प्रश्न की मुख्य माँग
- स्वास्थ्य के अधिकार को साकार करने में सामने आने वाली चुनौतियाँ।
- सुधारों की आवश्यकता।
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उत्तर
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती निजीकरण प्रवृत्ति, कमजोर विनियमन तथा सार्वजनिक व्यय का लगातार निम्न स्तर, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में असमानताओं को और बढ़ा रहा हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार सम्मेलन (वर्ष 2025) ने इस बहस को पुनर्जीवित किया है कि स्वास्थ्य के अधिकार को वास्तव में प्रवर्तनीय कैसे बनाया जाए। इस संदर्भ में बाधाओं का मूल्यांकन और ठोस सुधारों की पहचान अनिवार्य हो जाती है।
स्वास्थ्य अधिकार के वास्तविक क्रियान्वयन में चुनौतियाँ
- निजीकरण का दबाव: PPP मॉडल का विस्तार और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों का निजी क्षेत्र को हस्तांतरण, समान पहुँच और वहनीयता को कमजोर करता है।
- उदाहरण: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गुजरात में निजीकरण के प्रभाव को लेकर व्यापक आंदोलन दर्ज किए गए।
- कमजोर विनियमन: क्लिनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 का कमजोर प्रवर्तन अत्यधिक शुल्क, अनावश्यक प्रक्रियाएँ और रोगी अधिकारों के उल्लंघन को बढ़ाता है।
- उदाहरण: सीजेरियन सर्जरी की अत्यधिक दरें और अपारदर्शी मूल्य-निर्धारण संबंधी मुद्दे सामने आए।
- सार्वजनिक व्यय का निम्न स्तर: केंद्र सरकार के बजट का केवल 2% स्वास्थ्य पर व्यय होता है, जिससे अवसंरचना, मानव संसाधन और सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट (OOP) व्यय: बीमा योजनाओं के बावजूद घरेलू स्वास्थ्य व्यय में कमी नहीं आई है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच आर्थिक क्षमता पर निर्भर रहती है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (NHA) के अनुसार, कुल स्वास्थ्य व्यय में OOP का हिस्सा अभी भी लगभग 40% है।
- सामाजिक बहिष्करण: दलित, आदिवासी, मुस्लिम, LGBTQ+ समुदाय तथा दिव्यांगजन भेदभाव का सामना करते हैं, जिससे सार्वभौमिक पहुँच बाधित होती है।
आवश्यक सुधार
- सार्वजनिक वित्तपोषण बढ़ाना: सरकारी निवेश में वृद्धि तथा मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली, असमानताओं को कम करने और स्वास्थ्य को वास्तविक अधिकार बनाने में सहायक होगी।
- विनियमन को सुदृढ़ करना: क्लिनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 का प्रभावी प्रवर्तन, मानकीकृत दरें, रोगी अधिकारों की अनिवार्यता और शिकायत निवारण व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: सम्मेलन ने पारदर्शी मूल्य-निर्धारण और दर विनियमन की माँग रखी है।
- स्वास्थ्य कर्मियों का समर्थन: उचित वेतन, रोजगार सुरक्षा और बेहतर कार्य-परिस्थितियाँ उपलब्ध कराकर सक्षम सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल तैयार किया जा सकता है।
- दवाओं को सुलभ बनाना: मूल्य नियंत्रण का विस्तार, आवश्यक दवाओं पर GST हटाना और सार्वजनिक क्षेत्र में औषधि उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
- उदाहरण: 80% से अधिक दवाएँ अभी भी मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं।
- समावेशी शासन को बढ़ावा देना: विकेंद्रीकृत योजना, सामुदायिक निगरानी तथा समानता-आधारित ढाँचे अपनाकर भेदभाव कम किया जा सकता है और जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है।
निष्कर्ष
स्वास्थ्य अधिकार को वास्तविक रूप से न्यायसंगत बनाने के लिए वित्तपोषण, विनियमन और शासन—तीनों स्तरों पर व्यापक सुधार आवश्यक हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने और शोषणकारी बाजार प्रथाओं पर नियंत्रण के बिना सार्वभौमिक एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा संभव नहीं है। केवल अधिकार-आधारित और समानता-उन्मुख दृष्टिकोण ही संवैधानिक उद्देश्य को वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा में बदल सकता है।
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