प्रश्न की मुख्य माँग
- अनुभव-आधारित समाधान और सर्वोत्तम प्रथाओं के सक्रिय प्रदाता के रूप में ग्लोबल साउथ की भूमिका।
- यूरोप की हीटवेव इस परिवर्तन की पुष्टि कैसे करती है।
- वैश्विक सहयोग के लिए इसके निहितार्थ।
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उत्तर
परिचय
जलवायु परिवर्तन वैश्विक ज्ञान प्रवाह की दिशा को पुनर्परिभाषित कर रहा है। जैसे-जैसे अत्यधिक गर्मी यूरोप की नई सामान्य स्थिति (New Normal) बनती जा रही है, ग्लोबल साउथ में विकसित अनुकूलन उपाय जलवायु लचीलापन रणनीतियों का आधार बन रहे हैं। यह एकतरफा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से आगे बढ़कर पारस्परिक जलवायु अधिगम की ओर हो रहे परिवर्तन का संकेत देता है।
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अनुभव-आधारित समाधान और सर्वोत्तम प्रथाओं के सक्रिय प्रदाता के रूप में ग्लोबल साउथ
- हीट एक्शन: ग्लोबल साउथ ने प्रारंभिक चेतावनी एवं समन्वित प्रतिक्रिया के माध्यम से गर्मी से संबंधित जोखिमों को कम करने हेतु प्रभावी संस्थागत तंत्र विकसित किए हैं।
- उदाहरण: अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान (2013)—भारत की पहली हीट एक्शन योजना, जिसे विश्व बैंक एवं WHO ने मान्यता दी है।
- जलवायु-अनुकूल अवसंरचना: इन देशों ने ऐसी अवसंरचना विकसित की है, जो लंबे समय तक रहने वाली गर्मी एवं चरम मौसमी परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
- निष्क्रिय शीतलन: पारंपरिक भवन डिजाइन बिना एयर कंडीशनर पर अत्यधिक निर्भरता के भवनों के भीतर तापमान को कम रखते हैं।
- उदाहरण: तेलंगाना की कूल रूफ नीति के अंतर्गत प्रोत्साहित कूल रूफ तथा भारत की पारंपरिक आँगन (Courtyard) आधारित वास्तुकला।
- सामुदायिक अनुकूलन: स्थानीय समुदायों ने जल की कमी एवं अत्यधिक गर्मी से निपटने के व्यावहारिक उपाय विकसित किए हैं।
- उदाहरण: जल शक्ति अभियान – कैच द रेन समुदाय आधारित जल संरक्षण को बढ़ावा देता है।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: किसान जलवायु-सहिष्णु फसलों एवं जल दक्ष कृषि पद्धतियों को तेजी से अपना रहे हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA) जलवायु-अनुकूल कृषि को प्रोत्साहित करता है।
यूरोप की हीटवेव इस परिवर्तन की पुष्टि कैसे करती है
- बार-बार आने वाली हीटवेव: हीटवेव अब अपवाद नहीं रही, बल्कि बार-बार घटित होने वाली जलवायु स्थिति बन गई है, जिसके लिए दीर्घकालिक अनुकूलन आवश्यक है।
- उदाहरण: पिछले पाँच ग्रीष्म ऋतुओं में से चार में गंभीर हीटवेव दर्ज की गई।
- अवसंरचना की विफलता: अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु के अनुरूप निर्मित मौजूदा अवसंरचना अत्यधिक गर्मी सहन करने में असमर्थ होती जा रही है।
- उदाहरण: यूरोप में रेल सेवाओं में व्यवधान तथा सड़कों के क्षतिग्रस्त होने जैसी घटनाएँ।
- शीतलन की सीमाएँ: एयर कंडीशनिंग पर अत्यधिक निर्भरता वहनीयता, कार्बन उत्सर्जन एवं बिजली की बढ़ती माँग जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।
- उदाहरण: यूरोप के लगभग 10% लोग ऊर्जा गरीबी (Energy Poverty) से प्रभावित हैं।
- खाद्य सुरक्षा पर जोखिम: लंबे समय तक रहने वाली गर्मी एवं अनिश्चित मौसम के कारण कृषि अधिक संवेदनशील होती जा रही है।
- उदाहरण: फ्राँस में चरम मौसम के कारण मक्का उत्पादन का लगभग एक-तिहाई तक नुकसान दर्ज किया गया।
- ग्लोबल साउथ से सीख: यूरोप अब यह स्वीकार कर रहा है कि ग्लोबल साउथ में पहले से लागू जलवायु अनुकूलन मॉडल उसकी वर्तमान चुनौतियों के समाधान में उपयोगी हो सकते हैं।
वैश्विक सहयोग के लिए निहितार्थ
- पारस्परिक अधिगम: जलवायु अनुकूलन को उत्तर से दक्षिण की एकतरफा प्रक्रिया के बजाय द्विपक्षीय ज्ञान आदान-प्रदान का स्वरूप दिया जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी साझाकरण: कम लागत वाली एवं जलवायु-सहिष्णु प्रौद्योगिकियों का संयुक्त रूप से विकास एवं व्यापक प्रसार किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) सुदृढ़ अवसंरचना के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
- अनुकूलन वित्त: विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी सिद्ध हो चुके अनुकूलन उपायों के विस्तार हेतु अधिक निवेश की आवश्यकता है।
- उदाहरण: UNFCCC का वैश्विक अनुकूलन लक्ष्य (Global Goal on Adaptation) अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करने पर बल देता है।
- स्थानीय समाधान: जलवायु नीतियों में ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल (One-size-fits-all)’ दृष्टिकोण के स्थान पर स्थानीय परिस्थितियों एवं समुदाय-आधारित अनुकूलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- वैश्विक एकजुटता: जलवायु शासन में ग्लोबल साउथ को अनुकूलन नीतियों के निर्माण में समान भागीदार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
- उदाहरण: भारत की G20 अध्यक्षता (2023) ने LiFE (Lifestyle for Environment) मिशन तथा वैश्विक सहयोग के माध्यम से समावेशी एवं लचीले विकास पर बल दिया।
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निष्कर्ष
जैसे-जैसे जलवायु की चरम घटनाएँ वैश्विक स्तर पर सामान्य होती जा रही हैं, जलवायु अनुकूलन में नेतृत्व आर्थिक क्षमता के बजाय व्यावहारिक अनुभव पर अधिक निर्भर होगा। ग्लोबल साउथ को ज्ञान साझेदार के रूप में मान्यता देने से जलवायु संकट के प्रति अधिक न्यायसंगत, लचीली एवं सहयोगात्मक वैश्विक प्रतिक्रिया को सुदृढ़ किया जा सकेगा।