Q. [साप्ताहिक निबंध] बहुध्रुवीय विश्व में, कूटनीति ही नया युद्ध है। (1200 शब्द)

निबंध का प्रारूप

  • प्रस्तावना: बहुध्रुवीय विश्व में कूटनीति को एक नए युद्धक्षेत्र के रूप में  प्रयोग किए जाने की प्रासंगिकता से संबंधित लघुकथा प्रस्तुत करते हुए निबंध का परिचय दीजिए।
  • मुख्य भाग:
    • बहुध्रुवीय विश्व का उदय: एक नई वैश्विक संरचना
      • एकध्रुवीय विश्व से बहुध्रुवीय विश्व के उदय को उद्घाटित कीजिए और बहुध्रुवीय विश्व की विशेषताओं का उल्लेख करें।
    • युद्ध की पुनर्परिभाषा: सैन्य शक्ति से कूटनीतिक शक्ति तक
      • शक्ति और संघर्ष के बदलते स्वरूप और कूटनीति किस प्रकार एक नए युद्धक्षेत्र के रूप में उभर रही है, इस पर चर्चा करें।
    • बहुध्रुवीय विश्व में कूटनीतिक युद्ध के रूप
      • वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व में प्रयुक्त कूटनीतिक युद्ध के विभिन्न रूपों, जैसे आर्थिक, डिजिटल और साइबर, जलवायु और पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और सार्वजनिक, ट्रैक II और अनौपचारिक कूटनीति, का विस्तृत वर्णन कीजिए।
    • बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीति: रणनीतिक और अनुकूलनीय
      • वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत द्वारा अपनाई गई कूटनीतिक रणनीति, गुटनिरपेक्षता से लेकर बहुपक्षीयता तक, और भारत के पड़ोसी क्षेत्र, वैश्विक दक्षिण और शेष विश्व व्यवस्था में अपनाई जाने वाली रणनीति पर चर्चा कीजिए।
    • कूटनीतिक युद्ध की चुनौतियाँ
      • कूटनीतिक युद्ध की चुनौतियों, जैसे वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता का संकट, हेरफेर, संप्रभुता और वैश्विकता के बीच की दुविधा, पर चर्चा कीजिए
    • आगे की राह: 21वीं सदी में कूटनीतिक रणनीति की पुनर्कल्पना
      • 21वीं सदी में कूटनीतिक रणनीति की पुनर्कल्पना किस प्रकार की जाए, इसमें संस्थागत सुधार, क्षमता निर्माण आदि जैसी रणनीतियाँ को समाहित करते हुए इस संबंध में  भविष्योन्मुख राह प्रस्तुत कीजिए
  • निष्कर्ष: निबंध का समापन आशावादी दृष्टिकोण को दर्शाते हुए और कूटनीति को युद्ध की सर्वोच्च कला के रूप में प्रस्तुत करते हुए कीजिए।

उत्तर

प्रस्तावना: प्रदर्शन के स्थान पर रणनीति

2022 के प्रारंभ में, जब रूस-यूक्रेन के मध्य युद्ध शुरु हुआ , तो लगभग विश्व ने एक पक्ष का चुनाव किया , नाटो देशों ने मास्को पर प्रतिबंध लगाए, जबकि अन्य ने वैश्विक मंचों पर आक्रमण की निंदा की। लेकिन बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच, एक देश ने चुपचाप चुनाव करने से इनकार कर दिया। भारत ने न तो इसका समर्थन किया, न ही इसका विरोध किया, न ही इसकी आलोचना की और न ही इसे उचित ठहराया, बल्कि इसके बजाय सोच- समझकर मौन बने रहने  का रास्ता अपनाया। रूस के साथ रक्षा संबंध जारी रखते हुए, इसने ऊर्जा आयात में वृद्धि की, संयुक्त राष्ट्र की बैठक में भाग नहीं लिया, तथा साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक सहयोग को अधिक प्रगाढ़ किया। विश्व ने आश्चर्यचकित होकर देखा, फिर भी उसमें उत्सुकता बनी रही।

जो अनिर्णय जैसा प्रतीत हो रहा था, वह वास्तव में परिष्कृत कूटनीति का कार्य था। भारत संघर्ष से बच नहीं रहा था, बल्कि वह रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अपनी लड़ाई लड़ रहा था। एक ऐसे विश्व में, जहां अब किसी एक शक्ति का प्रभुत्व नहीं है, जहां प्रभाव के अनेक ध्रुव प्रतिस्पर्धा करते हैं और टकराते हैं, भारत ने यह प्रदर्शित किया है कि कूटनीति का प्रयोग जब सटीकता के साथ किया जाता है, तो वह हासिल किया जा सकता है जो बल प्रयोग से संभव नहीं है, अर्थात् एक भी गोली चलाए बिना संतुलन, लाभ और वैश्विक महत्व को प्राप्त किया जा सकता है। इस उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कूटनीति अब सहायक विकल्प नहीं, बल्कि नया युद्धक्षेत्र बन चुकी है।

