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भारत में जल शासन और संरक्षण

Lokesh Pal May 13, 2026 05:00 4 0

संदर्भ:

भारत का जल संकट मुख्य रूप से एक संस्थागत और शासन-संबंधी चुनौती है, न कि प्राकृतिक आपूर्ति की कमी; क्योंकि देश में प्रतिवर्ष पर्याप्त वर्षा होती है।

प्रमुख चिंताएँ

  • शासन संबंधी विफलताएँ
    • संस्थागत अलगाव (Institutional Silos): मिहिर शाह समिति के अनुसार, केंद्रीय जल आयोग (सतही जल) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (भूजल) स्वतंत्र रूप से और आपस में कम तालमेल के साथ कार्य करते हैं।
    • कानूनी बाधाएँ: जल राज्य सूची (State List) का विषय है, और कई राज्यों में भूजल संरक्षण के लिए प्रभावी नियमन या प्रवर्तन का अभाव है।
    • जल मूल्य निर्धारण: जल की कीमत अक्सर कम या नगण्य होती है, यहाँ तक कि जल की कमी वाले क्षेत्रों में भी, जिसके कारण भुगतान करने में सक्षम लोगों द्वारा भी इसका अपव्यय होता है।
  • वर्षा का असमान वितरण: वर्षा का वितरण स्थानिक रूप से असमान है:
    • कुछ क्षेत्र जैसे चेरापूंजी अत्यधिक वर्षा प्राप्त करते हैं।
    • शुष्क क्षेत्र जैसे जैसलमेर में जल की भारी कमी रहती है।
  • बढ़ता जल संकट: नीति आयोग के अनुसार:
    • लगभग 60 करोड़ भारतीय उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं।
    • विश्व की लगभग 20% आबादी को समर्थन देने के बावजूद भारत के पास वैश्विक ताजे जल संसाधनों का केवल लगभग 4% हिस्सा है।

फाल्कनमार्क संकेतक (Falkenmark Indicator) के अनुसार जिन देशों में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1700 घन मीटर से कम होती है, उन्हें जल-संकटग्रस्त (water-stressed) माना जाता है। भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर लगभग 1400 घन मीटर हो गई है, जो गंभीर जल संकट को दर्शाती है।

भूजल संकट

  • भूजल का अत्यधिक दोहन: भारत भूजल का दोहन करने वाला विश्व का सबसे बड़ा देश है, जो वैश्विक भूजल दोहन का लगभग 25% हिस्सा है।
  • असतत (अस्थिर) कृषि पद्धतियाँ: पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य भूजल स्तर में गिरावट के बावजूद जल-प्रधान धान की खेती जारी रखते हैं।
    • 1 किलोग्राम चावल उत्पादन में लगभग 3000–5000 लीटर पानी खर्च होता है।
  • चावल के निर्यात के साथ “वर्चुअल वाटर एक्सपोर्ट (Virtual Water Export)” भी होता है।

संस्थागत चुनौतियाँ

  • खंडित शासन व्यवस्था (Fragmented Governance): जल प्रबंधन की शासन व्यवस्था अभी भी बिखरी हुई है:
    • जल शक्ति मंत्रालय जल नीतियों की देखरेख करता है।
    • केंद्रीय जल आयोग सतही जल का प्रबंधन करता है।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड भूजल को विनियमित करता है।
  • संवैधानिक आयाम: जल सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (State List) का विषय है। कई राज्यों में भूजल नियमन के लिए प्रभावी कानूनों का अभाव है या उनके कार्यान्वयन में कमी पाई जाती है।

प्रमुख सरकारी पहलें

  • जल जीवन मिशन:
    • लक्ष्य: प्रत्येक ग्रामीण परिवार को पाइप द्वारा पेयजल उपलब्ध कराना।
    • संबंधित: SDG-6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता)
  • अटल भूजल योजना: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों पर केंद्रित योजना।
    • प्रोत्साहित करता है:
      • सामुदायिक भूजल प्रबंधन
      • जल बजटिंग
      • सतत जल दोहन
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: उद्देश्य: “हर बूंद से अधिक फसल”
    • प्रोत्साहित करता है:
      • ड्रिप सिंचाई
      • स्प्रिंकलर सिंचाई
      • कृषि में जल का कुशल उपयोग
  • अटल कायाकल्प और शहरी परिवर्तन मिशन (AMRUT)
    • शहरी जल आपूर्ति और अपशिष्ट जल उपचार में सुधार करता है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम: गंगा बेसिन में प्रदूषण कम करने पर केंद्रित है।

चक्रीय वाटर इकोनॉमी (Circular Water Economy)

