Q. वर्ष 2026 की जनगणना के बाद होने वाला आगामी परिसीमन अभ्यास भारत में केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय संतुलन को नया आकार देने की क्षमता रखता है। 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के आलोक में चर्चा कीजिए। इसमें निहित चुनौतियों का परीक्षण कीजिए और आगे की राह सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संघीय संतुलन पर प्रभाव (2026 के बाद परिसीमन) की चर्चा कीजिए।
  • इसमें निहित मुख्य चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

वर्ष 2002 के 84वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा सक्षम वर्ष 2026 की जनगणना के बाद होने वाला परिसीमन प्रतिनिधित्व को पुनर्परिभाषित कर सकता है, जिससे समानता, संघीय संतुलन तथा जनसंख्या-आधारित लोकतंत्र और सहकारी संघवाद के बीच तनाव को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

मुख्य भाग

संघीय संतुलन पर प्रभाव

  • जनसंख्या आधारित परिवर्तन: केवल जनसंख्या आधारित परिसीमन से उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, जिससे संसद में क्षेत्रीय संतुलन बदल सकता है।
    • उदाहरण: उत्तर प्रदेश और बिहार को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि केरल और तमिलनाडु का सापेक्ष हिस्सा घट सकता है।
  • जनसंख्या नियंत्रण का दंड: जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, उन राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, भले ही उनका शासन बेहतर रहा हो।
    • उदाहरण: दक्षिणी राज्यों ने वर्ष 2002 के जनसंख्या स्थगन के आधार बने परिवार नियोजन उपायों का प्रभावी पालन किया।
  • वितरण में असंतुलन: नीतिगत प्राथमिकताएँ अधिक जनसंख्या वाले हिंदी भाषी क्षेत्रों की ओर झुक सकती हैं।
  • राजनीतिक केंद्रीकरण: सीटों के पुनर्वितरण से कुछ बड़े राज्यों के आधार पर संसदीय बहुमत बनने की संभावना बढ़ेगी, जिससे केंद्र का प्रभुत्व मजबूत हो सकता है।
  • क्षेत्रीय असंतोष: प्रतिनिधित्व में असमानता की धारणा क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकती है और राष्ट्रीय एकता को प्रभावित कर सकती है।

मुख्य चुनौतियाँ

  • समानता बनाम न्यायसंगतता: प्रत्येक मत के समान मूल्य को बनाए रखते हुए विभिन्न विकास स्तर वाले क्षेत्रों के बीच न्याय सुनिश्चित करना कठिन है।
    • उदाहरण: भारतीय संविधान का अनुच्छेद=81 जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है, जो सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को नजरअंदाज करता है।
  • संघीय दबाव: असंतुलित प्रतिनिधित्व राज्यों के बीच विश्वास को कमजोर कर सकता है और सहकारी संघवाद को प्रभावित कर सकता है।
  • प्रोत्साहन में विकृति: यह परिवर्तन राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों से हतोत्साहित कर सकता है, यदि इससे राजनीतिक नुकसान होता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2002 के संशोधन का उद्देश्य ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित करना था, किंतु परिणाम इसके विपरीत हो सकते हैं।
  • संवैधानिक कठोरता: वर्तमान संवैधानिक प्रावधान प्रतिनिधित्व के वैकल्पिक मानदंड अपनाने में सीमित लचीलापन प्रदान करते हैं।
  • राजनीतिक विवाद: परिसीमन प्रक्रिया से तीव्र राजनीतिक बहस और चुनावी तनाव उत्पन्न होने की संभावना है।

आगे की राह

  • संतुलित सूत्र: जनसंख्या के साथ विकास सूचकांकों को जोड़कर एक समेकित दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिससे राज्यों के बीच अधिक न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
    • उदाहरण: वित्त आयोग की तरह आय अंतर और मानव विकास सूचकांकों का उपयोग।
  • सीटों का विस्तार: लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि कर जनसंख्या परिवर्तन को समायोजित किया जा सकता है, बिना किसी राज्य का प्रतिनिधित्व घटाए।
  • संघीय सुरक्षा उपाय: राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं को सुदृढ़ कर जनसंख्या-आधारित प्रभुत्व को संतुलित किया जाए।
    • उदाहरण: संघीय निर्णय-निर्माण में राज्यसभा की भूमिका को मजबूत करना।
  • सहमति आधारित दृष्टिकोण: राज्यों के बीच विश्वास बनाए रखने और टकराव से बचने के लिए व्यापक राजनीतिक परामर्श आवश्यक है।
    • उदाहरण: अंतर-राज्य परिषद के माध्यम से संरचित संवाद।
  • चरणबद्ध क्रियान्वयन: सीटों का क्रमिक समायोजन व्यवधान को कम कर सकता है और सुचारू परिवर्तन सुनिश्चित कर सकता है।

निष्कर्ष

परिसीमन में लोकतांत्रिक समानता और संघीय न्याय के बीच संतुलन आवश्यक है, ताकि प्रतिनिधित्व विभाजन का कारण न बने। एक संतुलित और सहमति-आधारित दृष्टिकोण ही भारत की एकता को बनाए रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों के योगदान का सम्मान सुनिश्चित कर सकता है।

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