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प्रधानमंत्री की अपील और भारत की आर्थिक संवेदनशीलता

Lokesh Pal May 12, 2026 05:15 12 0

संदर्भ: 

प्रधानमंत्री ने देश की अर्थव्यवस्था को सहयोग देने के लिए कम-से-कम एक वर्ष तक कुछ विशिष्ट व्यवहार अपनाने हेतु जनता से एक विशेष परंतु दुर्लभ प्रत्यक्ष अपील की है। इन अनुरोधों में शामिल हैं:

  • खरीदारी पर नियंत्रण: नागरिकों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने की अपील।
  • यात्रा एवं समारोहों में कमी: विदेशी मुद्रा बचाने हेतु विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग (विशेष रूप से इटली या स्विट्जरलैंड जैसे स्थानों पर) से बचने का आग्रह।
  • ऊर्जा संरक्षण: जहाँ संभव हो सके वहाँ वर्क फ्रॉम होम (WFH) अपनाने और ईंधन खपत कम करने हेतु सार्वजनिक परिवहन के उपयोग को बढ़ावा देना।
  • कृषि में परिवर्तन: किसानों से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने का अनुरोध।

आर्थिक दबाव के कारण

  • पश्चिम एशिया संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट:  संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली आपूर्ति को बाधित कर दिया है, जिससे वैश्विक तेल व्यापार प्रभावित हुआ है और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है।
  • भारत की आयात निर्भरता:  भारत अपने कच्चे तेल की आवश्यकताओं का लगभग 80% विदेशी देशों से आयात करता है। परिणामस्वरूप, वैश्विक तेल कीमतों में किसी भी वृद्धि से भारत का आयात बिल काफी बढ़ जाता है।
  • आयात-प्रेरित मुद्रास्फीति:  जब आयातित वस्तुओं की आपूर्ति घट जाती है जबकि मांग स्थिर रहती है, तो कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। आयातित वस्तुएँ महंगी हो जाती हैं, जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति बढ़ती है।

रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव

  • रुपये के अवमूल्यन की प्रक्रिया:  भारत कच्चे तेल के आयात का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है। जैसे-जैसे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, आयात भुगतान के लिए भारत को अधिक मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है।
    • विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग भारतीय रुपये को अमेरिकी डॉलर की तुलना में कमजोर कर देती है। जैसे-जैसे रुपया कमजोर होता है, आयात और अधिक महंगे हो जाते हैं, जिससे अतिरिक्त मुद्रास्फीति का दबाव उत्पन्न होता है।

RBI का हस्तक्षेप

  • रुपये को स्थिर रखने और अत्यधिक मुद्रा अवमूल्यन को रोकने के लिए, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर जारी करता है।

डॉलर की आपूर्ति में यह अस्थायी वृद्धि सहायता करती है:

  • रुपये को स्थिर करना,
  • मुद्रा बाजारों में अस्थिरता/हलचल को कम करना,
  • विनिमय दरों में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना।

हालाँकि, लगातार हस्तक्षेप से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का आकार धीरे-धीरे घटता जाता है।

पूँजी पलायन और विदेशी संस्थागत निवेश (FII) की निकासी

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भूमिका

  • विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) विभिन्न देशों के शेयर बाजारों और वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं। भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक स्थिरता और विकास के दौरान अक्सर विदेशी निवेश का बड़ा प्रवाह देखा जाता है।
  • हालाँकि, युद्ध, भू-राजनीतिक अनिश्चितता या बाजार अस्थिरता के समय विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) उभरते बाजारों से अपने निवेश निकाल लेते हैं और अपने धन को अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसंपत्तियों जैसे अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में स्थानांतरित कर देते हैं।

भारत पर प्रभाव

भारत से विदेशी संस्थागत निवेशों की निकासी के परिणामस्वरूप:

  • अमेरिकी डॉलर का बहिर्गमन होता है,
  • विदेशी मुद्रा भंडार घटता है,
  • रुपया कमजोर होता है।

जैसे-जैसे डॉलर भारतीय अर्थव्यवस्था से बाहर जाते हैं, डॉलर की कमी बढ़ जाती है, जिससे रुपये की तुलना में उनका मूल्य बढ़ जाता है, और परिणामस्वरूप मुद्रा अवमूल्यन और अधिक तीव्र हो जाता है।

सरकार के दृष्टिकोण की आलोचना

  • चुनावों के कारण देरी:  आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक तनाव के संकेत चुनावों से पहले ही दिखाई दे रहे थे, लेकिन राजनीतिक कारणों से कठिन आर्थिक निर्णयों को टाल दिया गया।
    • इस दृष्टिकोण के अनुसार, सरकार ने चुनाव अवधि के दौरान आर्थिक स्थिति की गंभीरता को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया और सुधारात्मक कदम चुनाव समाप्त होने तक स्थगित रखे।
  • चुनावों से पहले ईंधन की कीमतों में वृद्धि नहीं:  एक अन्य आलोचना ईंधन मूल्य निर्धारण नीति से संबंधित है। आलोचकों का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में ईंधन खपत को कम करना चाहती थी, तो ईंधन की कीमतें पहले ही बढ़ाई जा सकती थीं।
    • उच्च कीमतें सामान्यतः अत्यधिक उपभोग को हतोत्साहित करती हैं और संसाधन संरक्षण को प्रोत्साहित करती हैं। लेकिन राजनीतिक कारणों से ऐसे आर्थिक सुधारात्मक कदमों में देरी की गई।

