प्रश्न की मुख्य माँग
- पैदल यात्रियों के अधिकारों को संवैधानिक मान्यता तथा उसका औचित्य।
- इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक सीमाएँ।
- मानव-केंद्रित शहरी नियोजन और सतत् प्रवर्तन हेतु उपाय।
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उत्तर
परिचय
सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, जिसमें पैदल यात्रियों के लिए निर्धारित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को अनुच्छेद-21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा माना गया है, मोटर चालित शहरी परिवेश में इस अधिकार के विस्तार का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। हालाँकि, मजबूत पैदल अवसंरचना और सामाजिक जागरूकता के अभाव में केवल कानूनी मान्यता सुरक्षित और सुलभ पैदल-योग्य शहरों में परिवर्तित नहीं हो सकती।
संवैधानिक मान्यता और औचित्य
- जीवन और गरिमा का अधिकार: फुटपाथ सुरक्षित आवागमन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, विशेषकर बच्चों, वृद्धों तथा दिव्यांग नागरिकों के लिए।
- उदाहरण: कर्नाटक में एक पाँच वर्षीय बालक की टैंकर दुर्घटना में मृत्यु का मामला पैदल यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर जोखिमों को उजागर करता है।
- न्यायपालिका की संवैधानिक प्रेरणा: न्यायपालिका कानूनी मान्यता के माध्यम से राज्य की नीतियों और शहरी नियोजन की प्राथमिकताओं को प्रभावित करने का प्रयास करती है। यह नागरिकों के सार्वजनिक स्थानों पर अधिकार को मोटर चालित खतरों और अतिक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में सुदृढ़ करता है।
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कार्यान्वयन चुनौतियाँ एवं सांस्कृतिक सीमाएँ
- विखंडित नियामकीय ढाँचा: पैदल यात्री अवसंरचना की जिम्मेदारी नगरपालिकीय कानूनों, नगर नियोजन अधिनियमों तथा सड़क डिजाइन दिशा-निर्देशों के बीच विभाजित होती है। अधिकांश शहरों में निरंतर एवं अवरोधरहित फुटपाथों का अभाव है; विक्रेताओं द्वारा अतिक्रमण, अवैध पार्किंग तथा निर्माण मलबे जैसी समस्याएँ सामान्य हैं।
- सांस्कृतिक एवं प्रवर्तन अंतराल: केवल कानूनी मान्यता से सार्वजनिक व्यवहार स्वतः परिवर्तित नहीं होता है।
- उदाहरण: स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, 2014 विक्रेताओं के अधिकारों की रक्षा करता है, फिर भी कमजोर सर्वेक्षण एवं जोनिंग कार्यान्वयन के कारण नगरपालिकाएँ अक्सर बेदखली अभियान चलाती हैं।
- जेंट्रीफिकेशन का जोखिम: अत्यधिक कठोर प्रवर्तन से अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों का अपराधीकरण हो सकता है, जबकि पहुँच-सुविधा की बजाय केवल सौंदर्यात्मक पहलुओं को प्राथमिकता दी जा सकती है।
आगे की राह: मानव-केंद्रित शहरी नियोजन
- अवसंरचना निवेश: निरंतर, सुलभ एवं सुचारु रूप से रखरखाव किए गए फुटपाथों का निर्माण किया जाए।
- उदाहरण: स्थानीय निधि आवंटन में सड़क साफ़-सफाई या अस्थायी उपायों की बजाय पैदल यात्री क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- व्यवहारिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन: सड़क सुरक्षा और पैदल यात्रियों के अधिकारों को नागरिक शिक्षा में शामिल किया जाए।
- उदाहरण: स्वच्छ भारत अभियान की तरह प्रवर्तन और जागरूकता को जोड़ने वाले अभियान ने कचरा प्रबंधन में सुधार किया; इसी मॉडल से पैदल चलने की संस्कृति को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
- समावेशी शहरी शासन: फुटपाथ नियोजन में अनौपचारिक विक्रेताओं और शहरी गरीबों की आवश्यकताओं को शामिल किया जाए।
- उदाहरण: पुणे के पैदल-क्षेत्रीकरण पायलट प्रोजेक्ट्स में नागरिकों, विक्रेताओं और शहरी नियोजकों की भागीदारी से सुलभ और समावेशी सड़कें विकसित की गईं।
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निष्कर्ष
यद्यपि पैदल चलने के अधिकार की संवैधानिक मान्यता एक महत्त्वपूर्ण कदम है, इसकी सफलता फुटपाथ अवसंरचना, सामाजिक जागरूकता और सहभागी शहरी नियोजन पर निर्भर करती है। केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं; भारत में चलने योग्य शहरों को वास्तविकता बनाने के लिए मानव-केंद्रित शासन और सांस्कृतिक परिवर्तन अनिवार्य हैं।