  • रेखीय (Linear) जल प्रबंधन मॉडल से चक्रीय (Circular) जल प्रबंधन मॉडल की ओर बदलाव: भारत को पारंपरिक “उपयोग करो और नष्ट करो” दृष्टिकोण से आगे बढ़कर एक चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए, जो जल संसाधनों के संरक्षण, उपचार, पुनर्चक्रण (Recycling) और पुन: उपयोग (Reuse) पर केंद्रित हो।
    • इस प्रकार का मॉडल अपशिष्ट जल (wastewater) को कचरे के बजाय एक मूल्यवान आर्थिक संसाधन के रूप में मानता है, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा और सततता में सुधार होता है।
  • पारंपरिक रेखीय जल मॉडल: जल को घरेलू, औद्योगिक और कृषि उद्देश्यों के लिए नदियों, झीलों और भूजल स्रोतों से निकाला जाता है।
    • उपयोग के बाद अपशिष्ट जल को पर्याप्त उपचार के बिना प्रायः नदियों या अन्य जल निकायों में छोड़ दिया जाता है।
    • इसके परिणाम:
      • जल की बर्बादी
      • जल जल स्रोतों का प्रदूषण
      • भूजल पुनर्भरण में कमी
      • पारिस्थितिकीय क्षरण
  • उभरता हुआ चक्रीय जल अर्थव्यवस्था मॉडल: जल का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता है और अपशिष्ट जल को वैज्ञानिक रूप से उपचारित कर द्वितीयक उद्देश्यों के लिए पुनः उपयोग किया जाता है।
  • उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग किया जा सकता है:
    • उद्योगों में
    • कृषि में
    • शहरी हरित क्षेत्रों एवं लैंडस्केपिंग में
    • निर्माण गतिविधियाँ
  • यह मॉडल निम्नलिखित को बढ़ावा देता है:
    • संसाधनों के कुशल उपयोग को
    • ताजे जल के दोहन में कमी को
    • सतत शहरी एवं औद्योगिक विकास को

उदाहरण: Surat मॉडल

सूरत अपशिष्ट जल पुनः उपयोग पहल

  • नगर निगम द्वारा सीवेज उपचार संयंत्रों (Sewage Treatment Plants) के माध्यम से शहरी अपशिष्ट जल का उपचार किया जाता है।
  • उपचारित जल को ताजे जल के स्थान पर वस्त्र उद्योगों को उपलब्ध कराया जाता है।
  • यह मॉडल:
    • ताजे जल संसाधनों पर दबाव कम करता है।
    • शहरी स्थानीय निकायों के लिए राजस्व उत्पन्न करता है।
    • उद्योगों में जल के सतत उपयोग को बढ़ावा देता है।

आगे की राह 

  • एकीकृत जल शासन (Integrated Water Governance): सतही जल और भूजल का प्रबंधन एकीकृत संस्थागत ढाँचे के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग संस्थाओं द्वारा जो अलग-अलग (silos में) कार्य करती हैं।
    • वैज्ञानिक और कुशल जल प्रबंधन के लिए केंद्रीय, राज्य और स्थानीय संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
  • वैज्ञानिक और तर्कसंगत जल मूल्य निर्धारण: जल की कीमत को उसकी कमी (scarcity) को दर्शाना चाहिए और विशेषकर जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में संरक्षण को प्रोत्साहित करना चाहिए।
    • लक्षित सब्सिडी के माध्यम से कमजोर वर्गों की सुरक्षा की जा सकती है, जबकि उच्च आय वर्ग एवं उद्योगों द्वारा अत्यधिक और अपव्ययी उपयोग को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • सतत फसल विविधीकरण: सूखा-प्रवण एवं भूजल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी अधिक जल-आवश्यक फसलों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
    • किसानों को निम्नलिखित फसलों के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए:
      • मोटा अनाज (Millets)
      • दलहन
      • तिलहन
      • जलवायु-अनुकूल फसलें
  • अपशिष्ट जल उपचार और पुनर्चक्रण का विस्तार: शहरी स्थानीय निकायों को सीवेज उपचार के बुनियादी ढाँचे का विस्तार करना चाहिए और उपचारित अपशिष्ट जल के बड़े पैमाने पर पुन: उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
    • उद्योगों, आवासीय सोसाइटियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • शहरी–ग्रामीण एकीकृत जल योजना: शहरों और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को एकीकृत जल योजना अपनानी चाहिए, जिसमें शामिल हों:
    • जल आपूर्ति प्रबंधन
    • अपशिष्ट जल उपचार
    • भूजल पुनर्भरण प्रणाली
    • पुनः उपयोग नेटवर्क
  • जल प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों, पंचायतों, जल उपयोगकर्ता संघों और स्वयं सहायता समूहों को जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए।
    • सामुदायिक आधारित उपाय जैसे:
      • जल बजटिंग
      • वर्षा जल संचयन
      • जलभृत प्रबंधन दीर्घकालिक स्थिरता में उल्लेखनीय सुधार कर सकता है।

निष्कर्ष

  • भारत का जल भविष्य प्रतिक्रियात्मक प्रबंधन से आगे बढ़कर एक सक्रिय, डेटा-आधारित शासन मॉडल अपनाने पर निर्भर करता है।
  • “संस्थागत चुनौती” का समाधान करने के लिए विभागों के बीच मौजूद अलगाव (silos) को समाप्त करना, जल मूल्य निर्धारण को तर्कसंगत बनाकर अपव्यय को रोकना तथा एक चक्रीय अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें अपशिष्ट जल को कचरे के बजाय एक मूल्यवान संसाधन के रूप में देखा जाए।
  • केवल सामुदायिक भागीदारी और सतत कृषि परिवर्तन के माध्यम से ही भारत आने वाली पीढ़ियों के लिए “अंतर-पीढ़ीगत समानता” सुनिश्चित कर सकता है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “भारत का जल संकट जलविज्ञान (Hydrological) से अधिक एक संस्थागत चुनौती है”। भारत की वर्त्तमान जल शासन व्यवस्था के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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