बहुध्रुवीय विश्व का उदय: एक नई वैश्विक संरचना

बहुध्रुवीय विश्व का उदय 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बदलावों में से एक है। शीत युद्ध के बाद, विश्व में कुछ समय के लिए एकध्रुवीयता छायी रही, जिसका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था। हालाँकि, नई शक्तियों के उदय ने एक अधिक खंडित वैश्विक परिदृश्य का निर्माण किया है। चीन पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने वाली एक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभरा है। भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश, रणनीतिक भूगोल और तकनीकी प्रगति इसे एक क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करती है। आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद रूस अपनी सैन्य क्षमताओं और ऊर्जा कूटनीति के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रभाव बनाए हुए है। यूरोपीय संघ, राजनीतिक रूप से जटिल होते हुए भी, आर्थिक और मानक शक्ति में एक सामूहिक ध्रुव बना हुआ है। ये घटनाक्रम बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर संक्रमण को दर्शाते हैं, जहां अनेक शक्ति केंद्र बिना किसी एकाधिकारवादी राष्ट्र के वैश्विक एजेंडा निर्धारित किए, सह-अस्तित्व, प्रतिस्पर्धा और सहयोग को बनाए रखते हैं।

युद्ध की पुनर्परिभाषा: सैन्य शक्ति से कूटनीतिक शक्ति तक

इस बहुध्रुवीय संरचना में कई परिभाषित विशेषताएँ हैं। गठबंधन अब अधिक गतिशील हो गए हैं, तथा प्रायः उनका निर्माण वैचारिक संरेखण के बजाय विशिष्ट मुद्दों पर सहमति के आधार पर होता है। राष्ट्र गुटबाजी की राजनीति के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता का पालन करते हुए सहयोग में लचीलेपन को प्राथमिकता देते हैं। BRICS, SCO, QUAD और I2U2 जैसे क्षेत्रीय समूह और लघुपक्षीय मंच शक्ति संतुलन और कूटनीतिक लाभ प्राप्त करने के साधन के रूप में उभरे हैं। विश्व का स्वरूप लगातार गैर-पदानुक्रमित होता जा रहा है, जहाँ छोटी और मध्यम शक्तियों के पास भी सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता है। इस परिवेश ने राष्ट्रों के लिए अपने हितों को आगे बढ़ाने, प्रतिद्वंद्विता को प्रबंधित करने और शक्ति प्रदर्शन के लिए पारंपरिक युद्ध के बजाय कूटनीति को सबसे व्यावहारिक और प्रभावी साधन बना दिया है।

परमाणु प्रतिवारण, वैश्विक आर्थिक अंतरनिर्भरता और जनमत द्वारा परिभाषित विश्व में पारंपरिक युद्ध तेजी से असंवहनीय होता जा रहा है।  युद्ध की राजनीतिक लागत, आर्थिक व्यवधान और मानवीय परिणामों के साथ मिलकर, अक्सर प्रत्यक्ष टकराव को रोकती है। इसके बजाय, अब संघर्ष प्रतिबंधों, व्यापार नीतियों, साइबर हस्तक्षेप, तकनीकी प्रतिबंधों और प्रभावकारी कार्रवाइयों के माध्यम से सामने आते हैं। युद्ध की परिभाषा का विस्तार हो गया है। यह सिर्फ शत्रु की सेना को हराने के बारे में नहीं है, यह उनकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने, उनके गठबंधनों को विभाजित करने और उनकी वैश्विक स्थिति को कमजोर करने के बारे में है। ऐसे माहौल में, कूटनीति आक्रमण और बचाव दोनों का प्रमुख तरीका बन जाती है।

बहुध्रुवीय विश्व में कूटनीतिक युद्ध के रूप

आज कूटनीति का उद्देश्य न केवल शांति बनाए रखना है, बल्कि बिना युद्ध के रणनीतिक विजय प्राप्त करना भी है। इसका उपयोग गठबंधन बनाने, आख्यान तैयार करने, वैश्विक मानदंडों को आकार देने और विरोधियों को अलग-थलग करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान, पश्चिमी देशों ने रूस को पीछे धकेलने के लिए समन्वित कूटनीतिक साधनों, प्रतिबंधों, संयुक्त राष्ट्र के मतदान, जी 7 घोषणाओं, नाटो विस्तार का उपयोग किया। इसी प्रकार, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता खुले युद्ध के माध्यम से नहीं, बल्कि व्यापार तनाव, तकनीकी कंपनियों पर प्रतिबंधों और अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में वैश्विक प्रभाव की लड़ाई के माध्यम से प्रकट होती है। ये दर्शाते हैं कि किस प्रकार कूटनीति आधुनिक संघर्षों में तेज़ी से अग्रणी भूमिका निभा रही है।

