Q. भारत में बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता सार्वजनिक जल प्रशासन में गहरी प्रणालीगत समस्याओं को दर्शाती है। परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बोतलबंद जल पर बढ़ती निर्भरता के संदर्भ में सार्वजनिक जल शासन की संरचनात्मक समस्याओं का विश्लेषण कीजिए।
  • इसके व्यापक शासन तथा पर्यावरणीय प्रभावों की विवेचना कीजिए।

उत्तर

भारत में बोतलबंद पेयजल उद्योग ने तीव्र वृद्धि दर्ज की है, जिसका प्रमुख कारण इसकी सुरक्षा और विश्वसनीयता के प्रति जन-धारणा है। हालाँकि, बोतलबंद जल पर बढ़ती निर्भरता नगरपालिका जल आपूर्ति तंत्र, भूजल विनियमन तथा जल गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करती है।

बोतलबंद जल पर निर्भरता में परिलक्षित सार्वजनिक जल शासन की संरचनात्मक समस्याएँ

  • नगरपालिका आपूर्ति का अपर्याप्त कवरेज: शहरी स्थानीय निकाय प्रायः निरंतर और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में विफल रहते हैं।
    • उदाहरण: अधिकांश भारतीय शहरों में 24×7 आपूर्ति के बजाय प्रतिदिन केवल कुछ घंटों के लिए जल वितरण होता है।
  • खराब जल गुणवत्ता निगरानी: प्रदूषण तथा वास्तविक समय परीक्षण की कमी से जनविश्वास प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: मानसून के दौरान नगरपालिका पाइपलाइनों में जीवाणु संक्रमण की आवधिक रिपोर्टें।
  • अनियंत्रित दोहन से भूजल क्षरण: व्यावसायिक बोतलबंद जल संयंत्र व्यापक स्तर पर भूजल का दोहन करते हैं।
    • उदाहरण: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में बोरवेल पर निर्भर बोतलबंद जल इकाइयों का संचालन।
  • कमजोर गुणवत्ता मानक प्रवर्तन: विनियामक निगरानी की कमियाँ सुरक्षा दावों को संदिग्ध बनाती हैं।
    • उदाहरण: राज्य प्राधिकरणों द्वारा बीआईएस (BIS) प्रमाणन में अनियमितताओं तथा निम्न-स्तरीय बोतलबंद जल के मामलों की रिपोर्ट।
  • सुरक्षित जल तक असमान पहुँच: वंचित समुदाय असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर रहते हैं, जबकि समृद्ध वर्ग बोतलबंद विकल्पों की ओर उन्मुख हो जाता है।
    • उदाहरण: शहरी झुग्गी बस्तियों में अनिश्चित गुणवत्ता वाले टैंकर जल पर निर्भरता।
  • अवसंरचना में सार्वजनिक निवेश की विफलता: शोधन संयंत्रों और पाइपलाइन नेटवर्क के आधुनिकीकरण की गति धीमी है।
    • उदाहरण: जर्जर वितरण तंत्र के कारण रिसाव और प्रदूषण की समस्या।

व्यापक शासन एवं पर्यावरणीय प्रभाव

  • सार्वजनिक संसाधन का व्यावसायीकरण: पेयजल को क्रमशः एक बाजार-उत्पाद के रूप में देखा जाने लगा है, जबकि यह एक मौलिक सार्वजनिक संसाधन है।
    • उदाहरण: परिवहन केंद्रों तथा सार्वजनिक संस्थानों में बोतलबंद पेयजल की व्यावसायिक बिक्री।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट में वृद्धि: एकल-उपयोग (Single-use) पीईटी (PET) बोतलें पर्यावरणीय क्षरण में योगदान देती हैं।
    • उदाहरण: भारत प्रतिवर्ष लाखों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जिसमें एक उल्लेखनीय हिस्सा पेय पदार्थों की बोतलों से संबंधित है।
  • ऊर्जा-गहन शुद्धिकरण प्रक्रियाएँ: बोतलबंद जल के उत्पादन में निस्पंदन, पैकेजिंग और परिवहन हेतु पर्याप्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis) प्रणालियाँ शुद्धिकरण के दौरान उल्लेखनीय मात्रा में जल अपव्यय करती हैं।
  • वैज्ञानिक प्रमाण पर जनमानस: बोतलबंद जल को बिना समान रूप से ठोस प्रमाण के अधिक सुरक्षित माना जाता है।
    • उदाहरण: कुछ अध्ययनों में कुछ ब्रांडों के बोतलबंद जल में माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति दर्शाई गई है।
  • विनियामक विखंडन: बीआईएस (BIS), एफएसएसएआई (FSSAI) तथा स्थानीय प्राधिकरणों के बीच अधिकार-क्षेत्र के अतिव्यापन से प्रवर्तन में अंतराल उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: दोहरी लाइसेंसिंग आवश्यकताओं के बावजूद निरीक्षण में असंगति।
  • सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास का क्षरण: निजी आपूर्ति पर निर्भरता राज्य सेवाओं के प्रति घटते विश्वास का संकेत देती है।
    • उदाहरण: उपचारित जल आपूर्ति तंत्र होने के बावजूद महानगरों में बोतलबंद जल की उच्च खपत।

निष्कर्ष

बोतलबंद जल की खपत में वृद्धि केवल एक जीवनशैली विकल्प नहीं है, बल्कि जल प्रबंधन में निहित संरचनात्मक शासन-समस्याओं का द्योतक है। अवसंरचनात्मक कमियों की पूर्ति, विनियामक प्रवर्तन को सुदृढ़ करना तथा भूजल की सततता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक विश्वास की पुनर्स्थापना हो सके और जल को शासन की विफलता के वाणिज्यिक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक संसाधन के रूप में पुनः स्थापित किया जा सके।

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