्धन केवल व्यक्तिगत विकल्पों पर जिम्मेवारी डालने की बजाय सामूहिक स्थितियों पर ध्यान केंद्रित करता है, जो स्वास्थ्य परिणामों को आकार देती हैं।
  • मापन योग्य परिणाम: स्वास्थ्य संवर्धन सेवा कवरेज, बीमारी का बोझ, रुग्णता (Morbidity), मृत्यु दर और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच जैसे संकेतकों के माध्यम से बेहतर मापन की अनुमति देता है।
  • समग्र स्वास्थ्य: वेलनेस ने स्वास्थ्य के अर्थ को जैविक बीमारी से आगे बढ़कर मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और पर्यावरणीय आयामों तक विस्तारित किया।
  • नीतिगत सीमा: वेलनेस पर अत्यधिक निर्भरता स्वास्थ्य प्रणालियों की पहुँच, गुणवत्ता और सेवा वितरण में कमियों को पहचानने और उन्हें दूर करने की क्षमता को कमजोर करती है।

स्वास्थ्य का वैयक्तीकरण 

  • बदलता प्रतिमान: सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति तेजी से जनसंख्या के स्वास्थ्य स्तर से हटकर व्यक्तिगत कल्याण की ओर स्थानांतरित हो रही है।
  • पूरी न होने वाली आवश्यकताएँ: पहले के स्वास्थ्य मूल्यांकन में निवारक, संवर्धनात्मक, उपचारात्मक (Curative) तथा पुनर्वास देखभाल में पूरी न होने वाली आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता था।
  • बुनियादी सेवाएँ: सार्वजनिक स्वास्थ्य को पीने के पानी, पोषण, पुरानी बीमारी के प्रबंधन, आपातकालीन देखभाल और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए।
  • हेल्थ कोच: वेलनेस प्रतिमान ने व्यक्तिगत कल्याण को बढ़ावा देने वाले हेल्थ कोचों और सोशल मीडिया संदेशों के उभार को प्रोत्साहित किया है।
  • कमजोर नीतियाँ: व्यक्तिगत कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने से संस्थागत देखभाल और जनसंख्या की स्वास्थ्य आवश्यकताओं से ध्यान हट सकता है जिसकी वजह से मूल सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्य कमजोर हो सकते हैं।

आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (ABDHM):

  • डिजिटल रिपोजिटरी: आयुष्मान भारत डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (ABDHM) का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य जानकारी का एक डिजिटल भंडार (Repository) निर्मित करना है।
  • आभा (ABHA) कार्ड: आभा कार्ड डिजिटल रूप से व्यक्तिगत स्वास्थ्य रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए एक अद्वितीय स्वास्थ्य आईडी (Unique Health ID) प्रदान करता है।
  • स्वास्थ्य रजिस्ट्रियाँ: यह मिशन स्वास्थ्य सुविधाओं, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों और स्वास्थ्य बीमा से संबंधित जानकारी की रजिस्ट्रियाँ बनाए रखने का भी प्रयास करता है।
  • सूचना पोर्टल: डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड और बुनियादी ढाँचा डेटाबेस अपने आप में स्वास्थ्य देखभाल तक अपर्याप्त पहुँच की समस्या को हल नहीं कर सकते हैं।
  • बजट संबंधी चिंताएँ: बेहतर स्वास्थ्य देखभाल पहुँच से जुड़े स्पष्ट मापने योग्य परिणामों के बिना ABDHM को वार्षिक लगभग ₹300 करोड़ के आवंटन का कोई खास मतलब नहीं रह जाता है।

डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की सीमाएँ:

  • डेटा-केंद्रित डिजाइन: ABDHM मुख्य रूप से व्यक्तियों, सुविधाओं और स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों के बारे में जानकारी हासिल करने पर केंद्रित है।
  • देखभाल प्रावधान का अंतर : जब स्वास्थ्य देखभाल का बुनियादी ढाँचा अपर्याप्त और महंगा बना रहता है, तो डिजिटल रिकॉर्ड उपचार की गारंटी नहीं दे सकते।
  • मौजूदा आँकड़ें: भारत के पास स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे, पहुँच और सेवा अंतरालों पर पहले से ही कई रिपोर्ट तथा डेटासेट मौजूद हैं।
  • संस्थागत तंत्र: स्वास्थ्य देखभाल वितरण के लिए मजबूत संस्थानों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, दवाओं, डायग्नोस्टिक्स (जांच), रेफरल प्रणालियों और वित्तीय सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
  • साइलोइड (Siloed) में कार्य करना: डिजिटल मैपिंग के बावजूद मरीज, स्वास्थ्य सुविधाएँ और स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर व्यापक सीमा तक अलग-अलग साइलोस (Silos) में काम करना जारी रखते हैं।