अच्छी अर्थव्यवस्था बनाम अच्छी राजनीति”

  • “अच्छी अर्थव्यवस्था खराब राजनीति है, और अच्छी राजनीति खराब अर्थव्यवस्था।”
    • यह आर्थिक रूप से उचित सुधारों और राजनीतिक रूप से लोकप्रिय उपायों के बीच संघर्ष को उजागर करता है, क्योंकि सब्सिडी के युक्तिकरण और ईंधन मूल्य वृद्धि जैसे आवश्यक कदम अक्सर मतदाताओं के बीच अलोकप्रिय होते हैं।
    • साथ ही, चुनावी लाभ के उद्देश्य से बनाई गई अल्पकालिक लोकलुभावन नीतियाँ दीर्घकालिक आर्थिक अनुशासन और राजकोषीय स्थिरता को कमजोर कर सकती हैं।

एल नीनो संबंधी चिंताएँ

  • एल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जो प्रशांत महासागर के सतही जल के गर्म होने से जुड़ी होती है। यह प्रायः भारतीय मानसून को कमजोर कर देती है और देश में सूखे की संभावना बढ़ा देती है।
  • कमज़ोर मॉनसून कृषि उत्पादकता को कम करता है और खाद्य सुरक्षा पर दबाव डालता है।

श्रीलंका का उदाहरण (2021–22)

  • श्रीलंका से तुलना:  किसानों से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने का अनुरोध आलोचना का विषय बना हुआ है, क्योंकि भारत वर्त्तमान में एल नीनो वर्ष का सामना कर रहा है, जिसमें सामान्यतः कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।  श्रीलंका में रासायनिक उर्वरकों से अचानक दूरी बनाने की नीति के कारण चावल उत्पादन में लगभग 20% की गिरावट आई थी और गंभीर खाद्य संकट उत्पन्न हो गया था।

मुख्य परीक्षा संबंधी प्रश्नों के उत्तरों के लिए महत्वपूर्ण शब्दावली

  • समष्टि आर्थिक संवेदनशीलता (Macroeconomic Vulnerability) — बाह्य या आंतरिक झटकों के कारण व्यापक आर्थिक अस्थिरता की स्थिति।
  • आयात-प्रेरित मुद्रास्फीति (Import-Induced Inflation) — आयातित वस्तुओं (जैसे तेल एवं अन्य कमोडिटी) की कीमत बढ़ने से उत्पन्न मुद्रास्फीति।
  • पूँजी पलायन (Flight of Capital) — FII/विदेशी निवेशकों द्वारा घरेलू अर्थव्यवस्था से पूँजी को निकाल लेना।
  • मुद्रा अवमूल्यन (Currency Depreciation) — विदेशी मुद्राओं की तुलना में रुपये के विनिमय मूल्य में गिरावट।
  • नीतिगत अल्पदृष्टिता (Policy Myopia) — अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने वाली दूरदृष्टिहीन नीति-निर्माण प्रक्रिया।
  • राजकोषीय विवेकशीलता (Fiscal Prudence) — सरकारी व्यय का जिम्मेदार, संतुलित एवं अनुशासित प्रबंधन।

शासन और बुनियादी ढाँचे की समीक्षा

  • वर्क फ्रॉम होम (WFH) की सीमाएँ:  वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाली अपील व्यावहारिक सीमाओं का सामना करती है क्योंकि कर्मचारी अक्सर कार्यस्थल की नीतियों पर स्वतंत्र रूप से नियंत्रण नहीं रखते।
    • अधिकांश मामलों में यह नियोक्ता तय करते हैं कि कर्मचारी घर से कार्य करेंगे या कार्यालय में उपस्थित रहेंगे। इसलिए केवल सार्वजनिक अपीलों के माध्यम से बड़े पैमाने पर वर्क फ्रॉम होम को लागू नहीं किया जा सकता।
  • कमज़ोर सार्वजनिक परिवहन अवसंरचना:  नागरिकों को निजी वाहनों के उपयोग को कम करने और सार्वजनिक परिवहन पर अधिक निर्भर रहने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालाँकि, देश के कई क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन अवसंरचना अभी भी अपर्याप्त है। समस्याओं में शामिल हैं:
    • सार्वजनिक बसों की कमी,
    • कमजोर शहरी परिवहन व्यवस्था,
    • अपर्याप्त कनेक्टिविटी,
    • छोटे शहरों और कस्बों में खराब परिवहन अवसंरचना।
  • मुफ्त योजनाओं (Freebies) की आलोचना:  चर्चा में प्रस्तुत एक व्यापक शासन संबंधी आलोचना राजनीति में मुफ्त योजनाओं के अत्यधिक उपयोग से संबंधित है।
    • इस तर्क के अनुसार, मुफ्त योजनाओं पर अत्यधिक व्यय निम्नलिखित के लिए उपलब्ध राजकोषीय स्थान (Fiscal Space) को कम कर देता है: सड़क अवसंरचना, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, दीर्घकालिक विकास परियोजनाएँ और आर्थिक अवसंरचना का निर्माण।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “विकासशील देशों में राजनीतिक मजबूरियाँ अक्सर समष्टि आर्थिक विवेकशीलता पर हावी हो जाती हैं।” हालिया वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए कि किस प्रकार नीतिगत हस्तक्षेपों में देरी तथा अचानक लागू की गई मितव्ययिता (Austerity) संबंधी नीतियाँ भारत की आर्थिक संवेदनशीलताओं को और अधिक बढ़ा सकती हैं।

(15 अंक, 250 शब्द)

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