प्रश्न की मुख्य माँग
- विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जिला-स्तरीय आर्थिक विकास मापन की आवश्यकता।
- भारत की पारंपरिक ‘टॉप-डाउन’ GDP/GSDP मापन प्रणाली की ऐतिहासिक सीमाएँ।
- योजना निर्माण एवं सुशासन के लिए विकेंद्रीकृत तथा सूक्ष्म आर्थिक आँकड़ों का महत्त्व।
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उत्तर
परिचय
भारत की आर्थिक मापन प्रणाली ऐतिहासिक रूप से ‘टॉप-डाउन’ समेकन दृष्टिकोण पर आधारित रही है, जिसमें राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय GDP/GSDP अनुमान योजना निर्माण का प्रमुख आधार रहे हैं। हाल के नीतिगत विमर्शों, विशेषकर नीति आयोग द्वारा जिला-स्तरीय GDP आकलन को प्रोत्साहन देने की पहल, ने सूक्ष्म एवं विकेंद्रीकृत आर्थिक शासन की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को रेखांकित किया है, जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
विकसित भारत 2047 हेतु जिला-स्तरीय आर्थिक मापन की आवश्यकता
- आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक इकाई के रूप में जिले: जिले वे स्तर हैं, जहाँ उत्पादन, ऋण प्रवाह, उद्योगों का प्रवेश एवं निकास तथा श्रमिकों का प्रवासन जैसी आर्थिक गतिविधियाँ घटित होती हैं। विकास के वास्तविक परिणाम राष्ट्रीय औसत के बजाय जिला स्तर पर अधिक स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।
- विकास के वितरण में क्षेत्रीय असंतुलन: भारत के शीर्ष 100 जिले राष्ट्रीय उत्पादन में लगभग 40% का योगदान देते हैं, जबकि निचले 400 जिलों का योगदान 15% से भी कम है। यह समग्र GDP आँकड़ों के पीछे विद्यमान गहरी क्षेत्रीय विषमताओं को दर्शाता है।
- लक्षित विकास कार्यक्रमों का आधार: आकांक्षी जिला कार्यक्रम ने दर्शाया कि केंद्रित हस्तक्षेपों से विकास परिणामों में सुधार संभव है, किंतु इसके समक्ष सुदृढ़ आर्थिक आधाररेखा का अभाव था। जिला-स्तरीय GDP ऐसे कार्यक्रमों के लिए मापन योग्य बेंचमार्क प्रदान कर सकता है।
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भारत की टॉप-डाउन आर्थिक मापन प्रणाली की ऐतिहासिक कमियाँ
- समेकन पक्षपात एवं ‘परिस्रवण’ की धारणा: स्वतंत्रता के बाद की नियोजन प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित थी कि शीर्ष स्तर पर होने वाली आर्थिक वृद्धि स्वतः ही निचले स्तर तक पहुँच जाएगी। किंतु वास्तविकता में विकास भौगोलिक रूप से कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा, जिससे क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली सकी।
- क्षेत्रीय आर्थिक विषमताएँ: नीति आयोग के अनुसार, भारत के उच्च-आय वाले राज्यों में देश की केवल 26% जनसंख्या निवास करती है, जबकि उनका राष्ट्रीय GDP में 44% योगदान है। इसके विपरीत, निम्न-आय वाले राज्यों में 38% जनसंख्या निवास करती है, किंतु उनका GDP में योगदान मात्र 19% है।
- राज्य-केंद्रित अनुमान पद्धति: जिला-स्तरीय आर्थिक अनुमान प्रायः राज्य GDP को विभिन्न गुणांकों के आधार पर विभाजित करके तैयार किए जाते हैं, न कि प्रत्यक्ष मापन के माध्यम से। इससे पद्धतिगत त्रुटियाँ उत्पन्न होती हैं और स्थानीय नीति निर्माण की सटीकता प्रभावित होती है।
- कमज़ोर उप-राष्ट्रीय डेटा अवसंरचना: जिला स्तर पर औद्योगिक एवं क्षेत्रीय आँकड़े अक्सर बिखरे हुए, अपूर्ण तथा पुराने होते हैं।
- उदाहरण: मध्य प्रदेश में वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण, जिसमें केवल 60 इकाइयों को शामिल किया गया था, कोविड-19 के बाद संचालित हो रही 4,677 फैक्टरियों की वास्तविक स्थिति का विश्वसनीय आकलन संभव नहीं हो सका।
जिला-स्तरीय GDP मापन का महत्त्व
- परिशुद्ध शासन को सक्षम बनाना: जिला GDP स्थानीय उत्पादन क्षमताओं एवं बाधाओं की पहचान करने में सहायता करता है। इससे सभी क्षेत्रों के लिए एक समान नीति अपनाने के बजाय साक्ष्य-आधारित एवं क्षेत्र-विशिष्ट योजना निर्माण संभव हो पाता है।
- राजकोषीय संघवाद को सुदृढ़ बनाना: 15वें एवं 16वें वित्त आयोग ने जिला-स्तरीय संसाधन आवंटन को अधिक महत्त्व देने पर बल दिया है। जिला GDP लक्षित वित्तीय विकेंद्रीकरण के लिए एक ठोस विश्लेषणात्मक आधार प्रदान करता है।
- अर्थव्यवस्था को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जोड़ना; जिलों को निर्यात केंद्रों के रूप में विकसित कर वैश्विक आपूर्ति एवं मूल्य शृंखलाओं से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए जिला-स्तरीय उत्पादन क्षमताओं की सूक्ष्म समझ आवश्यक है।
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की चुनौती का समाधान: कृषि, लघु व्यापार एवं निर्माण गतिविधियाँ अधिकांश जिलों की अर्थव्यवस्था का आधार हैं, किंतु इनका पर्याप्त मापन नहीं हो पाता। इसके लिए ‘बॉटम-अप’ सांख्यिकीय सुधार तथा MoSPI एवं राज्य सांख्यिकीय प्रणालियों को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
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निष्कर्ष
जिला-स्तरीय GDP मापन समेकित आर्थिक आकलन से सूक्ष्म आर्थिक शासन की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है, जो ‘टॉप-डाउन’ मापन पद्धति की ऐतिहासिक कमियों को दूर करने में सहायक है। यह क्षेत्रीय रूप से समावेशी विकास, राजकोषीय विकेंद्रीकरण को सुदृढ़ करने तथा योजना निर्माण को भारत के विविधतापूर्ण विकास परिदृश्य की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक अनिवार्य पूर्वशर्त है।