स्वास्थ्य देखभाल तक अपर्याप्त पहुँच के कारक

  • निजी क्षेत्र की लागत: निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य देखभाल आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए महँगी और पहुँच से बाहर बनी हुई है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की गुणवत्ता: सार्वजनिक क्षेत्र की बहुत सी सुविधाएँ खराब गुणवत्ता, कमजोर बुनियादी ढाँचे और अपर्याप्त सेवा वितरण से प्रभावित हैं।
  • अवसंरचनात्मक घाटा: डिजिटल स्वास्थ्य आईडी कार्यात्मक अस्पतालों, डॉक्टरों, नर्सों, डायग्नोस्टिक्स और दवाओं की कमी की भरपाई नहीं कर सकते।
  • वहनीय देखभाल संकट: जेब से होने वाला अत्यधिक खर्च (High out-of-pocket Expenditure) गरीब और कमजोर परिवारों को समय पर स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने से रोकता है।
  • उपचारात्मक देखभाल की आवश्यकता: वहनीय उपचारात्मक देखभाल लोगों के लिए सबसे तात्कालिक और दृश्यमान स्वास्थ्य आवश्यकता है, इससे पहले कि वे निवारक और संवर्धनात्मक हस्तक्षेपों से सार्थक रूप से जुड़ सकें।

शासन संबंधी चुनौतियाँ

  • कमजोर सार्वजनिक संस्थान: भारत की त्रि-स्तरीय (Three-tier) स्वास्थ्य प्रणाली के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थान कई क्षेत्रों में कमजोर बने हुए हैं।
  • नीतिगत अंतराल: हालिया पहलें सेवा वितरण को मजबूत करने की बजाय वेलनेस ब्रांडिंग और डिजिटल जानकारी पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं।
  • कार्यान्वयन घाटा: संस्थानों का नाम बदलने या डिजिटल रिकॉर्ड बनाने से डॉक्टरों, दवाओं और उपचार तक वास्तविक पहुँच स्वचालित रूप से नहीं सुधरती है।
  • परिणाम का अंतर: व्यक्तिपरक कल्याण और डेटा निर्माण के आसपास बनी नीतियों का स्वास्थ्य परिणामों में मापन योग्य सुधारों के बिना मूल्यांकन करना कठिन है।
  • प्रदाता-केंद्रित प्राथमिकताएँ: सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियाँ लोगों की वास्तविक चिंताओं को दूर करने की बजाय, नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के उपकरण के रूप में कार्य कर सकती हैं।

आगे की राह

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करना: भारत को पर्याप्त कर्मचारियों, बुनियादी ढाँचे, दवाओं, डायग्नोस्टिक्स और रेफरल क्षमता के साथ उप-केंद्रों, PHCs और CHCs को मजबूत करना चाहिए।
  • उपचारात्मक देखभाल को प्राथमिकता देना: सस्ती और गुणवत्तापूर्ण उपचारात्मक देखभाल को एक केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता माना जाना चाहिए, क्योंकि यह लोगों की तत्काल आवश्यकताओं को दर्शाती है।
  • स्वास्थ्य वित्तपोषण में सुधार: जेब से होने वाले खर्च को कम करने और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच में सुधार के लिए स्वास्थ्य पर उच्च सार्वजनिक व्यय की आवश्यकता है।
  • स्वास्थ्य परिणामों का मापन: सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को पहुँच, सामर्थ्य, गुणवत्ता, रुग्णता, मृत्यु दर और सेवा कवरेज जैसे मापन योग्य संकेतकों पर भरोसा करना चाहिए।
  • डिजिटल स्वास्थ्य को एकीकृत करना: डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों को सेवा वितरण, रेफरल नेटवर्क, उपचार पहुँच, बीमा सहायता और संस्थागत जवाबदेही के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
  • सामाजिक निर्धारकों को शामिल करना : स्वास्थ्य नीति को पोषण, स्वच्छता, पीने के पानी, पर्यावरण, आवास और स्वास्थ्य के लिए आय-संबंधित बाधाओं को दूर करना चाहिए।
  • स्वास्थ्य संवर्धन को मजबूत करना: निवारक और संवर्धनात्मक देखभाल को संकीर्ण व्यक्तिगत वेलनेस संदेशों के बजाय जनसंख्या-स्तरीय स्वास्थ्य संवर्धन पर बनाया जाना चाहिए।
  • स्वतंत्र मूल्यांकन: स्वतंत्र ऑडिट, परिणाम-आधारित निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही तंत्र के माध्यम से स्वास्थ्य पहलों का नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

निष्कर्षस्वरूप भारत की स्वास्थ्य नीति को वेलनेस प्रतिमानों और डिजिटल डेटा निर्माण पर अत्यधिक निर्भर रहने की बजाय वहनीय उपचारात्मक देखभाल, मजबूत सार्वजनिक संस्थानों और मापन योग्य स्वास्थ्य परिणामों को प्राथमिकता देकर लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं से पुनः जुड़ना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्र. “यद्यपि डिजिटल रूपांतरण और वेलनेस प्रतिमान स्वास्थ्य देखभाल में आधुनिक आवश्यकताएँ हैं, लेकिन वे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों के बुनियादी सुदृढ़ीकरण का विकल्प नहीं हो सकते।” इस कथन के आलोक में भारत में हालिया सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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