Q. नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले कानून की अक्सर एक जटिल मनोसामाजिक समस्या के लिए 'तकनीकी समाधानवादी' दृष्टिकोण के रूप में आलोचना की जाती है। ऑस्ट्रेलिया के हालिया कदम के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। बाल सुरक्षा के प्रति डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के तहत भारतीय ढाँचा किस प्रकार भिन्न है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ऑस्ट्रेलिया की पहल का विश्लेषण।
  • संबंधित चिंताएँ।
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के तहत भारत का दृष्टिकोण।

उत्तर

एक सार्वभौमिक सोशल-मीडिया प्रतिबंध को प्रायः “तकनीकी समाधानवाद” कहा जाता है, क्योंकि यह पालन-पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल साक्षरता और विद्यालयी वातावरण से संबंधित  मनो-सामाजिक समस्या को केवल प्रतिबंधात्मक तकनीकी विनियमन से हल होने योग्य मान लेता है। इससे अति-हस्तक्षेप, नियमों से बचने की प्रवृत्ति और वास्तविक व्यवहार परिवर्तन के सीमित परिणाम का जोखिम रहता है।

ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए सोशल-मीडिया तक पहुँच पर देशव्यापी प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा है, जिसे अनिवार्य आयु-सत्यापन प्रणालियों का समर्थन प्राप्त है। इस नीति को बाल-सुरक्षा उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है, पर इसकी व्यवहारिकता, निजता संबंधी जोखिमों और यह प्रश्न कि क्या ऐसा व्यापक प्रतिबंध वास्तव में अंतर्निहित मानसिक-स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौतियों का समाधान करता है, पर व्यापक बहस छिड़ गई है।

ऑस्ट्रेलिया के निर्णय का विश्लेषण

  • नीति का सरलीकरण: 16 वर्ष से कम आयु पर प्रतिबंध जटिल मानसिक-स्वास्थ्य और ऑनलाइन-सुरक्षा समस्याओं को परामर्श तथा विद्यालय-आधारित हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करने के स्थान पर केवल मंच-अवरोध तक सीमित कर देता है।
  • प्रवर्तन में कठिनाई: आयु जाँच के मौजूदा तरीके प्रभावी नहीं हैं, और किशोर तकनीकी उपायों से इन प्रतिबंधों से बच निकलते हैं।
  • अति-विनियमन का जोखिम: व्यापक प्रतिबंध के कारण शैक्षिक, नागरिक और सहायक सामग्री तक किशोरों की उपयोगी पहुँच भी सीमित हो सकती है।
  • कानूनी प्रतिरोध: यह उपाय संवैधानिक और उद्योग-स्तरीय चुनौतियों को आमंत्रित करता है, जिससे कार्यान्वयन में विलंब हो सकता है।
  • पूर्व-दृष्टांत संबंधी चिंता: ऐसा प्रतिबंध, अन्य सरकारों को भी समान रूप से व्यापक और संदर्भ-विहीन उपाय अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
    • उदाहरण: वैश्विक विमर्श में अनुकरणीय प्रतिबंधों की आशंका व्यक्त की गई।

संबद्ध चिंताएँ

  • निजता जोखिम: सख्त आयु-सत्यापन के लिए प्रायः अत्यधिक व्यक्तिगत डेटा एकत्र करना पड़ता है, जिससे बच्चों की निजता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • डिजिटल असमानता: वंचितता से ग्रसित किशोर सीखने और सहयोग के सुरक्षित ऑनलाइन स्थानों से वंचित हो सकते हैं।
    • उदाहरण: ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग के युवाओं को लेकर चिंता।
  • प्लेटफॉर्म स्थानांतरण: प्रतिबंध बच्चों को अधिक खतरनाक और अनियमित प्लेटफॉर्म की ओर ले जा सकता है।
  • मूल कारणों की उपेक्षा: मानसिक-स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, साइबर-बुलिंग समर्थन और अभिभावक जागरूकता जैसी समस्याएँ यथावत रहती हैं।

डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अंतर्गत भारत का दृष्टिकोण

  • डेटा-केंद्रित सुरक्षा: भारत प्रतिबंध से बचते हुए बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण हेतु सत्यापित अभिभावक सहमति को अनिवार्य करता है।
    • उदाहरण: अनिवार्य अभिभावक सहमति प्रावधान।
  • व्यवहारिक संरक्षण: यह अधिनियम बच्चों की व्यवहारिक निगरानी, लक्षित विज्ञापन और प्रोफाइलिंग पर रोक लगाता है।
    • उदाहरण: सरकारी अधिसूचनाओं में लक्षित विज्ञापनों पर प्रतिबंध पर बल।
  • अधिकार-आधारित संरचना: प्लेटफॉर्म के उपयोग को सीमित करने के स्थान पर बच्चों के डेटा अधिकारों, जैसे-डेटा तक पहुँच, उसमें सुधार और शिकायत निवारण पर अधिक जोर दिया गया है।
  • जवाबदेही तंत्र: दंड, रिपोर्टिंग दायित्व और डेटा संरक्षण बोर्ड व्यापक अवरोध के बिना अनुपालन सुनिश्चित करते हैं।
    • उदाहरण: नियमों में डेटा न्यासियों की जिम्मेदारियाँ और दंड का विवरण।
  • संतुलित दृष्टिकोण: भारत प्रत्यक्ष प्रतिबंध के स्थान पर विनियमन को डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन-सुरक्षा अभियानों के साथ जोड़ता है।

निष्कर्ष

एक स्थायी बाल-सुरक्षा व्यवस्था के लिए स्वायत्तता, निजता, कल्याण और डिजिटल सशक्तीकरण के मध्य संतुलन आवश्यक है। व्यापक प्रतिबंधों के स्थान पर भारत का डेटा संरक्षण मॉडल जैसे सूक्ष्म ढाँचे दर्शाते हैं कि संतुलित विनियमन, अभिभावक सहभागिता, मंच-जवाबदेही और मनो-सामाजिक समर्थन बच्चों को ऑनलाइन संसार के लाभों से वंचित किए बिना अधिक सुरक्षित डिजिटल वातावरण निर्मित कर सकते हैं।

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