प्रश्न की मुख्य माँग
- परीक्षा संकट को केवल सुरक्षा चूकों से परे व्यापक दृष्टिकोण से समझना।
- परीक्षा प्रणाली में विश्वास एवं शासन की कमी
- सीमित अवसरों और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के मध्य संबंध।
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परिचय
ऐसे समाज में जहाँ परीक्षाएँ शैक्षिक, व्यावसायिक और सामाजिक उन्नति का प्रमुख आधार होती हैं, उनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता सार्वजनिक विश्वास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। किंतु हाल के वर्षों में बार-बार सामने आए परीक्षा विवादों ने ऐसी संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है, जो संस्थाओं में विश्वास, शासन की प्रभावशीलता तथा अवसरों की उपलब्धता से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
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सुरक्षा चूकों से परे परीक्षा संकट
- बार-बार पेपर लीक: सुधारों के बावजूद लगातार हो रहे पेपर लीक यह दर्शाते हैं कि केवल सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण की अपनी सीमाएँ हैं।
- अनुकूलनशील धोखाधड़ी: परीक्षा कदाचार से जुड़े नेटवर्क लगातार नए तरीके विकसित करते हुए उभरती कमजोरियों का लाभ उठाते रहते हैं।
- कारणों पर ध्यान नहीं: प्राधिकरण प्रायः संरचनात्मक कारणों के बजाय केवल दिखाई देने वाली विफलताओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- उदाहरण: सामान्यतः प्रतिक्रिया के रूप में प्रश्नपत्रों की सीलिंग को मजबूत करने और पुलिस बल बढ़ाने जैसे कदम उठाए जाते हैं, जबकि प्रणालीगत सुधारों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
- प्रोत्साहन संबंधी समस्या: एक ही परीक्षा अक्सर उच्च शिक्षा तथा आर्थिक उन्नति तक पहुँच का निर्धारण करती है।
परीक्षा प्रणाली में विश्वास एवं शासन का संकट
- विश्वास क्षरण: सीमित स्तर की चूक भी पूरी परीक्षा प्रक्रिया में विश्वास को कमजोर कर सकती है तथा उसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकती है।
- उदाहरण: NEET-UG 2024 विवाद ने व्यापक स्तर पर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर संदेह उत्पन्न किया।
- विखंडित जवाबदेही: विफलता की स्थिति में अनेक पक्षों की भागीदारी जिम्मेदारी को विखंडित कर देती है।
- उदाहरण: जवाबदेही परीक्षा एजेंसियों, मंत्रालयों, राज्य प्राधिकरणों, सेवा प्रदाताओं तथा परीक्षा केंद्रों के बीच विभाजित रहती है।
- कमजोर निगरानी: एकीकृत पर्यवेक्षण तंत्र के अभाव में प्रभावी जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।
- उदाहरण: परीक्षण एवं भर्ती एजेंसियों की निगरानी हेतु स्वतंत्र राष्ट्रीय परीक्षा अखंडता प्राधिकरण का अभाव।
- पारदर्शिता की कमी: सीमित प्रकटीकरण एवं लेखा-परीक्षण तंत्र के कारण जनता का विश्वास कमजोर होता है।
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अवसरों की कमी और परीक्षा कदाचार
- उच्च प्रतिस्पर्द्धा: परीक्षाएँ सीमित अवसरों तक पहुँच का प्रमुख माध्यम होती हैं, जो शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक प्रतिष्ठा को निर्धारित करती हैं। इसके चलते सीमित सीटों एवं नौकरियों के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।
- आर्थिक दबाव: परिवार परीक्षा में सफलता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त समय, धन एवं अन्य संसाधनों का निवेश करते हैं।
- लाभ प्राप्त करने की प्रवृत्ति: गैरी बेकर (Gary Becker) के आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, जब किसी अवैध कार्य से मिलने वाले संभावित लाभ उसके जोखिम या लागत से अधिक प्रतीत होते हैं, तब ऐसे व्यवहार के बने रहने की संभावना बढ़ जाती है।
निष्कर्ष
परीक्षाओं की अखंडता की पुनर्स्थापना केवल निगरानी बढ़ाने और दंडात्मक कानूनों के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए संस्थागत विश्वास को सुदृढ़ करना, स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करना तथा गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक एवं रोजगार अवसरों का विस्तार करना आवश्यक है, ताकि एक निष्पक्ष, विश्वसनीय व भरोसेमंद परीक्षा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया जा सके।