प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक और नौकरशाही संबंधी बाधाएँ
- नीति आयोग की ‘रोप’ (ROPE) रणनीति का मूल्यांकन।
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उत्तर
परिचय
एक अंतरराष्ट्रीय नवाचार हब के रूप में स्थापित होने की भारत की आकांक्षा के मार्ग में बुनियादी वित्तपोषण की कमी, विखंडित संस्थागत संरचना तथा नीतिगत एवं विधिक जटिलताएँ प्रमुख गतिरोधक सिद्ध हो रही हैं। इसे स्वीकार करते हुए, नीति आयोग की ‘रोप’ (ROPE) रणनीति अनुसंधान वित्तपोषण (Funding), शासन (Governance), प्रतिभा प्रतिधारण (Talent Retention) और नवाचार के परिणामों में सुधार के लिए संरचनात्मक सुधारों का प्रस्ताव करती है।
भारत के अनुसंधान एवं विकास (R&D) पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक और नौकरशाही संबंधी बाधाएँ
- न्यून वित्तपोषण: भारत का अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मात्र 0.6% से 0.7% के आस-पास स्थिर है, जो चीन (2.6%) और दक्षिण कोरिया (5.3%) से बहुत पीछे है, जिससे हमारी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सीमित होती है।
- उदाहरण: नीति आयोग ने आगामी पाँच वर्षों के भीतर GERD को जीडीपी के 2% तक बढ़ाने की सिफारिश की थी।
- विषम आवंटन: अनुसंधान एवं विकास निधियों (Funds) का संकेंद्रण केवल शीर्ष या विशिष्ट संस्थानों तक सीमित है, जिससे राज्य विश्वविद्यालयों और क्षेत्रीय संस्थानों के लिए अवसर कम हो जाते हैं।
- उदाहरण: व्यापक संस्थानों का समर्थन करने के विधिक शासनादेश के बावजूद, राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन—’अनुसंधान’ (ANRF) के वित्तपोषण का लगभग 80% हिस्सा कथित तौर पर केवल IITs को हस्तांतरित होता है।
- अनुदान में विलंब : धीमी अनुमोदन प्रक्रिया और निधियों के विलंबित संवितरण के कारण अनुसंधान की निरंतरता बाधित होती है और शोधकर्ता हतोत्साहित होते हैं।
- उदाहरण: अनुदान अक्सर अनुमोदन के 3-6 महीने बाद जारी किए जाते हैं, जबकि छात्रवृत्ति को भी बार-बार भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है।
- प्रतिभा का संकट: अपर्याप्त प्रोत्साहन, पोस्ट-डॉक्टरल अवसरों की कमी और शिक्षण कार्य का अत्यधिक भार , अनुसंधान मानव संसाधन को कमजोर करते हैं।
- उदाहरण: भारत में प्रति दस लाख आबादी पर केवल 262 शोधकर्ता हैं, जबकि चीन में यह संख्या 1,585 शोधकर्ता प्रति दस लाख है।
- संस्थागत दोहराव: विभिन्न सरकारी विभागों के मध्य संस्थागत समन्वय के अभाव में एक ही प्रकृति की परियोजनाओं का समानांतर वित्तपोषण होता है, जिससे नीतिगत विखंडन और राजकोषीय संसाधनों का अपव्यय बढ़ता है।
- उदाहरण: उदाहरणस्वरूप, ‘हाइड्रोजन ऊर्जा’ तथा ‘कार्बन कैप्चर’ जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) जैसी शीर्ष संस्थाओं के मध्य अतिव्यापी (Overlapping) अनुसंधान देखे गए हैं, जो अंतर-विभागीय समन्वय की कमी को दर्शाते हैं।
नीति आयोग की ‘रोप’ (ROPE) रणनीति का मूल्यांकन
- वित्तपोषण को प्रोत्साहन : ‘रोप’ (ROPE) रणनीति अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय के बड़े विस्तार और राजकोषीय प्रोत्साहनों के माध्यम से निजी क्षेत्र की मजबूत भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
- उदाहरण: इसकी सिफारिशों में अनुसंधान पर सकल व्यय (GERD) को जीडीपी के 2% तक बढ़ाना और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) आधारित अनुसंधान एवं विकास (R&D), सहायता के लिए 125% कर कटौती की अनुमति देना शामिल है।
- प्रक्रियात्मक सुधार: इस रणनीति का उद्देश्य समयबद्ध अनुमोदनों और सरलीकृत खरीद मानदंडों के माध्यम से प्रक्रियात्मक देरी को कम करना है।
- उदाहरण: नीति आयोग ने अनुसंधान प्रस्तावों की स्वीकृति के लिए 6 माह की समय-सीमा तय करने और खरीद प्रक्रियाओं को आसान बनाने का प्रस्ताव दिया है।
- कर सहायता: अनुसंधान इनपुट (सामग्रियों और उपकरणों) पर कर की दरों को कम करने से संस्थानों द्वारा निधियों के प्रभावी उपयोग में सुधार हो सकता है।
- उदाहरण: अनुसंधान एवं विकास खरीद के लिए 5% GST स्लैब को बहाल करने की सिफारिश की गई है।
- प्रतिभा प्रतिधारण: ‘रोप’ रणनीति बेहतर फेलोशिप सहायता और प्रतिधारण तंत्र के माध्यम से वैज्ञानिक मानव संसाधन को उन्नत करने पर ध्यान केंद्रित करती है।
- उदाहरण: प्रस्तावित “विज्ञान निधि” रूपरेखा और पोस्ट-डॉक्टरल फेलोशिप में वार्षिक 20% की वृद्धि का उद्देश्य प्रतिभा पलायन को रोकना है।
- गंभीर चिंताएँ : इन महत्त्वाकांक्षी सुधारों के बावजूद, कार्यान्वयन की चुनौतियाँ, संस्थागत पूर्वाग्रह (जैसे विशिष्ट संस्थानों को प्राथमिकता देना) और सरकारी वित्तपोषण पर अत्यधिक निर्भरता की समस्याएँ भविष्य में भी बनी रह सकती हैं।
निष्कर्ष
भारत की तकनीकी आकांक्षाओं के लिए न केवल उच्च अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय की आवश्यकता है, बल्कि दक्षता, समावेशिता और नवाचार-प्रेरित परिणामों को सुनिश्चित करने वाले गहरे संस्थागत सुधारों की भी आवश्यकता है। यदि पूरी निष्ठा से इसे लागू किया जाए, तो ‘रोप’ (ROPE) रणनीति भारत के विखंडित, अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी और नवाचार-संचालित ढाँचे में परिवर्तित कर सकती है।