प्रश्न की मुख्य माँग
- हाँ, एक संघीय गतिरोध
- नहीं, केवल एक संघर्ष का क्षेत्र नहीं
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
उच्च शिक्षा भारत में संघवाद की परीक्षा का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरी है, जहाँ विनियमन, पाठ्यक्रम, वित्तपोषण, भाषा तथा संस्थागत स्वायत्तता से जुड़े विवाद राष्ट्रीय एकरूपता और राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के मध्य विद्यमान गहरे तनाव को प्रतिबिंबित करते हैं।
हाँ, एक संघीय गतिरोध
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर मतभेद: राज्यों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)-2020 के कार्यान्वयन को लेकर भिन्न दृष्टिकोण अपनाए हैं तथा इसे अपनी नीतिगत स्वायत्तता में हस्तक्षेप के रूप में देखा है।
- उदाहरण: तमिलनाडु ने त्रिभाषा सूत्र सहित NEP के कई प्रावधानों का विरोध किया तथा इसे पूर्ण रूप से अपनाने में विलंब किया।
- नियामकीय केंद्रीकरण: राष्ट्रीय नियामक संस्थाओं के माध्यम से केंद्र का प्रभाव अधिक होने से उच्च शिक्षा प्रशासन में राज्यों की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित हो जाती है।
- उदाहरण: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) देशभर में मानकों, प्रत्यायन एवं वित्तपोषण मानदंडों का निर्धारण करता है।
- पाठ्यक्रम संबंधी विवाद: पाठ्यक्रमों के राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण के प्रयास कई बार राज्यों की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं एवं सांस्कृतिक संदर्भों से टकराते हैं।
- वित्तीय निर्भरता: केंद्रीय वित्तपोषण तंत्र राज्यों के विश्वविद्यालयों पर केंद्र के प्रभाव को बढ़ाता है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) जैसी केंद्र प्रायोजित योजनाएँ सुधार-आधारित शर्तों के साथ वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
- भाषाई चिंताएँ: उच्च शिक्षा में भाषा संबंधी नीतियाँ अक्सर केंद्र–राज्य मतभेदों का कारण बनती हैं।
- उदाहरण: दक्षिणी राज्यों ने NEP के कुछ प्रावधानों को हिंदी थोपने के प्रयास के रूप में देखते हुए उनका विरोध किया।
नहीं, केवल एक संघर्ष का क्षेत्र नहीं
- समवर्ती उत्तरदायित्व: शिक्षा का समवर्ती सूची में होना प्रतिस्पर्द्धी नहीं, बल्कि सहकारी संघवाद की भावना को दर्शाता है।
- उदाहरण: संविधान की सूची-III की प्रविष्टि 25 के अंतर्गत केंद्र और राज्य दोनों शिक्षा से संबंधित कानून बना सकते हैं।
- साझा उद्देश्य: अधिकांश हितधारक उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगारपरकता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार के लक्ष्य पर सहमत हैं।
- राज्यों की नवाचार क्षमता: राज्यों को अपने द्वारा स्थापित विश्वविद्यालयों के संचालन एवं सुधारों में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त है।
- उदाहरण: केरल ने उच्च शिक्षा सुधारों के अंतर्गत शैक्षणिक अंतरराष्ट्रीयकरण पर विशेष बल दिया है।
- परामर्श आधारित नीति-निर्माण: NEP 2020 जैसी नीतियों के निर्माण में अंतर-सरकारी परामर्श एवं विचार-विमर्श की प्रक्रिया अपनाई गई थी।
- विविध प्रतिक्रियाएँ: राज्यों की प्रतिक्रियाएँ पूर्ण विरोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वीकृति, संशोधन तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलन के रूप में भी सामने आती हैं।
- उदाहरण: कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन करते हुए NEP के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाया।
आगे की राह
- संस्थागत तंत्र का निर्माण: केंद्र एवं राज्यों के बीच संरचित संवाद तथा विवाद समाधान हेतु एक स्थायी केंद्र–राज्य उच्च शिक्षा परिषद की स्थापना की जानी चाहिए।
- साझा वित्तपोषण व्यवस्था: राज्य विश्वविद्यालयों को उनकी विकासात्मक प्राथमिकताओं का सम्मान करते हुए पूर्वानुमेय एवं लचीला वित्तीय समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए।
- समावेशी नियमन: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) जैसी राष्ट्रीय नियामक संस्थाओं में राज्यों की भागीदारी को सुदृढ़ किया जाए, ताकि निर्णय-निर्माण अधिक संतुलित एवं सहभागी बन सके।
- परामर्शात्मक संघवाद: प्रमुख नीतिगत सुधारों से पूर्व नियमित केंद्र–राज्य परामर्श के माध्यम से सहमति निर्माण को बढ़ावा दिया जाए, जिससे सहकारी संघवाद की भावना और अधिक सशक्त हो सके।
निष्कर्ष
उच्च शिक्षा निस्संदेह भारत में संघीय संवाद एवं समन्वय का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरी है। वास्तविक चुनौती राष्ट्रीय मानकों एवं राज्यों की स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यदि इस मतभेद एवं विमर्श को सहकारी संघवाद की भावना में रूपांतरित किया जाए, तो यह न केवल उच्च शिक्षा की गुणवत्ता एवं परिणामों को सुदृढ़ करेगा, बल्कि भारत की संवैधानिक संघीय भावना को भी और अधिक मजबूत बनाएगा।