प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत में V-2-V तकनीक के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- इसे एकीकृत करने के लिए चरणबद्ध रोडमैप सुझाइए।
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उत्तर

‘व्हीकल-टू-व्हीकल’ (V-2-V) संचार एक ऐसी तकनीक है, जो वाहनों को गति, स्थान और आवागमन से संबंधित वास्तविक समय के डेटा का आदान-प्रदान करने में सक्षम बनाती है, जिससे सड़क सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है। हालाँकि, भारत में इसका प्रभावी क्रियान्वयन कई चुनौतियों से बाधित है, जो इसके बड़े पैमाने पर संचालन को सीमित करती हैं।
भारत में V-2-V तकनीक के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ
- स्केल का ‘चिकन-एंड-एग’ समस्या: V-2-V के लाभ व्यापक अपनाने पर निर्भर करते हैं, लेकिन शुरुआती उपयोगकर्ताओं को उच्च लागत उठानी पड़ती है, जबकि सीमित उपयोगिता मिलती है, क्योंकि कम जुड़े वाहन नेटवर्क की प्रभावशीलता को घटाते हैं।
- मानकीकरण और अंतःसंचालनीयता की कमी: भारत में अभी तक संचार मानक (DSRC बनाम C-V2X) को अंतिम रूप नहीं दिया गया है, जिससे अनिश्चितता बनी हुई है और एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में बाधा आती है।
- उच्च अनुपालन और लागत का बोझ: वाहन मालिक पहले से ही ट्रैकिंग उपकरणों और पंजीकरण प्रणालियों पर खर्च वहन करते हैं; V-2-V हार्डवेयर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डालता है, विशेषकर तब जब पर्याप्त सब्सिडी या विक्रेताओं के मध्य प्रतिस्पर्द्धा नहीं है।
- कमजोर अवसंरचना और पारिस्थितिकी तंत्र की तैयारी: खराब सड़क डिजाइन, मिश्रित यातायात (दोपहिया, पैदल यात्री) और V2I प्रणालियों की अनुपस्थिति V-2-V जैसी उन्नत तकनीकों की प्रभावशीलता को सीमित करती है।
- उदाहरण: भारत में हर वर्ष 1.7 लाख से अधिक सड़क दुर्घटना में मृत्यु होती है (MoRTH 2022), जिसका प्रमुख कारण खराब सड़क डिजाइन और मिश्रित यातायात है।
एकीकरण के लिए चरणबद्ध रोडमैप
- चरण 1
- आधारभूत मानकीकरण और पायलट परीक्षण: संचार प्रोटोकॉल (DSRC/C-V2X) को अंतिम रूप देना और राजमार्गों तथा चुनिंदा स्मार्ट शहरों जैसे नियंत्रित वातावरण में पायलट परियोजनाओं का कार्यान्वयन करना।
- चरण 2
- अवसंरचना विकास और क्षमता निर्माण: V2I अवसंरचना (स्मार्ट सिग्नल, टोल प्रणालियाँ) का विकास करना, बैकएंड डेटा प्रणालियों में निवेश करना तथा चालकों एवं प्रवर्तन एजेंसियों को प्रशिक्षित करना।
- चरण 3
- प्रोत्साहन आधारित अंगीकरण एवं सब्सिडी: लागत बोझ कम करने और प्रारंभिक अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिए सब्सिडी तथा कर प्रोत्साहन प्रदान करना तथा प्रतिस्पर्द्धी विक्रेता बाजार को बढ़ावा देना।
- चरण 4
- क्रमिक अनिवार्यता और पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार: नए वाहनों, विशेषकर वाणिज्यिक बेड़ों के लिए चरणबद्ध अनिवार्यता लागू करना, ताकि नेटवर्क का विस्तार हो सके और शहरी तथा अंतर-शहरी गलियारों तक कवरेज बढ़े।
- चरण 5
- सुरक्षा और विनियमन को सुदृढ़ करना: सुरक्षित और विश्वसनीय संचालन सुनिश्चित करने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढाँचा, डेटा संरक्षण मानदंड और यातायात शासन सुधार स्थापित करना।
निष्कर्ष
V-2-V तकनीक सड़क सुरक्षा को बेहतर बना सकती है, लेकिन भारत में इसकी सफलता क्रमिक अपनाने, बेहतर अवसंरचना और चालकों की तैयारी पर निर्भर करती है। जमीनी वास्तविकताओं के अनुरूप एक चरणबद्ध और व्यावहारिक दृष्टिकोण भविष्य में एक विश्वसनीय और प्रभावी कनेक्टेड मोबिलिटी प्रणाली के निर्माण में सहायक हो सकता है।