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निबंध का प्रारूप
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संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन की एक रिपोर्ट दर्शाती है कि देश वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यह रेखांकित करती है कि सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए ये प्रयास अपर्याप्त हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पेरिस समझौते के तहत 193 पक्षों के संयुक्त जलवायु संकल्प के कारण सदी के अंत तक विश्व में लगभग 2.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि हो सकती है। यह भविष्यवाणी जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को उद्घाटित करती है, एक ऐसी घटना जिसके अपरिवर्तनीय परिणाम हो सकते हैं। इसने मानवता के समक्ष कई प्रश्न खड़े किए हैं: ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे कौन दोषी है? इसका प्रभाव किस पर पड़ेगा? क्या यह सार्वभौमिक है, राष्ट्र-विशिष्ट है या कुछ और? इत्यादि।
उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जलवायु परिवर्तन अंततः विश्व में सभी मनुष्यों को देर-सवेर प्रभावित करेगा, चाहे वे कहीं भी रहते हों । दिया गया उद्धरण इस बात को सीधे तौर पर उद्घाटित करता है। निबंध में गहराई से जाने से पहले हमें जलवायु परिवर्तन का अर्थ समझना होगा।
वैज्ञानिक दृष्टि से, जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा के स्वरूप, पवन प्रणालियों और पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के अन्य तत्वों में दीर्घकालिक परिवर्तनों को संदर्भित करता है। इस परिवर्तन के मूल में पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) जैसी ग्रीनहाउस गैसों में अप्राकृतिक वृद्धि है। ये गैसें प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव में वृद्धि करती हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग होती है, जिसके परिणामस्वरूप बाढ़, सूखा, चक्रवात और हीटवेव जैसी चरम मौसम की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
इस घटना के पीछे प्रमुख मानवजनित कारण स्पष्ट रूप से प्रमाणित हैं। इनमें से प्रमुख है ऊर्जा , परिवहन और उद्योग के लिए कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का जलाया जाना। इसके बाद वनों की कटाई होती है, जिससे न केवल कार्बन उत्सर्जित होता है, बल्कि पृथ्वी की वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित करने की क्षमता भी कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त, औद्योगीकरण, गहन कृषि पद्धतियां (जैसे धान की खेती और पशुपालन) और शहरी विस्तार उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और प्राकृतिक कार्बन और नाइट्रोजन चक्र को बाधित करते हैं।
जलवायु परिवर्तन, यद्यपि वायुमंडलीय रसायन विज्ञान में निहित है, लेकिन इसका परस्पर संबद्ध वैश्विक प्रणालियों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर और ध्रुवीय हिमखंड पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और निम्न-स्तरीय क्षेत्रों में जलमग्न होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। समुद्री तापमान में वृद्धि से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है, मानसून कमजोर होता है, तथा चक्रवाती गतिविधियां तीव्र होती हैं। इसके साथ ही, वर्षा के पैटर्न में बदलाव से कृषि, जल उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में प्रभावित होती है।
इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन अब कोई दूरस्थ खतरा नहीं, बल्कि एक वर्तमान-कालीन वैश्विक संकट है जो पारिस्थितिक तंत्रों, आर्थिक संरचनाओं और राजनीतिक सीमाओं की सहनशक्ति को परख रहा है। इसी पृष्ठभूमि में हमें इसकी सीमाहीन प्रकृति और सामूहिक परिणामों का अन्वेषण करना होगा।
जैसा कि हम जानते हैं, एक सीमाहीन घटना वह होती है जो राष्ट्रीय या अधिक उपयुक्त रूप से कहें कि राजनीतिक सीमाओं से बंधी नहीं होती। लेकिन प्रश्न यह है कि जलवायु परिवर्तन को यह शीर्षक क्यों दिया जा रहा है? इसका उत्तर इसके कारणों और प्रभावों में निहित है, जो वैश्विक स्तर पर फैले हुए हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ही जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक हैं। ये गैसें एक बार वायुमंडल में छोड़ी जाने के बाद सीमाओं के पार फैल जाती हैं। जेट स्ट्रीम, मानसूनी पवनें और महासागरीय धाराएं जैसी वायुमंडलीय घटनाएं वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव को पुनः वितरित करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप तापमान में वृद्धि, वर्षा में व्यवधान और अप्रत्याशित मौसम पैटर्न देखने को मिलते हैं, यहां तक कि उन देशों में भी जहां उत्सर्जन नगण्य है।
