प्रश्न की मुख्य माँग
- जन स्वास्थ्य पर प्रभाव
- सुरक्षित पेयजल के लिए आवश्यक उपाय
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उत्तर
जन स्वास्थ्य का एक सूचक गरीब वर्गों का कल्याण है। हालाँकि, देश के “सबसे स्वच्छ शहर” इंदौर में नगरपालिका द्वारा आपूर्ति किए गए दूषित पेयजल से कम-से-कम चार लोगों की हाल ही में हुई मौतें जल प्रबंधन की मौजूदा चुनौतियों को उजागर करती हैं और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में शहरी पाइपलाइन जल अवसंरचना की कमजोरियों को दर्शाती हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव
- जलजनित रोगों का प्रकोप: संदूषण के कारण तीव्र दस्त, हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों में तेजी से वृद्धि होती है, जो बच्चों और बुजुर्गों को असमान रूप से प्रभावित करती हैं।
- भारी आर्थिक बोझ: इन बीमारियों के प्रकोप से कम आय वाले परिवारों पर उपचार खर्च और बीमारी के कारण दैनिक मजदूरी के नुकसान के रूप में भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।
- उदाहरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि भारत में सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता से लगभग 4 लाख डायरिया से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।
- जनता के भरोसे में गिरावट: इंदौर जैसे आदर्श शहर में हुई घटनाएँ नगर निगम सेवाओं पर नागरिकों के भरोसे को हिला देती हैं, जिससे दहशत फैलती है और लोग अनियंत्रित निजी टैंकरों पर निर्भर हो जाते हैं।
- बुनियादी ढाँचे पर दबाव: ऐसी त्रासदियाँ पुरानी पाइपलाइनों के “मूक संकट” और पेयजल नेटवर्क के खतरनाक रूप से निकट स्थित सीवेज लाइनों की स्थिति को उजागर करती हैं।
- उदाहरण: इंदौर में प्रारंभिक जाँच में पता चला कि शौचालय के गड्ढे से सीवेज रिसकर मुख्य आपूर्ति लाइन में जा रहा था।
- मृत्यु और रुग्णता: गंभीर प्रदूषण के कारण रोकी जा सकने वाली जानमाल की हानि होती है और बच्चों में कुपोषण और बौनापन जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- संस्थागत लापरवाही: बार-बार होने वाली घटनाएँ वास्तविक समय में जल गुणवत्ता निगरानी में विफलता और स्थानीय शिकायतों पर विलंबित प्रतिक्रिया की ओर इशारा करती हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पाया कि निवासियों ने कार्रवाई किए जाने से पहले कई दिनों तक दुर्गंधयुक्त पानी की शिकायत की थी।
सुरक्षित पेयजल के लिए आवश्यक उपाय
- वास्तविक समय में गुणवत्ता निगरानी: PH, क्लोरीन और मैलापन के स्तर में होने वाले परिवर्तनों का तुरंत पता लगाने के लिए वितरण केंद्रों पर IOT-आधारित सेंसर लगाना।
- उदाहरण: “सुजलम् भारत के लिए विजन” शिखर सम्मेलन 2025 में रिसाव का पता लगाने और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए AI-संचालित निगरानी पर जोर दिया गया।
- मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs): सीवेज नेटवर्क से सुरक्षित भौतिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए जल पाइपलाइन बिछाने के लिए अनिवार्य राष्ट्रीय दिशा-निर्देश स्थापित करना।
- नियमित पाइपलाइन ऑडिट: शहरी वितरण नेटवर्क की आवधिक “स्वास्थ्य जाँच” करना ताकि रिसाव का पता लगाया जा सके और उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में म्रिश्रित संदूषण को रोका जा सके।
- प्रयोगशाला नेटवर्क का विस्तार: सूक्ष्मजीव परीक्षण की आवृत्ति बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना कि सामुदायिक स्तर पर लिए गए नमूनों के लिए जल परीक्षण प्रयोगशालाएँ सुलभ हों।
- उदाहरण: वर्ष 2025-26 में, भारत भर में 2,843 से अधिक प्रयोगशालाओं ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत लगभग 38.78 लाख नमूनों का परीक्षण किया।
- विकेंद्रीकृत जल उपचार: झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों में सामुदायिक स्तर के जल शोधन संयंत्र और “वाटर एटीएम” स्थापित करना ताकि सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत प्रदान की जा सके।
- उदाहरण: अमृत 2.0 योजना सतत् उपचार और वितरण के माध्यम से 100% जल सुरक्षित शहरों को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
- सामुदायिक सतर्कता प्रशिक्षण: स्थानीय निवासियों, विशेष रूप से महिला समूहों को, प्रारंभिक जल जाँच के लिए फील्ड टेस्टिंग किट (FTK) का उपयोग करने के लिए सशक्त बनाना।
निष्कर्ष
इंदौर त्रासदी यह सिद्ध करती है कि ‘स्वच्छता’ का दायरा केवल सड़कों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पानी और अपशिष्ट के अदृश्य भूमिगत तंत्रों तक भी फैला होना चाहिए। सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने के लिए तात्कालिक उपायों से हटकर सक्रिय, डेटा-आधारित प्रबंधन की ओर बढ़ना आवश्यक है। जल-स्वच्छता-स्वास्थ्य (WASH) के आपसी संबंध को प्राथमिकता देकर और नगर निगम की लापरवाही के लिए कड़ी जवाबदेही तय करके, भारत सभी नागरिकों के जीवन तथा स्वास्थ्य के अधिकार के प्रति अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा कर सकता है।
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