प्रश्न की मुख्य माँग
- प्रभावी नौसैनिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में संरचनात्मक चुनौतियों को स्पष्ट कीजिए।
- परिचालन तैयारी को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए।
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उत्तर
भारत की समुद्री सुरक्षा केवल अधिक युद्धपोतों के निर्माण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि समयबद्ध युद्धक तैयारी, सेंसर क्षमता और रणनीतिक समन्वय सुनिश्चित करने पर भी आधारित है। प्रोजेक्ट 17A स्वदेशी जहाज निर्माण में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद नौसैनिक आत्मनिर्भरता में बनी हुई कमियों को उजागर करता है।
नौसैनिक आत्मनिर्भरता में संरचनात्मक चुनौतियाँ
- आयात पर निर्भरता: इंजन, रडार और सोनार जैसे महत्त्वपूर्ण घटक अब भी आयातित हैं, जिससे घरेलू स्तर पर युद्धपोत ढाँचा निर्माण होने के बावजूद अंतिम युद्धक एकीकरण में देरी होती है।
- उदाहरण: प्रोजेक्ट 17A में 75% स्वदेशी मूल्य होने के बावजूद प्रमुख सेंसर और प्रणोदन प्रणालियाँ विदेशी निर्भरता पर आधारित रहीं।
- विलंबित आपूर्ति: कई बार आवश्यक युद्धक प्रणालियों के निर्माण में देरी देखने को मिलती है, जिससे परिचालन तैयारी कमजोर होती है और डिलीवरी दावों में कृत्रिम वृद्धि होती है।
- उदाहरण: कैग ने ऐसे युद्धपोतों की ओर संकेत किया, जिन्हें इंजन और सेंसर के बिना ही सौंप दिया गया, जिससे वे युद्धक तैनाती के लिए तैयार नहीं थे।
- डिजाइन में परिवर्तन: निर्माण के दौरान बार-बार डिजाइन परिवर्तन लागत बढ़ाते हैं, समयसीमा में देरी करते हैं और कमजोर योजना तथा तकनीकी मानकीकरण को दर्शाते हैं।
- उदाहरण: कैग ने पहले के युद्धपोत वर्गों के निर्माण के दौरान सैकड़ों डिजाइन परिवर्तनों की रिपोर्ट दी थी।
- कमज़ोर अवसंरचना: प्लेटफॉर्म की तैनाती अक्सर उपयुक्त डॉकयार्ड, लॉजिस्टिक शृंखला, मरम्मत प्रणाली और सहायक अवसंरचना के बिना होती है, जिससे दीर्घकालिक परिचालन क्षमता प्रभावित होती है।
- सेंसर की कमी: फ्रिगेट्स में उच्च गुणवत्ता वाले आयातित रडार और सोनार की कमी होती है, जिससे पनडुब्बियों और क्षेत्रीय खतरों के विरुद्ध मोबाइल सेंसर के रूप में उनकी प्रभावशीलता घट जाती है।
- उदाहरण: चीनी पनडुब्बियों की उपस्थिति बढ़ रही है, लेकिन उन्नत सोनार के बिना भारतीय युद्धपोत प्रभावी प्रतिक्रिया देने में सीमित हैं।
परिचालन तैयारी को सुदृढ़ करने के उपाय
- सेंसरों का स्वदेशीकरण: रणनीतिक देरी को कम करने के लिए रडार, सोनार, प्रणोदन प्रणालियाँ और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणालियों के स्वदेशी विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- उदाहरण: DRDO और BEL, आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी नौसैनिक सेंसर विकास को तीव्र कर सकते हैं।
- एकीकृत योजना: जहाज निर्माण को डॉकयार्ड क्षमता, मेंटिनेंस सिस्टम, गोला-बारूद आपूर्ति और नौसैनिक अड्डों के अवसंरचना विस्तार के साथ समन्वित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: युद्धपोतों का कमीशनिंग केवल लॉन्च समय-सीमा नहीं, बल्कि वास्तविक परिचालन तैयारी के अनुरूप होना चाहिए।
- खतरे के अनुरूप योजना: बल संरचना और योजना वास्तविक समुद्री खतरों के अनुरूप होनी चाहिए, न कि निम्न-तीव्रता चुनौतियों के लिए अत्यधिक उन्नत फ्रिगेट्स पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- उदाहरण: समुद्री डकैती और तस्करी जैसी चुनौतियों का बेहतर समाधान भारतीय तटरक्षक बल द्वारा किया जा सकता है, न कि केवल उन्नत फ्रिगेट्स के माध्यम से।
- निगरानी क्षमता उन्नयन: बेड़े के विस्तार से पहले उपग्रहों, जलमग्न सेंसरों और तटीय रडार आधुनिकीकरण के माध्यम से “डिटेक्ट-डिसाइड-रिस्पॉन्ड” शृंखला को मजबूत किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: वर्ष 2008 मुंबई हमलों के बाद निर्मित स्थैतिक सेंसरों की शृंखला (Chain of Static Sensors) को और उन्नत करने की आवश्यकता है।
- निजी क्षेत्र आधारित पारिस्थितिकी तंत्र: महत्त्वपूर्ण प्रणालियों के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी और दीर्घकालिक खरीद सुनिश्चित कर एक मजबूत घरेलू रक्षा विनिर्माण तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: रणनीतिक साझेदारी मॉडल स्वदेशी मरीन इंजन और नौसैनिक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को समर्थन दे सकता है।
निष्कर्ष
नौसैनिक आत्मनिर्भरता केवल युद्धपोत निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सुनिश्चित युद्धक क्षमता से जुड़ी हुई है। भारत को वास्तविक समुद्री खतरों के अनुरूप प्लेटफॉर्म, सेंसर और अवसंरचना का समन्वय करना होगा, ताकि हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और सतत् विकास लक्ष्य- 9 (उद्योग एवं नवाचार) के अंतर्गत रणनीतिक आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाया जा सके।