इसके अतिरिक्त, सौर कलंक और ज्वालामुखीय गतिविधियां जैसे ब्रह्मांडीय और ग्रहीय कारक, जो वैश्विक वायुमंडलीय प्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं, जलवायु परिवर्तन की सीमाहीन प्रकृति को भी सुदृढ़ करते हैं। उदाहरण के लिए, सौर गतिविधि में बढ़ोत्तरी, स्थान की परवाह किए बिना, सतह के तापमान में समग्र वृद्धि का कारण बन सकती है, जिससे महाद्वीपों में जलवायु परिवर्तन और अधिक तीव्र हो जाते हैं।
अब इन प्रभावों को पर्यावरणीय तथा सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में वर्गीकृत किया जा सकता है, जो जलवायु परिवर्तन की वैश्विक व्यापकता को दर्शाते हैं।
सबसे पहले, आर्कटिक और अंटार्कटिक जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ़ की परतों का पिघलना जलवायु अन्याय की एक प्रत्यक्ष याद दिलाने वाली घटना है। ये क्षेत्र वैश्विक उत्सर्जन में न्यूनतम योगदान देते हैं, लेकिन वैश्विक औसत से दोगुनी गति से गर्म हो रहे हैं। इससे न केवल ध्रुवीय जैव विविधता ख़तरे में है, बल्कि समुद्र-स्तर में वृद्धि भी हो रही है, जिससे विश्व भर के तटीय समुदाय प्रभावित हो रहे हैं।
दूसरा, अफ्रीका में, विशेषकर साहेल क्षेत्र में, मरुस्थलीकरण के कारण पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण हो रहा है तथा जैव विविधता ह्वास हो रहा है। जैसे-जैसे मरुस्थलीकृत भूमि का विस्तार होता है, प्रवासी प्रजातियाँ आवासहीन होती जाती हैं, धूल भरी आँधियाँ बढ़ती जाती हैं, और वैश्विक जैव विविधता गलियारे खंडित होते जाते हैं, जिसका प्रभाव दूर-दराज के भौगोलिक क्षेत्रों पर भी पड़ता है।
तीसरा, अमेज़न वर्षावन, जिसे प्रायः “पृथ्वी के फेफड़े” कहा जाता है, में वनोन्मूलन वैश्विक कार्बन और ऑक्सीजन चक्रों को गंभीर रूप से बाधित करती है। अमेज़न वर्षा वन उत्तरी अमेरिका और यूरोप तक मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है, और इसके क्षरण का विश्व भर में जलवायु प्रतिक्रिया लूप, कार्बन सिंक और वर्षा पर प्रभाव पड़ता है।
चौथा, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में वनाग्नि जैसी सीमा पार की आपदाएँ वायु में भारी मात्रा में कार्बन और कणीय पदार्थ छोड़ती हैं, जो सीमाओं को पार कर दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँच जाते हैं। इससे पड़ोसी देशों में वायु की गुणवत्ता कम हो जाती है तथा महासागरों में भी वायुमंडलीय पैटर्न प्रभावित हो सकता है। इसी प्रकार, हिमालय में हिमनदों के पिघलने से पांच देशों के लाखों लोगों के लिए जल सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो रहा है, जिससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियां प्रभावित हो रही हैं।
सबसे पहले, जलवायु परिवर्तन से खाद्य असुरक्षा में वृद्धि होती है। अफ्रीका में अप्रत्याशित मौसम, सूखा, एशिया में बाढ़, तथा दक्षिण अमेरिका में फसल की विफलता वैश्विक कृषि आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित करती है, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतों में तेजी आती है। उदाहरण के लिए, ब्राजील में सूखा वैश्विक कॉफी बाजार को प्रभावित करता है, जबकि भारत में बेमौसम बारिश चावल के निर्यात को प्रभावित करती है।
दूसरा, जलवायु परिवर्तन के कारण सीमा पार स्वास्थ्य जोखिम में वृद्धि हो रही है। बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न के कारण मलेरिया, डेंगू और जीका जैसी वेक्टर जनित रोगों का दायरा उन क्षेत्रों तक फैल गया है जो पहले अप्रभावित थे। ये रोग अब मानवीय गतिविधियों और बदलते पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सीमाओं के पार भी फैल सकते हैं, जिससे वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।
तीसरा, जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापन और प्रवासन एक गंभीर सीमा-पार चिंता के रूप में उभरकर सामने आए हैं। तुवालु और किरिबाती जैसे प्रशांत द्वीपीय देशों में बढ़ते समुद्र-स्तर ने पहली बार “जलवायु शरणार्थियों” को जन्म दिया है। दक्षिण एशिया में बारंबार आने वाली बाढ़ और मानसून की विफलता के कारण बड़े पैमाने पर आंतरिक और सीमापार प्रवासन हुआ है, जिससे शहरी बुनियादी ढांचे पर दबाव पड़ा है और स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं अस्थिर हुई हैं।