एक प्रमुख क्षेत्र जहां कूटनीति युद्ध के रूप में कार्य करती है, वह है आर्थिक संलग्नता। आर्थिक कूटनीति में व्यापार वार्ता, निवेश प्रवाह, प्रतिबंध, निर्यात नियंत्रण और बुनियादी ढाँचे का वित्तपोषण शामिल है। इसका उपयोग सहयोगियों को पुरस्कृत करने, विरोधियों को दंडित करने और निर्भरताएँ उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI), जिसे सहयोग आधारित विकास के रूप में प्रस्तुत किया गया है, अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए एक भू-राजनीतिक उपकरण के रूप में कार्य करती है। दूसरी ओर, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं उसके सहयोगी आर्थिक प्रतिबंधों को रणनीतिक साधन के रूप में प्रयोग करते रहे हैं, जैसा कि ईरान और रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों में देखा जा सकता है। भारत ने भी व्यापार नीति का रणनीतिक रूप से उपयोग किया है, घरेलू हितों की रक्षा के लिए RCEP से बाहर निकलने का विकल्प चुना है और वैकल्पिक बाज़ारों और लाभ को सुरक्षित करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर वार्ता की है।

डिजिटल और साइबर कूटनीति आधुनिक युद्ध का एक और आयाम है। जैसे-जैसे देश डिजिटल अवसंरचना पर निर्भर होते जा रहे हैं, साइबर सुरक्षा, डेटा प्रशासन, निगरानी और गलत सूचना के मुद्दे कूटनीति के केंद्र में आ गए हैं। साइबर हमले, चाहे वे वित्तीय संस्थाओं पर हों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हों या रक्षा नेटवर्क पर, प्रायः राज्य समर्थित तत्वों द्वारा किए जाते हैं तथा ये एक प्रकार का मौन युद्ध हैं। इसके प्रत्युत्तर में, राष्ट्र साइबर क्षेत्र में नियम निर्धारित करने के लिए राजनयिक गठबंधन बनाते हैं। गलवान संघर्ष के बाद भारत द्वारा चीन के एप्लिकेशनों पर लगाए गए प्रतिबंध एवं पश्चिमी देशों द्वारा हुआवेई पर लगाए गए प्रतिबंध इस बात का प्रमाण हैं कि डिजिटल उपकरण भू-राजनीतिक उद्देश्यों के लिए तीव्रता से उपयोग किए जा रहे हैं।  युद्ध का भविष्य भी एआई कूटनीति, क्वांटम कंप्यूटिंग गठबंधनों और इंटरनेट गवर्नेंस संबंधी वार्ताओं के माध्यम से आकार ले रहा है।

जलवायु और पर्यावरणीय कूटनीति वैश्विक शक्ति गतिशीलता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। चूंकि विश्व जलवायु परिवर्तन के सामान्य अस्तित्वगत खतरे का सामना कर रहा है, इसलिए देश नैतिक और रणनीतिक अधिकार स्थापित करने के लिए पर्यावरणीय नेतृत्व का उपयोग कर रहे हैं। पेरिस समझौता, COP शिखर सम्मेलन और हरित वित्तपोषण ढाँचे अब महत्वपूर्ण कूटनीतिक युद्धक्षेत्र बन गए हैं। यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) वैश्विक व्यापार गतिशीलता को प्रभावित करता है, जबकि चीन और भारत जैसे देश विकासशील देशों पर प्रभाव बढ़ाने के लिए अपनी हरित ऊर्जा पहलों का उपयोग करते हैं। भारत का अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और “वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड पहल इस बात के उदाहरण हैं कि जलवायु  पर आधारित नेतृत्व किस प्रकार सॉफ्ट पावर प्रक्षेपण का एक साधन हो सकता है।

