प्रश्न की मुख्य माँग
- डोपिंग प्रथाओं में नैतिक मुद्दे
- ईमानदारी और निष्पक्षता को बढ़ावा देने के उपाय।
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उत्तर
भारत वर्ष 2030 में शताब्दी राष्ट्रमंडल खेलों और वर्ष 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लक्ष्य के साथ एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखता है, तब उसे लगातार तीन वर्षों तक विश्व में सर्वाधिक डोपिंग उल्लंघनकर्ता होने की एक ‘संदिग्धता’ का सामना करना पड़ रहा है। उच्च महत्त्वाकांक्षा और निम्न नैतिकता का यह विरोधाभास खेल परितंत्र में व्याप्त नैतिक क्षरण का गंभीर एवं समालोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक बनाता है।
डोपिंग प्रथाओं में नैतिक मुद्दे
- निष्पक्षता का उल्लंघन: डोपिंग कृत्रिम और अनुचित लाभ प्रदान करती है, जिससे प्रतिस्पर्द्धी खेलों की नैतिक भावना ‘समान अवसर का सिद्धांत’ नष्ट हो जाता है।
- उदाहरण: वर्ष 2024 में भारत की 3.6% सकारात्मकता दर, जो प्रमुख परीक्षणकर्ता देशों में विश्व में सर्वाधिक थी, योग्यता-आधारित प्रतिस्पर्द्धा के व्यवस्थित अपवंचन को दर्शाती है।
- स्वास्थ्य को क्षति: प्रदर्शन-वर्द्धक औषधियाँ हृदय संबंधी विकारों और बाँझपन सहित अपूरणीय शारीरिक क्षति पहुँचाती हैं, जो ‘अहानिकारकता’ के नैतिक सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं।
- विश्वास का हनन: डोपिंग एक प्रकार का धोखे का कार्य है, जो प्रशंसकों, प्रायोजकों और राष्ट्र के विश्वास को तोड़ता है तथा ‘खेल भावना’ को क्षीण करता है।
- उदाहरण: अंडर-23 कुश्ती चैंपियन रीतिका हुडा जैसे हाई-प्रोफाइल निलंबन, वैश्विक मंच पर देश की खेल छवि को धूमिल करते हैं।
- आदर्श व्यक्तित्व का पतन: शीर्ष खिलाड़ी समाज के आदर्श होते हैं; उनका डोपिंग में संलिप्त होना जमीनी स्तर की प्रतिभा और बच्चों के लिए विनाशकारी मिसाल स्थापित करता है।
- उदाहरण: वर्ष 2024 की रिपोर्टों के अनुसार, एथलेटिक्स में 76 तथा भारोत्तोलन में 43 मामलों की उच्च संख्या युवाओं में ‘जल्दी सफलता की चाह’ को दर्शाती है।
- दबाव और शोषण: खिलाड़ियों पर अक्सर ‘सहायक कर्मियों’ (कोच/फिजियो) द्वारा दबाव डाला जाता है, जिससे सूचित सहमति और पेशेवर ईमानदारी से जुड़े नैतिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय डोपिंग रोधी अधिनियम, 2022 के अनुसार ‘सहायक कर्मी’ अब डोपिंग में सहायता के लिए विधिक रूप से उत्तरदायी हैं।
- आर्थिक धोखाधड़ी: डोपिंग करने वाले खिलाड़ी गलत आधार पर सरकारी नौकरियाँ और नकद पुरस्कार प्राप्त कर लेते हैं, जिससे ईमानदार योग्यता हेतु निर्धारित सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग होता है।
नैतिकता और निष्पक्षता को बढ़ावा देने के उपाय
- संस्थागत स्वायत्तता का विस्तार: राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी को प्रशासनिक हस्तक्षेप से मुक्त, वास्तविक रूप से स्वतंत्र संस्था में परिवर्तित करना, ताकि वह अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्य कर सके।
- उदाहरण: राष्ट्रीय डोपिंग रोधी (संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य एजेंसी को सरकारी विभागों से परिचालनात्मक स्वतंत्रता प्रदान करना है।
- प्रौद्योगिकीय निगरानी उपकरण: ‘नो योर मेडिसिन’ (Know Your Medicine) ऐप का विस्तार करना ताकि एथलीट यह सत्यापित कर सकें कि आम दवाओं में प्रतिबंधित पदार्थ मौजूद हैं या नहीं।
- उदाहरण: डोपिंग रोधी शिक्षा एवं जागरूकता उपकरण, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से पूरक आहार की सुरक्षा पर मार्गदर्शन देता है।
- अनिवार्य जमीनी शिक्षा: विद्यालयों और खेलो इंडिया केंद्रों में डोपिंग रोधी पाठ्यक्रम का समावेशन, ताकि प्रारंभ से ही ‘स्वच्छ खेल’ संस्कृति विकसित हो।
- परीक्षण अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: परिष्कृत डोपिंग चक्रों का पता लगाने हेतु प्रतियोगिता-पूर्व एवं रक्त-आधारित परीक्षणों की आवृत्ति बढ़ाना।
- कठोर ‘शून्य-सहिष्णुता’ दंड: पुनरावृत्ति करने वाले खिलाड़ियों और प्रणालीगत डोपिंग में संलिप्त सहायक कर्मियों पर आजीवन प्रतिबंध लागू करना, ताकि प्रभावी निवारण हो सके।
- सूचनादाता संरक्षण कार्यक्रम: शक्तिशाली महासंघों से प्रतिशोध के भय के बिना ‘डोपिंग गिरोहों’ की सूचना देने हेतु सुरक्षित माध्यम स्थापित करना।
- पोषण सुरक्षा ढाँचा: भारत में पोषण पूरकों के निर्माण का विनियमन, ताकि संदूषण के कारण अनजाने में होने वाली डोपिंग रोकी जा सके।
निष्कर्ष
डोपिंग की चुनौती से उबरने के लिए भारत को ‘परीक्षण और दंड’ मॉडल से आगे बढ़कर ‘रोकथाम और संरक्षण’ की कार्यशैली अपनानी होगी। राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी की पूर्ण स्वायत्तता सुनिश्चित कर तथा खेल विज्ञान में निवेश बढ़ाकर भारत ‘सबसे खराब उल्लंघनकर्ता’ से ‘नैतिकता के आदर्श’ में परिवर्तित हो सकता है। इससे वर्ष 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भारत एक विश्वसनीय और अडिग दावा प्रस्तुत कर सकेगा।
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