ये सभी दृष्टांत हिमनदों के पिघलने से लेकर सीमापार रोगों और प्रवासी दबाव तक जलवायु परिवर्तन की गहन रूप से परस्पर संबद्ध और सीमाहीन प्रकृति को उद्घाटित करते हैं। यह उन सीमाओं से परे लोगों, पारिस्थितिकी तंत्रों और अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है जहां उत्सर्जन उत्पन्न हुआ था, जिससे कोई भी देश इसके परिणामों से अछूता नहीं रह जाता।
जलवायु परिवर्तन कृषि को बाधित करता है, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचाता है, और आपदा-संबंधी नुकसानों को बढ़ाता है, जिससे सार्वजनिक वित्त और बीमा प्रणालियों पर दबाव पड़ता है। यह उत्पादकता को कम करके और महंगे अनुकूलन उपायों की दिशा में संसाधनों को मोड़कर आर्थिक विकास को धीमा करता है, विशेष रूप से विकासशील देशों में।
जलवायु परिवर्तन स्वदेशी समुदायों की पारंपरिक आजीविका को खतरे में डालता है, वेनिस और सुंदरबन जैसे विरासत स्थलों को नुकसान पहुँचाता है, और प्राकृतिक चक्रों से जुड़ी सांस्कृतिक प्रथाओं को बाधित करता है। जलवायु-प्रेरित विस्थापन के परिणामस्वरूप अक्सर सांस्कृतिक पहचान खोने का संकट झेलना पड़ता है क्योंकि विस्थापित समुदाय अपनी रीति-रिवाजों और सामाजिक एकता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं।
जलवायु परिवर्तन प्रवासन और संसाधन संघर्षों को बढ़ावा देता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता पर दबाव पड़ता है। ग्लोबल नॉर्थ और साउथ के बीच की असमानताएँ जलवायु वार्ताओं में बाधा डालती हैं, जहाँ विकासशील देश न्याय और सहायता की मांग करते हैं, वहीं समृद्ध राष्ट्र बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं का विरोध करते हैं। राष्ट्रीय हित अक्सर आवश्यक वैश्विक सहयोग में बाधा उत्पन्न करते हैं।
चूंकि जलवायु परिवर्तन चरम मौसम की घटनाएँ, हिमनदों का पिघलना, वनाग्नि और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसे स्पष्ट संकेतों के साथ वास्तविकता बन चुका है, अतः यह सतत और समावेशी वैश्विक प्रयासों की माँग करता है। जलवायु परिवर्तन की सीमाहीन प्रकृति को देखते हुए, सामूहिक उत्तरदायित्व समाधान की दिशा में पहला कदम है, जो जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) और COP शिखर सम्मेलन जैसे वैश्विक मंचों की महत्ता को दर्शाता है।
ये वैश्विक मंच आम सहमति पर आधारित, कानूनी रूप से बाध्यकारी कार्यों को प्रोत्साहित करते हैं जो राष्ट्रीय हितों से परे होते हैं। उदाहरण के लिए, पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करने का लक्ष्य एक साझा प्रतिबद्धता है जो विकसित और विकासशील दोनों देशों को समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों के तहत एकजुट करती है। हालाँकि, इन मंचों की सफलता केवल वादों पर ही नहीं, बल्कि वित्त, तकनीक और समानता द्वारा समर्थित सत्यापन योग्य कार्यान्वयन पर भी निर्भर करती है।
दूसरा, जलवायु वित्त एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी विकसित देशों को विकासशील राष्ट्रों में अनुकूलन और शमन समर्थन हेतु वार्षिक 100 अरब डॉलर की अपनी प्रतिबद्धता पूरी करनी चाहिए और उसे बढ़ाना चाहिए। उदाहरण के लिए, ग्रीन क्लाइमेट फंड (जीसीएफ) छोटे द्वीपीय देशों को बाढ़-रोधी बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद करता है और अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर वनरोपण का समर्थन करता है। जलवायु वित्त, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में, जलवायु महत्वाकांक्षा और जलवायु क्षमता के बीच एक सेतु का कार्य भी करता है।
तीसरा, क्षेत्रीय रूप से अनुकूलित जलवायु रणनीतियों को वैश्विक ढांचे का पूरक होना चाहिए। भारत के अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, भूटान के कार्बन-निगेटिव विकास मॉडल और नीदरलैंड की जल-प्रतिरोधक विशेषज्ञता जैसी सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने से विश्व भर में जलवायु प्रतिक्रियाओं को प्रेरणा और बल मिल सकता है। ये प्रयास दर्शाते हैं कि किस प्रकार विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और ज्ञान प्रणालियों के बीच सहयोग, साझा शिक्षा और संसाधनों के माध्यम से संवेदनशीलता को प्रतिरोधकता में बदल सकता है।