संस्कृति और सार्वजनिक कूटनीति दीर्घकालिक प्रभाव बनाने के लिए आधारभूत तत्व बने हुए हैं। राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक विरासत, भाषा, प्रवासी समुदाय और शिक्षा प्रणालियों का उपयोग विदेशी धारणाओं को आकार देने और रणनीतिक आधार सुरक्षित करने के लिए करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के वैश्विक उत्सव, बॉलीवुड की वैश्विक लोकप्रियता तथा प्रवासी भारतीय दिवस के माध्यम से प्रवासी समुदाय से जुड़ने के प्रयास—ये सभी सद्भावना बढ़ाने एवं सहभागिता को प्रगाढ़ करने के प्रभावशाली साधन हैं। इसी प्रकार, अमेरिका शिक्षा और मीडिया के माध्यम से अपने मूल्यों और जीवनशैली को बढ़ावा देता है; चीन कन्फ्यूशियस संस्थानों में निवेश करता है; फ्रांस भाषा और फैशन में; दक्षिण कोरिया पॉप संस्कृति में निवेश करता है। ये प्रयास, यद्यपि अराजनीतिक प्रतीत होते हैं, लेकिन अत्यंत रणनीतिक हैं तथा आधुनिक कूटनीति का अभिन्न अंग हैं।

बहुध्रुवीय विश्व में भारत की कूटनीति: रणनीतिक और अनुकूलनीय

बहुध्रुवीय विश्व में भारत का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि किस प्रकार कूटनीति विदेश नीति और रणनीतिक रुख का केन्द्र बन गई है। अतीत की विचारधारा-आधारित गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़ते हुए, भारत आज बहु-गठबंधन की व्यावहारिक नीति का पालन करता है, तथा अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर प्रतिस्पर्धी शक्तियों के साथ संबंधों को बनाए रखता है। भारत रूस के साथ रक्षा सहयोग को प्रबल बनाए रखता है, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ करता है, ऊर्जा एवं कनेक्टिविटी के क्षेत्र में ईरान से सहयोग करता है, तथा यूरोपीय संघ एवं जापान के साथ संबंधों को सुदृढ़ बनाए रखता है।  यह विविधतापूर्ण सहभागिता विदेश नीति में लचीलापन और स्वायत्तता प्रदान करती है।

क्षेत्रीय स्तर पर, भारत अपने हितों को सुरक्षित रखने तथा प्रतिद्वंद्वी प्रभावों, विशेषकर चीन, को नियंत्रित करने के लिए कूटनीति का उपयोग करता है। SAGAR , BIMSTEC और भारत-आसियान सहभागिता जैसी पहलों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और विकास सहयोग को बढ़ावा देना है। मानवीय सहायता, क्षमता निर्माण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से भारत पड़ोस में चीन के प्रभाव का मुकाबला कर रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री पहल (वैक्सीन कूटनीति) स्वास्थ्य कूटनीति की एक उत्कृष्ट उपलब्धि सिद्ध हुई, जिसने भारत को एक जिम्मेदार एवं परोपकारी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।

वैश्विक परिदृश्य में, भारत बहुपक्षवाद में सुधार लाने तथा ग्लोबल साउथ की आवाज़ को सशक्त करने का प्रयास करता है। G-20 में इसका नेतृत्व, ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अभियान, अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के नियमों को आकार देने की इसकी आकांक्षा को दर्शाते हैं। भारत अंतरिक्ष कूटनीति में भी अग्रणी बनकर उभरा है, जिसने चंद्रयान-3 जैसे सफल मिशनों के माध्यम से अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है तथा साझेदार देशों को उपग्रह सहायता प्रदान की है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, फिनटेक तथा जलवायु लचीलापन जैसे क्षेत्रों में भारत अपने मॉडलों को विकासशील देशों के साथ साझा कर कूटनीति को वैश्विक नेतृत्व का साधन बना रहा है।

कूटनीतिक युद्ध की चुनौतियाँ

हालांकि एक नए युद्ध स्वरूप के रूप में कूटनीति की प्रभावशीलता चुनौतियों से रहित नहीं है। प्रथम, संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी वैश्विक संस्थाएं विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही हैं, जो अक्सर शक्ति प्रतिद्वंद्विता के कारण पंगु हो जाती हैं और उनमें न्यायसंगत प्रतिनिधित्व का अभाव होता है। मानदंडों को लागू करने या संरचनात्मक असंतुलन को दूर करने में उनकी अक्षमता कूटनीतिक परिणामों को कमज़ोर करती है।

दूसरे, सूचना एवं भ्रामक सूचनाओं का उपकरण के रूप में प्रयोग सार्वजनिक कूटनीति की वैधता को बाधित कर देता है। डीपफेक, ट्रोल फार्म और सोशल मीडिया हेरफेर गुप्त प्रभाव संचालन के उपकरण बन गए हैं।

