प्रश्न की मुख्य माँग
- चीन की चयनात्मक संशोधनवादी शक्ति के रूप में विशेषताएँ
- भारत के समक्ष चुनौतियाँ
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
चीन का उदय चयनात्मक संशोधनवाद का एक जटिल रूप प्रस्तुत करता है, क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा रहते हुए वैश्विक शासन की मानक संरचना को पुनः आकार देने का प्रयास करता है। चीन एक ओर संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे पारंपरिक बहुपक्षीय संस्थानों के भीतर कार्य करता है, वहीं दूसरी ओर वह एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे चीन-नेतृत्व वाले संस्थानों को बढ़ावा देकर वैश्विक प्रभाव को अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है। इसके साथ ही, वह लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता जैसे सिद्धांतों को अपने अधिनायकवादी मॉडल के अनुरूप पुनर्परिभाषित करने का प्रणालीगत प्रयास करता है।
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चीन एक चयनात्मक संशोधनवादी शक्ति के रूप में
- संस्थागत सहभागिता बिना व्यवस्था परिवर्तन: चीन प्रमुख वैश्विक संस्थाओं में भागीदारी करता है और उन्हें वित्तीय समर्थन भी देता है, साथ ही समानांतर संस्थाएँ भी बनाता है।
- उदाहरण: वर्ष 2000 में UN बजट में 1% से कम योगदान से बढ़कर वर्ष 2025 में 20% से अधिक योगदान, साथ ही एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) और न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं का निर्माण।
- चयनात्मक अनुपालन: चीन संप्रभुता के मानकों को अपने हितों के अनुसार लागू करता है और प्रतिकूल कानूनी निर्णयों को अस्वीकार करता है।
- उदाहरण: वर्ष 2016 के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के दक्षिण चीन सागर संबंधी निर्णय को बीजिंग द्वारा “शून्य और अमान्य” घोषित किया गया।
- बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से प्रभाव विस्तार: चीन बिना मौजूदा वैश्विक संस्थाओं को सीधे अस्वीकार किए बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों का उपयोग अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप क्षेत्रीय मानदंडों को आकार देने तथा प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है।
भारत के समक्ष चुनौतियाँ
- लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों की पुनर्परिभाषा: वैधता को राजनीतिक भागीदारी या जवाबदेही के बजाय केवल भौतिक विकास के आधार पर परिभाषित किया जाता है।
- उदाहरण: वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI) “अविभाज्य सुरक्षा (Indivisible Security)” की अवधारणा का उपयोग करके पश्चिमी सुरक्षा साझेदारियों (जैसे क्वाड) को अवैध ठहराने का प्रयास करती है, जिससे भारत के इंडो-पैसिफिक बहुपक्षीय ढाँचों को अलग-थलग करने का प्रयास होता है।
- सभ्यतागत एवं शासन संबंधी पुनर्व्याख्या: सांस्कृतिक सापेक्षता पर आधारित मूल्यों को बढ़ावा देकर अधिनायकवादी शासन को अंतरराष्ट्रीय आलोचना से सुरक्षित किया जाता है।
- उदाहरण: वैश्विक सभ्यता पहल (Global Civilization Initiative) मानवाधिकारों को सार्वभौमिक न मानकर संदर्भ-आधारित के रूप में प्रस्तुत करती है।
- संप्रभुता की रणनीतिक पुनर्व्याख्या: चीन अपने हितों के अनुसार, संप्रभुता का चयनात्मक समर्थन करता है, जिससे उदार अंतरराष्ट्रीय मानदंड कमजोर होते हैं।
- उदाहरण: यूक्रेन संकट तथा क्षेत्रीय सुरक्षा पहलों पर चीन का रुख “सर्वभौम समानता” को चयनात्मक रूप से परिभाषित करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है।
- भारत के लिए रणनीतिक प्रभाव: यह प्रवृत्ति क्षेत्रीय विवादों में भारत के लोकतांत्रिक मॉडल एवं संप्रभुता दोनों को चुनौती देती है।
- उदाहरण: भारत-भूटान सीमा तनाव तथा बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से क्षेत्रीय प्रभाव विस्तार।
आगे की राह
- रणनीतिक साझेदारियाँ: समान विचारधारा वाले लोकतांत्रिक देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों को सुदृढ़ कर चीन के मानक-निर्धारण प्रभाव का संतुलन किया जाए।
- बहुपक्षीय सहभागिता: क्षेत्रीय एवं वैश्विक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी बढ़ाकर उदार लोकतांत्रिक मानदंडों का संरक्षण किया जाए।
- क्षमताओं में निवेश: डिजिटल, आर्थिक एवं सैन्य क्षमताओं में निवेश कर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत किया जाए।
- क्षेत्रीय कनेक्टिविटी: क्षेत्रीय कनेक्टिविटी एवं प्रभाव को बढ़ाकर चीन-प्रेरित पहलों पर निर्भरता को कम किया जाए।
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निष्कर्ष
चीन का चयनात्मक संशोधनवादी शक्ति के रूप में उदय भारत के लिए मानकगत एवं रणनीतिक दोनों प्रकार की चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। ऐसे परिदृश्य में भारत को संस्थागत सहभागिता, क्षमताओं का सुदृढ़ीकरण तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की सक्रिय अभिव्यक्ति का संतुलित संयोजन अपनाना होगा, जिससे वह अपने लोकतांत्रिक आदर्शों की रक्षा करते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित कर सके।