प्रश्न की मुख्य माँग
- आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति और भारत की रक्षा आवश्यकताएँ।
- भारत की रक्षा खरीद और विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में बाधाएँ।
- रणनीतिक तत्परता के लिए एक हाइब्रिड रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता।
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उत्तर
वैश्विक संघर्षों की बदलती प्रकृति, विशेष रूप से मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) के व्यापक उपयोग से यह स्पष्ट होता है कि भविष्य के युद्ध गति, पैमाने और आत्मनिर्भरता पर निर्भर करेंगे। रणनीतिक तैयारी और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को रक्षा विनिर्माण में सुधार करना होगा।
आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति और भारत की रक्षा आवश्यकताएँ
- ड्रोन युद्ध: कम लागत वाले ड्रोन अब युद्धक्षेत्र में भारी तबाही मचा रहे हैं, जिससे महँगे पारंपरिक सैन्य प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता कम हो रही है।
- उदाहरण: ईरान की जवाबी कार्रवाई के दौरान GCC देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों में से 71% ड्रोन द्वारा किए गए थे।
- लागत दक्षता: किफायती ड्रोन और मिसाइलें महँगे विमानवाहक पोतों और लड़ाकू विमानों की तुलना में रणनीतिक लाभ प्रदान करते हैं।
- उदाहरण: यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया कि सस्ते ड्रोन ने महत्त्वपूर्ण सैन्य बुनियादी ढाँचे को प्रभावी ढंग से नुकसान पहुँचाया।
- आपूर्ति सुरक्षा: विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और रणनीतिक अनिश्चितता के कारण युद्ध के दौरान जोखिम उत्पन्न करती है।
- तकनीकी तैयारी: भविष्य के संघर्षों के लिए भारत को स्वायत्त प्रणालियों, उन्नत वायु रक्षा और उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकियों में निवेश करना चाहिए।
- उदाहरण: भारत के रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने युद्ध में भारत की तकनीकी प्रगति को सिद्ध किया।
- स्वदेशी क्षमता: रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जेट इंजन और परिष्कृत ड्रोन जैसे महत्त्वपूर्ण प्रणालियों का घरेलू उत्पादन आवश्यक है।
भारत के रक्षा खरीद और विनिर्माण तंत्र में बाधाएँ
- आयात पर निर्भरता: घरेलू तकनीकी क्षमताओं की कमजोरी और बजट की सीमाओं के कारण भारत शीर्ष हथियार आयातकों में से एक बना हुआ है।
- उदाहरण: भारत रूस, अमेरिका, इजरायल और पूर्व में सोवियत संघ से आयात करता है।
- केंद्रीकृत प्रक्रिया: रक्षा अधिग्रहण अत्यधिक केंद्रीकृत है, जिसमें कई अनुमोदन स्तर हैं, जिसके कारण खरीद में लंबा विलंब होता है।
- उदाहरण: खरीद की शुरुआत मात्रात्मक आवश्यकताओं (QR) से होती है, जिसके बाद कई आधिकारिक अनुमोदन चरण होते हैं।
- विलंब का बोझ: विभिन्न परियोजनाएँ अक्सर निर्धारित समय सीमा से कई वर्ष आगे निकल जाती हैं, जिससे सैन्य तत्परता और आधुनिकीकरण योजनाओं पर असर पड़ता है।
- प्रतिभा की कमी: सरकारी संस्थानों को कम वेतनमान संरचनाओं के कारण शीर्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को आकर्षित करने में कठिनाई होती है।
रणनीतिक तत्परता के लिए एक हाइब्रिड रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता
- निजी क्षेत्र की भूमिका: निजी कंपनियाँ पारंपरिक DPSU के वर्चस्व (कुल रक्षा उत्पादन का 70% से अधिक) से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन में गति, नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा में सुधार कर सकती हैं।
- रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल: रणनीतिक साझेदारी मॉडल भारतीय निजी कंपनियों को उन्नत प्लेटफॉर्म के उत्पादन के लिए विदेशी OEMs (मूल उपकरण निर्माताओं) से जोड़ता है।
- FDI सुधार: FDI की सीमाएँ बढ़ाने से वैश्विक रक्षा निर्माताओं के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त उद्यमों में सुधार होता है।
- उदाहरण: वर्ष 2020 में ‘ऑटोमैटिक रूट’ के तहत रक्षा क्षेत्र में FDI की सीमा बढ़ाकर 74% कर दी गई।
- समान अवसर: वास्तविक प्रतिस्पर्द्धा के लिए निजी कंपनियों को खरीद, भुगतान और प्रतिनिधित्व के मामलों में समान व्यवहार मिलना चाहिए।
- उदाहरण: DPSU को तरजीही व्यवहार देना और निजी कंपनियों को भुगतान में देरी करना।
- रणनीतिक खरीदार: सरकार को एक रणनीतिक खरीदार की भूमिका निभानी चाहिए, जबकि सार्वजनिक और निजी, दोनों तरह की कंपनियाँ निष्पक्ष रूप से प्रतिस्पर्द्धा और सहयोग करें।
निष्कर्ष
भारत को सार्वजनिक और निजी रक्षा उत्पादन के मध्य किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि दोनों के बीच एक प्रभावी साझेदारी की जरूरत है। नवाचार, गति और रणनीतिक स्वायत्तता वाला एक हाइब्रिड इकोसिस्टम ही भारत की भविष्य की सुरक्षा संरचना को परिभाषित करेगा।