भारत ने, विशेष रूप से, सतत विकास को आगे बढ़ाते हुए वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ संतुलन स्थापित के लिए साहसिक कदम उठाए हैं। अपने अद्यतन वांछित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (आईएनडीसी) के तहत, COP26 में, भारत ने अपनी ‘पंचामृत’ रणनीति को स्पष्ट किया, भारत ने 2030 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 45% तक कम करने और यह सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है कि उसी वर्ष तक इसकी संचयी विद्युत क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से आए और 2070 तक नेट-जीरो तक पहुंच जाए। भारत का लक्ष्य अतिरिक्त वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 अरब टन का कार्बन सिंक बनाना भी है।
चौथा, वैज्ञानिक सहयोग और पूर्व चेतावनी प्रणालियों का सीमाओं के पार विस्तार किया जाना चाहिए। बाढ़, चक्रवात और वनाग्नि जैसी जलवायु-जनित आपदाओं के लिए वास्तविक समय डेटा विनिमय, उपग्रह समन्वय और सहयोगात्मक आपदा तैयारी की आवश्यकता होती है। दक्षिण एशियाई जलवायु परिदृश्य फोरम (SASCOF) जैसे क्षेत्रीय प्रयास मानसून के रुझान का पूर्वानुमान लगाने में मदद करते हैं, जिससे भारत, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों को कृषि और स्वास्थ्य संकटों का पूर्वानुमान लगाने और उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से कम करने में मदद मिलती है।
अंत में, पर्यावरणीय शिक्षा को मुख्यधारा में लाने और जलवायु कूटनीति को बढ़ावा देने की तत्काल आवश्यकता है। फ्राइडेज़ फ़ॉर फ़्यूचर जैसे युवा-नेतृत्व वाले आंदोलन, स्कूल-आधारित सततता कार्यक्रम और वैश्विक जलवायु न्यायिक कार्यवाही के प्रयास, पीढ़ियों के बीच बढ़ती जागरूकता और सक्रियता का संकेत देते हैं। जलवायु दायित्वों पर कानूनी स्पष्टता के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में वानुअतु की सफल अपील जैसी कूटनीतिक उपलब्धियां इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि कैसे छोटे देश अपनी स्वायत्तता पुनः प्राप्त कर रहे हैं और वैश्विक जलवायु न्याय ढाँचों को प्रभावित कर रहे हैं।
अंततः, जलवायु परिवर्तन का समाधान अलग-अलग क्षेत्रों में नहीं किया जा सकता। इसके लिए बहुपक्षवाद, क्षेत्रीय सहयोग, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और स्थानीय नवाचार का मिश्रण आवश्यक है। भविष्य एक न्यायसंगत और समावेशी जलवायु परिवर्तन की मांग करता है – जहां विकास तथा कार्बन-उन्मूलन साथ-साथ चले , और समृद्धि को न केवल सकल घरेलू उत्पाद द्वारा बल्कि हमारे ग्रह और उसके लोगों के स्वास्थ्य द्वारा पुनर्परिभाषित किया जाता है।
इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन, अपनी प्रकृति के कारण, क्षेत्रीय सीमाओं का उल्लंघन करता है और संप्रभुता की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देता है। यद्यपि इसके कारण असमान हो सकते हैं और उत्तरदायित्व अलग-अलग हो सकते हैं, फिर भी इसके परिणाम साझा होते हैं, तथा प्रायः सबसे अधिक नुकसान सबसे कम उत्तरदायी व्यक्ति को ही होता है। इस वैश्विक चुनौती का समाधान विखंडित प्रयासों या राष्ट्रवादी गुटबाजी से नहीं किया जा सकता है।
इसके बजाय यह एक नई वैश्विक नैतिकता की मांग करता है, जो प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग को, अल्पकालिक विकास के स्थान पर दीर्घकालिक सततता को, तथा संकीर्ण लाभ के स्थान पर ग्रह कल्याण को प्राथमिकता देती है। जलवायु परिवर्तन हमें “सीमाबद्ध सोच” से आगे बढ़कर और “सीमाहीन उत्तरदायित्व” अपनाने के लिए प्रेरित करता है। इसे राष्ट्रों को न केवल अपने हित के लिए बल्कि साझा हित के लिए कार्य करने के लिए बाध्य करना चाहिए; न केवल अपने नागरिकों की रक्षा के लिए, बल्कि मानवता की रक्षा के लिए भी।
ऐसा करते हुए, जलवायु परिवर्तन एक विरोधाभासी आशा प्रदान करता है: वही संकट जो हमें विभाजित करने का खतरा उत्पन्न करता है, वह अंततः हमारे एकजुट होने का कारण भी हो सकता है। यह हमें विश्व को पृथक-राष्ट्रों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक एकीकृत एवं परस्पर आश्रित सभ्यता के रूप में पुनः कल्पना करने का अवसर प्रदान करता है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या जलवायु परिवर्तन सीमाओं को जानता है, बल्कि यह है कि क्या हम, मानवजाति के रूप में, उनसे ऊपर उठ सकते हैं।
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