प्रश्न की मुख्य माँग
- आर्थिक पहलुओं से परे, रणनीतिक विदेश नीति के साधन के रूप में व्यापार समझौते।
- भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) का रणनीतिक महत्त्व।
- नॉर्डिक क्षेत्र तक भारत की पहुँच का महत्त्व।
|
उत्तर
आर्कटिक, जो कभी वैज्ञानिक सहयोग का एक क्षेत्र था, अब प्रतिरोध, ऊर्जा-प्रतिस्पर्द्धा और सैन्य-तैनाती से प्रभावित है। ऑस्लो में आयोजित भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन भारत के उस रणनीतिक ‘उत्तरी झुकाव’ को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य अपने दीर्घकालिक भू-राजनीतिक, आर्थिक और जलवायु संबंधी हितों की रक्षा करना है।
भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन (ऑस्लो) का महत्त्व
- रणनीतिक गहराई: यह शिखर सम्मेलन भारत-नॉर्डिक संबंधों को जलवायु सहयोग से आगे बढ़ाकर उत्तरी यूरोप में रणनीतिक और भू-राजनीतिक सहभागिता तक ले जाता है।
- आर्कटिक तक पहुँच: नॉर्डिक देशों के साथ घनिष्ठ संबंध आर्कटिक शासन, समुद्री मार्गों और ध्रुवीय अनुसंधान में भारत की सहभागिता को बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: आर्कटिक परिषद का वर्तमान अध्यक्ष डेनमार्क, आर्कटिक कूटनीति और ग्रीनलैंड से संबंधित रणनीतिक चिंताओं में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: नॉर्डिक देश, विशेष रूप से नॉर्वे, स्थिर ऊर्जा आपूर्ति और हरित परिवर्तन प्रौद्योगिकियों तक भारत की पहुँच को मजबूत करते हैं।
- उदाहरण: नॉर्वे एक प्रमुख तेल और गैस निर्यातक और अपतटीय पवन ऊर्जा और समुद्री स्थिरता में अग्रणी है।
- प्रौद्योगिकी संबंध: यह शिखर सम्मेलन नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग का समर्थन करता है।
- उदाहरण: स्टॉकहोम (2018) और कोपेनहेगन (2022) में भारत के पिछले नॉर्डिक शिखर सम्मेलनों में नवाचार और डिजिटल सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
- यूरोप संतुलन: बदलते यूरोप-अमेरिका-रूस संबंधों के बीच नॉर्डिक शक्तियों के साथ संबंधों को गहरा करके भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है।
इसके समक्ष चुनौतियाँ
- महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता: आर्कटिक क्षेत्र, अमेरिका-रूस-चीन की प्रतिस्पर्द्धा का केंद्र बनता जा रहा है, जिससे भारत के लिए संतुलित कूटनीति करना कठिन हो गया है।
- सीमित उपस्थिति: आर्कटिक के तटीय देशों की तुलना में भारत की प्रत्यक्ष भू-भागीदारी या मजबूत आर्थिक हित सीमित हैं।
- उदाहरण: भारत आर्कटिक परिषद में केवल एक पर्यवेक्षक बना हुआ है।
- सुरक्षा तनाव: रूस-यूक्रेन युद्ध ने आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग की गुंजाइश कम कर दी है और सैन्यीकरण बढ़ा दिया है।
- उदाहरण: आर्कटिक क्षेत्र तेजी से प्रतिरोध और सैन्य स्थिति से प्रभावित हो रहा है।
- संस्थागत बाधाएँ: भू-राजनीतिक तनावों के कारण आर्कटिक परिषद का कामकाज कमजोर हो गया है, जिससे भारत के सहभागिता चैनलों पर असर पड़ रहा है।
- संसाधन प्रतिस्पर्द्धा: महत्त्वपूर्ण खनिजों, हाइड्रोकार्बन और समुद्री मार्गों पर प्रतिस्पर्द्धा भारत जैसे नए प्रवेशकों को हाशिए पर धकेल सकती है।
- उदाहरण: बर्फ पिघलने से उत्तरी समुद्री मार्ग तक पहुँच खुल रही है, जिससे रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ रही है।
आर्कटिक में भारत के दीर्घकालिक हितों की सुरक्षा के उपाय
- नीति का कार्यान्वयन: भारत को कूटनीतिक, वैज्ञानिक और रणनीतिक जुड़ाव के माध्यम से अपनी आर्कटिक नीति (2022) को सक्रिय रूप से लागू करना चाहिए।
- नॉर्डिक भागीदारी: दीर्घकालिक रणनीतिक पहुँच के लिए नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड के साथ संस्थागत भागीदारी को और गहरा किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: ऑस्लो में आयोजित तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन निरंतर जुड़ाव के लिए एक मंच प्रदान करता है।
- वैज्ञानिक उपस्थिति: आर्कटिक शासन में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भारत को अपने ध्रुवीय अनुसंधान केंद्रों और वैज्ञानिक अभियानों का विस्तार करना चाहिए।
- उदाहरण: भारत वर्ष 2008 से नॉर्वे के स्वालबार्ड में ‘हिमाद्री’ अनुसंधान केंद्र का संचालन कर रहा है।
- समुद्री रणनीति: भारत को आर्कटिक में उभरते समुद्री शिपिंग मार्गों के लिए तैयार रहना चाहिए, जो यूरोप और रूस के साथ व्यापार की दूरी को कम कर सकते हैं।
- उदाहरण: उत्तरी समुद्री मार्ग, स्वेज नहर मार्ग की तुलना में यात्रा के समय को काफी सीमा तक कम कर सकता है।
- बहुपक्षीय प्रतिनिधित्त्व: भारत को आर्कटिक परिषद और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों का उपयोग करके आर्कटिक में शांतिपूर्ण और नियमों पर आधारित शासन का समर्थन करना चाहिए।
निष्कर्ष
ऑस्लो शिखर सम्मेलन को केवल एक कूटनीतिक जुड़ाव के रूप में ही नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक उत्तरी रणनीति की नींव के रूप में उभरना चाहिए। वैज्ञानिक सहयोग, सतत् कूटनीति और गहन नॉर्डिक साझेदारियों को मिलाकर, भारत एक तेजी से ध्रुवीकृत हो रही दुनिया में एक जिम्मेदार और भविष्योन्मुखी आर्कटिक उपस्थिति को आकार दे सकता है।