तीसरा, कूटनीतिक संबंध अब अधिकतर लाभ-उन्मुख प्रतीत होते हैं, जो दीर्घकालिक सिद्धांतों के बजाय अल्पकालिक लाभों पर केंद्रित होते हैं। इस बदलाव से वैश्विक मामलों में लोकतंत्र, पारदर्शिता और मानवाधिकार जैसे मूल्यों के क्षरण का खतरा है। अंततः, बढ़ते राष्ट्रवाद  के वैश्विक परिदृश्य में, देश प्रायः संप्रभु हितों और वैश्विक सहयोग की अनिवार्यताओं के बीच संतुलन स्थापित करने में संघर्ष करते हैं, विशेषकर जलवायु परिवर्तन और शरणार्थी अधिकारों जैसे मुद्दों पर।

आगे की राह: 21वीं सदी में कूटनीतिक रणनीति की पुनर्कल्पना

इस नई वैश्विक व्यवस्था में कूटनीति को एक प्रभावी और नैतिक उपकरण बनाने के लिए अनेक सुधार आवश्यक हैं। वैश्विक संस्थानों को वर्तमान वास्तविकताओं का सटीक प्रतिबिंब देने हेतु अधिक लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिए, ताकि उभरती शक्तियों एवं वैश्विक दक्षिण को उचित स्वर और प्रतिनिधित्व मिल सके।  कूटनीतिक प्रशिक्षण को पारंपरिक क्षेत्रों से परे विस्तारित करते हुए इसमें प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान एवं पर्यावरण विज्ञान की विशेषज्ञता को समाहित करना चाहिए। राष्ट्रों को शैक्षिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और डिजिटल सहभागिता को बढ़ावा देकर जन-स्तरीय कूटनीति में भी निवेश करना चाहिए।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कूटनीति को अपना नैतिक मूल नहीं खोना चाहिए। इसे राष्ट्रीय हितों और वैश्विक दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए, तथा वार्ता का उपयोग केवल शक्ति संवर्धन के लिए नहीं, बल्कि शांति, न्याय एवं सततता को बढ़ावा देने के लिए भी किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: कूटनीति युद्ध की सर्वोच्च कला है

निबंध का निष्कर्ष यह है कि वैश्विक व्यवस्था के बहुध्रुवीय ढाँचे में विकसित होने से शक्ति के साधनों का ही स्वरूप बदल गया है। अतीत में जहाँ युद्ध को क्षेत्रीय विजयों एवं विनाश से परिभाषित किया जाता था, अब यह शब्दों, प्रभाव, गठबंधनों और रणनीतिक संरेखण के माध्यम से लड़ा जाता है। इस संदर्भ में, कूटनीति युद्ध का सौम्य विकल्प नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध का प्राथमिक साधन बन चुकी है। यह युद्धों को टालकर विजय अर्जित करती है है, शत्रुओं को अलग-थलग करके उन्हें परास्त करती है, तथा आम सहमति बनाकर एवं मानदंड-निर्माण के माध्यम से अपनी शक्ति स्थापित करती है।

जैसा कि सुन त्ज़ु ने प्रसिद्ध रूप से कहा था, “युद्ध की सर्वोच्च कला बिना लड़े ही शत्रु को परास्त करना है।” आज के विश्व में, राजनयिक ही नया सेनापति है और दूतावास नए युद्धक्षेत्र हैं। भारत जैसे देशों के लिए, इस कला में निपुणता यह निर्धारित करेगी कि वह 21वीं सदी की भू-राजनीतिक बिसात पर नियम-निर्माता बनेगा या नियम-पालक।

संबंधित उद्धरण:

  • “कूटनीति किसी और को अपनी बात पर सहमत करने की कला है।” (डेविड फ्रॉस्ट)
  • “एक शासक को कूटनीति का उतना ही प्रयोग करना चाहिए जितना बल का, क्योंकि शासन-कौशल में दोनों की आवश्यकता होती है।” (कौटिल्य, अर्थशास्त्र)
  • युद्ध-युद्ध करने से सदैव बेहतर है संवाद-वार्ता करना।  (विंस्टन चर्चिल)
  • “कूटनीति सभ्य लोगों का हथियार है।” (विल ड्यूरेंट)
  • “परस्पर निर्भरता की दुनिया में, कूटनीति केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है।” (कोफ़ी अन्नान)
  • “शतरंज की तरह कूटनीति में भी दूरदर्शिता की जीत होती है।” (अनाम)
  • “सॉफ्ट पावर, दबाव डालने के बजाय आकर्षित करने और सहयोजित करने की क्षमता है।” (जोसेफ नाइ)
  • “वास्तविक विजय दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि उन्हें अपने पक्ष में करने में है।” (कौटिल्य)

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